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‘फीडो’ नामक ग्रंथ में सॉक्रेटीज (सुकरात) के अंतिम क्षण का मार्मिक वर्णन है। ग्रीक दर्शन की प्रारंभिक विचारधारा बाह्य प्रकृति के विवेचन की ओर थी। इसको आत्माभिमुख करने का प्रयास सॉक्रेटीज के पहले भी किए गए हैं। पाइथागोरस ने ‘स्वरूप’ या ‘संख्या’ द्वारा, हेरेक्लाइटस ने ‘सार्वभौम’ विज्ञान द्वारा, पार्मेनाइडीज ने ‘शुद्ध स्वरूप’ विज्ञान द्वारा, एनेक्जेगोरस ने ‘परम विज्ञान’ द्वारा और प्रोटेगोरस ने ‘मानव मानदंड’ द्वारा दर्शन की प्रवृत्ति को आत्माभिमुख करने का प्रयास किया। किन्तु इसमें कोई भी अधिक सफल नहीं हो सका। इसमें सफलता का श्रेय निश्चित तौर पर सॉक्रेटीज को जाता है, जिन्होंने स्पष्ट रूप से तत्व के विज्ञान स्वरूप का प्रतिपादन किया और उसको दर्शन का केन्द्र बना दिया। विज्ञान ही मानव का स्वरूप है। यह विज्ञान साक्षात्कार का विषय है। नैतिक जीवन इस साक्षात्कार में योग देता है। सॉक्रेटीज ने प्रथम बार इस विज्ञान को नैतिक जीवन का आधार बनाया। उनका कार्यकाल 470 से 399 ईसा पूर्व तक था। इनकी आंखें बड़ी, होठ मोटे और नाक चपटी थी। ये एक लम्बा ढीला चोंगा पहनते थे जो सर्दी और गर्मी दोनों में काम आता था। प्राय: नंगे पैर घूमते थे। वाद-विवाद में उनकी गहरी अभिरुचि थी और प्राय: बाजार में या मित्र मंडलियों में दार्शनिक चर्चा करते रहते थे। इनका जीवन ऋषि कल्प था। उनको सर्दी-गर्मी, सुख-दु:ख, भूख-प्यास नहीं सताते थे। उन्हें अपने जीवन पर अधिकार था। वे इन्द्रियजीत थे। सॉक्रेटीज के विषय में यह चर्चा थी कि वह सब मनुष्यों में सर्वाधिक बुद्धिमान हैं। इनको ज्ञानी इसलिए कहा जाएगा क्योंकि इन्हें अपने अज्ञानी होने का ज्ञान था। सॉक्रेटीज का यह ध्येय था कि वे लोगों को अज्ञान मार्ग से हटाकर ज्ञान मार्ग की ओर प्रवृत्त करें। सॉक्रेटीज रहस्यवादी थी। उन्हें बहुधा अंतरात्मा की आवाज सुनाई देती थी और उन्हें महाभाव भी आता था। उन पर अधार्मिक होने व युवकों को बहलाने का अभियोग लगाया गया और उन्हें विषपान द्वारा मृत्युदंड दिया गया। इनका वास्तविक अपराध तत्कालीन प्रजातंत्र और उसके नेताओं की पोल खोलकर उनके अज्ञान, दंभ और आडम्बर का प्रखर खंडन करना था। वे एक मास में एक जेल में रहे, उनके शिष्य तथा मित्र उनको वहां से भगा ले जाने के लिए तैयार थे किन्तु उन्होंने स्वीकार नहीं किया। वे शांति पूर्वक हंसते-हंसते भयंकर विष का प्याला पीकर अमर हो गए।
सॉक्रेटीज के परम शिष्य प्लेटो ने अपनी ‘एपॉलॉजी’ नामक कृति में सॉक्रेटीज का वह महत्वपूर्ण भाषण जो उन्होंने अपने अभियोग की सफाई में न्यायालय में दिया था, दिया है और अपनी ‘फीडो’ नामक कृति में उन्होंने सॉक्रेटीज के अंतिम समय का वर्णन किया है। सारे यूरोप की साहित्यिक रचनाओं में ‘फीडो’ की तुलना की रचन पाना कठिन है। सॉक्रेटीज ने अपने सफाई भाषण में कहा था- ‘एथेंस के नागरिकों! मैं तुम्हारा आदर और तुमसे प्रेम करता हूं, किन्तु तुम्हारी आज्ञा मानने की अपेक्षा मैं ईश्वर की आज्ञा मानूंगा और जब तक मुझमें जीवन और शक्ति है मैं दार्शनिक उपदेश देना और उसके अनुसार स्वयं आचरण करना बंद नहीं कर सकता और मेरा विश्वास है कि इस राज्य की, मेरी ईश्वर सेवा से बढ़कर कोई भलाई नहीं हो सकती।... शरीर तो आत्मा का बंधन है। आत्मा अमर है... भले आदमी के लिए परलोक में कोई भय नहीं है। अब वियोग का समय आ गया है और हम अपने-अपने मार्गों पर चलते हैं... मैं मृत्यु पथ पर और तुम जीवन पथ पर। इसमें कौन सा मार्ग उत्तम है, ईश्वर ही जानता है।’ वे अपने मित्रों को समझाते हैं कि आत्मा अमर है और सच्चरित्र व्यक्ति के लिए परलोक में भी आनंद है और शांतिपूर्वक हंसते-हंसते विषपान कर लेते हैं। ‘फीडो’ के अंतिम शब्द ये हैं- ‘इस प्रकार हमारे मित्र एवं गुरु का अंत हुआ, उस व्यक्ति का जो अपने समय का सर्वश्रेष्ठ पुरुष, सबसे बड़ा ज्ञानी और सबसे बड़ा चरित्रवान था।’
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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