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प्लेटो ग्रीस ही नहीं विश्व के महान दार्शनिक थे। उनकी प्रतिभा सर्वतोमुखी थी। वे महान साहित्यकार व कलाकार भी थे। पाश्चात्य दर्शन का एक भी मौलिक दर्शन नहीं है जो प्लेटो में न मिलता हो। उनका कथन है- जब तक विचारकों का प्राधान्य न होगा, विश्व में शांति स्थापित न होगी।
प्लेटो का जन्म उच्चकुलीन सामंत परिवार में हुआ था। सॉक्रेटीज के वे परम शिष्य थे। सॉक्रेटीज की मृत्यु से ग्रीक प्रजातंत्र के प्रति उनको घृणा हो गई। वे इटली व सिसिली भी गए थे। वहां से लौटकर एथेंस में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध संस्था एकेडमी की स्थापना की और उसके प्रधान आचार्य बनकर शांति के दर्शन के चिंतन-मनन और अध्यापन कार्य में लगे रहे। सिसिली में उनको वहां के युवक राजा डायोनिसियस को पढ़ाने के लिए राजा के संरक्षक डायोन ने आमंत्रित किया। प्लेटो वहां गए किन्तु चार महीने के भी ही डायोन और राजा में झगड़ा हो गया। डायोन को निर्वासित कर दिया गया और प्लेटो को एथेंस लौट आना पड़ा। प्लेटो दुबारा सिसिली चले गए और डायोन तथा राजा में समझौता कराने का प्रयत्न किया किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। लगभग एक वर्ष सिसिली में रहकर वे एथेंस लौट आए और शेष जीवन उन्होंने एकेडमी में भी शांतिपूर्वक व्यतीत किया। एकेडमी का जीवन आश्रम के जीवन के समान था। एकेडमी में अध्ययन का कार्यक्रम इस प्रकार था- पहले गणित, रेखागणित, ज्योतिष आदि का अध्ययन। फिर द्वंद्वात्मक तर्क का और अंत में साधना प्रणाली का।
प्लेटो का गुरु-शिष्य के साक्षात संपर्क में अटल विश्वास था। एकेडमी के सदस्य एक साथ रहते थे, एक साथ खाते थे, एक साथ पढ़ते थे और एक साथ प्रार्थना करते थे। उनका जीवन धार्मिक व दार्शनिक था।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र

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  1. I am surprised that 'Gurkul' way of learning was followed elsewhere too. Sometimes I wonder was there any common connection existing between different civilization at that time!!

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