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एपिक्यूरस का कथन है कि भौतिक परमाणुओं के अतिरिक्त इस संसार में और कुछ भी नित्य नहीं है। इनका समय ईसापूर्व 341 से 2070 ईसापूर्व तक है। इन्होंने एथेंस में अपनी संस्था स्थापित की जिसमें स्त्रियों और दासों को भी सम्मिलित किया। घनिष्ठ मैत्री इनका आदर्श था और एपिक्यूरस इसमें देवतुल्य थे। उनके अनुसार सुख ही जीवन का एकमात्र और चरम लक्ष्य है। इस सुख में इन्द्रियज सुख को उचित स्थान प्राप्त था। हालांकि एपिक्यूरस का आदर्श आंतरिक शांति द्वारा उत्पन्न अलौकिक दार्शनिक सुख था। सांसारिक सुख दु:ख निवृत्ति के लिए होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति दु:ख व भय से निवृत्ति चाहता है इसलिए सुख की ओर प्रवृत्त होता है। असली सुख वह है जहां दु:ख की आत्यंतिक निवृत्ति हो। असली सुख आंतरिक दार्शनिक शांति है जो सांसारिक सुख-दु:ख के द्वंद्व के ऊपर है। यदि मनुष्य सार्वभौम सम्राट भी बन जाय तो क्या वह दु:खों से छूट सकता है। इच्छाओं और कामनाओं का त्याग ही असली सुख है। इच्छाओं को छोड़ने का प्रत्यन करना चाहिए क्योंकि इच्छा ही दु:ख की जननी है। धार्मिक अंध विश्वास दु:ख को भयंकर रूप से बढ़ाते हैं। ईश्वर की मानव रूप में कल्पना, विविध देवी-देवताओं की कल्पना, उनका मानव जीवन में पक्षपात पूर्वक हस्तक्षेप करना और इस प्रकार के अन्य कई बेहूदे अंधविश्वास संसार को पीड़ित करते हैं। अत: एपिक्यूरस ने भौतिक विज्ञान के अध्ययन को निष्पक्ष विचारों के लिए बहुत आवश्यक माना है। उसने कहा कि विश्व में भौतिक परमाणुओं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। ईश्वर व देवी-देवता आदि कोरी कल्पना हैं। मानव की आत्मा भी भौतिक परमाणुओं के संयोग से बनती है और मृत्यु के बाद नष्ट हो जाती है, क्योंकि यह संयोग नष्ट हो जाता है। मृत्यु से भय करना बेकार है। यह सत्य है कि मृत्यु के बाद सांसारिक सुख नहीं रहता है किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि मृत्यु के बाद कोई दु:ख नहीं रहते हैं। स्वयं एपिक्यूरस और उनके प्रारंभिक शिष्यों के लिए आदर्श सुख द्वंद्वातीत शांति ही थी किन्तु बाद में इन्द्रिय सुखों को आदर्श मानकर लोग अपने आप को एपिक्यूरस के अनुयायी कहलाने लगे। एपिक्यूरस के लिए सुख और नैतिक बल एक ही बात थी। यह सत्य है कि उन्होंने सांसारिक सुखों की अवहेलना की क्योंकि उसका लक्ष्य इच्छाओं से छुटकारा पाना ही था। बाद में यह संप्रदाय शुद्ध चार्वाक संप्रदाय बन गया और इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त सुख ही जीवन का आदर्श बन गया। एलेक्जेंडर के बाद रोमन विजेता पूर्ण व्यावहारिक होने लगे और उनकी दर्शन की कल्पनाओं में अभिरुचि कम होने लगी। वे परमार्थ जीवन से हटकर व्यवहार की ओर केन्द्रित होने लगे। संदेहवाह की धारा बड़े वेग से बहने लगी। विज्ञानवाद की प्रतिक्रिया के रूप में ईश्वर, जीव और जगत की सत्ता में संदेह होने लगा और इस जीवन में जो भी और जैसा भी सुख मिल जाय वही प्राप्तव्य समझा जाय। इस विचारधारा के फलस्वरूप एपिक्यूरस का यथार्थवाद पनपा। यह मत विशुद्ध भौतिकवादी मत के रूप में प्रतिष्ठित है। एपिक्यूरस मत का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अर्थ- खाओ, पीयो और मौज-मस्ती करो, से लिया जाता है। भारतवर्ष का चार्वाक मत और ग्रीस का एपिक्यूरस मत एक-दूसरे के पर्याय हैं। इस मत पर पर्शिया के पूर्वी मत का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इस मत के मानने वालों के अनुसार जन्म के पहले न तो कोई जीवन था और न मृत्यु के बाद कोई जीवन होगा। यही जीवन सबकुछ है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र 430 बी आजादनगर, रूस्तकमपुर, गोरखपुर

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  1. सामग्री जानकारी युक्त एवं सारगर्भित है।
    धन्यवाद।

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  2. अच्‍छी जानकारी।

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