3
चरित्र बल की प्रधानता स्टोइक मत का आधार है इस मत की प्रतिष्ठा जीनो (336 ई.पू. से 264 ई.पू.) ने एथेंस में की थी। इस मत पर पूर्वी विचारधारा की छाप है। जीनो ने सॉक्रेटीज और सिनिक्स का अनुकरण करके त्याग को जीवन का लक्ष्य बनाया। ये लोग कामनाओं के दमन को लक्ष्य प्राप्ति का साधन मानते हैं। एपिक्यूरस के लिए सुख और चरित्रबल एक ही वस्तु थी, इसलिए उनके शिष्य आगे चलकर इन्द्रिय सुख के उपासक बन गए। परन्तु स्टोइक मत ने नैतिक जीवन प्रेमियों को शीघ्र ही अपनी ओर आकर्षित कर लिया। सिनिक का आधार था चरित्रबल। इसमें इन्द्रिय दमन पर जोर दिया गया और संसार के सुखों को त्याग कर तपस्वी जीवन व्यतीत करने के विषय में कहा गया है। स्टोइक लोगों के लिए चाहे परम तत्व को ईश्वर कहा जाय या प्रकृति, दोनों बात एक ही है। तत्व विशुद्ध विज्ञान स्वरूप है। ये लोग एरिस्टॉटल की तरह संसार को द्रव्य और स्वरूप का सम्मिश्रण मानते थे, परन्तु द्रव्य और स्वरूप के पारमार्थिक द्वैत को मिटाकर इनको एक ही तत्व के दो रूप मानें। अत: एक ही परम तत्व को स्वरूप की दृष्टि से ईश्वर और द्रव्य की दृष्टि से प्रकृति कहा जा सकता है। यह जगत ईश्वर का शरीर है। ईश्वर इस जगत में अन्तर्यामी है, हमसे भिन्न नहीं। ईश्वर परमात्मा या जगदात्मा है। जीवात्मा उसका अंश है और संसार में उसके ज्ञान का सीमित उपयोग करता है। मुक्ति के समय जीवात्मा और परमात्मा का तादात्म्य हो जाता है और उसमें कोई भेद नहीं रहता। जगत में प्रत्येक व्यक्ति एक विशिष्ट स्थान रखता है। व्यक्ति ईश्वर का अंग है और उसका लक्ष्य ईश्वर की ओर अग्रसर होना है। मानव जीवन का परम लक्ष्य परमात्म स्वरूप होता है। अध्यात्म ज्ञान ही जीवन का सर्वस्व है और चरित्रबल इसका साधन है। जीवन में निहित अन्तर्यामी तत्व समस्त द्वंद्वों से रहित है। मानव को अपने पैरों पर खडेÞ होकर आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए। निष्काम भाव से निर्लिप्त होकर संसार में अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए ईश्वराभिमुख होना चाहिए। इसी में जीवन की सार्थकता है। मानव विश्व का निवासी है और मानव ईश्वर का अंश है और ईश्वर जगदन्तर्यामी है। यद्यपि इसाई मत और स्टोइक मत में वैचारिक भिन्नता है परन्तु कालान्तर मं चलकर इस मत का प्रभाव इसाई मत पर पड़ा है। इन्हीं का अनुकरण कर कैथोलिकों ने भी तपस्या पर बल दिया और तपस्या को ईश्वर प्राप्ति का मुख्य मार्ग माना। सम्राट नीरो के समय यह मत पूर्ण प्रगति पर रहा और इस मत को मानने वालों को राजाश्रय भी प्राप्त था। जीनो के पश्चात उत्तरकालीन स्टाइकों में सम्राट नीरो के शिक्षक सेनेका का प्रमुख स्थान है। इसके अतिरिक्त स्टोइक मत के दो और प्रसिद्ध विद्वान हुए जो एपिक्टेटस और सम्राट औरीलियस थे, जिनका कार्यकाल 161 एडी से 180 एडी ईसा के पश्चात रहा है। ये लोग घनघोर तपस्या द्वारा परमतत्व की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य मानते थे।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, गोरखपुर

keyword: western-philosophy

नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा

Post a Comment

  1. Dwivedi ji, apne posts ka font size thoda badhaiya na please. Aapke blog ko regularly follow karne walon ki aankhon ke liye :D

    As always, an interesting read!

    ReplyDelete
  2. very informative article..
    thanx for sharing

    ReplyDelete
  3. very informative! I am time and again astounded by the similarity of European and Indian philosophy, there has to be a connection somewhere.

    ReplyDelete

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top