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सामुद्रक शास्त्र में हस्तरेखा पर सर्वांग चर्चा की गई है। यह एक ऐसा शास्त्र है जो मनुष्य के सपादमस्तक के अंगों के लक्षणों का अध्ययन प्रस्तुत कर व्यक्ति को उसके शुभाशुभ फलों से अवगत कराता है। यह भी सुविदित है कि यह शास्त्र अतिप्राचीन काल से ही भारत और भारतेत्तर देशों के बीच फलता-फूलता रहा है। इस शास्त्र की विशेषता है कि विश्व के सभ्‍य कहलाने वाले मानव समाज ने समय-समय पर इसके ज्ञान को सराहा है और इसका विभिन्न प्रकार से लाभ लिया है। आज भी विश्व स्तर पर इसे अपनाए रखने की होड़ मची है। विगत अनेक वर्षों से विश्व स्तर पर इससे संबंधित ग्रंथों की संख्या में भारी अभिवृद्धि हुई है। यह मत मतान्तर प्राय: फल कहने या लिखने की शैली या युक्तिभेद मात्र हैं। इस शास्त्र के दो मत प्रमुख हैं- पौर्वात्य और पाश्चात्य। दोनों मतों के आचार्यों और मनीषियों ने सामुद्रक शास्त्र के अंतर्गत हस्तरेखा पर सर्वांग विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
हस्तस्वरूप: हस्तरेखा शास्त्र में सभी अंगों का अध्ययन किया जाता है। हाथ के सभी अंग मनुष्यों को अपने-अपने लक्षणों के अनुसार शुभाशुभ फल देते हैं। हस्तदर्शन के समय प्रथम ध्यान हाथ की बनावट पर जाता है। अधिकतर विद्वानों ने चार प्रकार के हाथों का प्रमुखता से वर्णन किया है-
1- वर्गाकार या आयताकार हाथ:
जिन लोगों का हाथ वर्गाकार या आयताकार होता है वे अनुशासन प्रिय, दैनिक चर्या में दृढ़ता का प्रदर्शन करने वाले, संवेदनहीन, नियमपूर्वक योजनाबद्ध ढंग से कार्य करने वाले, मितव्ययी, परंपरावादी, सामंजस्य स्थापित करने में असफल, अच्छे प्रशासक, संगठनकर्ता व प्रबंधक होते हैं। प्राय: इनके हाथ अंगुलियों के नख वाला भाग चौकोर होता है तथा हाथ भी ऊपर से नीचे तक चौकोर स्वरूप में दिखाई देता है।
2-कर्मठ हाथ-प्राय: इनके हाथ का ऊपरी भाग चौड़ा होता है। ऊपर से नीचे तक चौड़ाई क्रमश: घटते हुए पाई जाती है। इनके नाखून के भाग भी इसी तरह नीचे कम चौड़ाई वाला नजर आता है। कर्मठ हाथ का यही लक्षण विद्वानों ने बताया है। कर्मशील या सक्रिय हाथ: इस प्रकार के लोग प्राय: पुरुषार्थी होते हैं। कार्य करना उनकी आदत है। किसी भी कार्य का तत्काल निर्णय और क्रियान्वयन ये पसंद करते हैं। सदा चुस्त-दुरुस्त रहते हैं। ये देश, काल, परिस्थित व पात्र के अनुसार कार्य करते हैं। आत्मविश्वास से भरे रहते हैं। ये किसी भी एक परंपरा पर निर्भर नहीं रहते। समयानुसार लाभ अवसर भी प्राप्त करते हैं।
3-अभिनयात्मक या कलात्मक हाथ: इनके हाथ की अंगुलियों के अग्रभाग नुकीले होते हैं। हाथ की त्वचा चिकनी व साफ होती है तथा हाथ मांसल होता है। इस प्रकार के लोग प्राय: भावुक, संवेदनशील व सौन्द्रयप्रिय होते हैं। प्राय: प्राकृतिक वस्तुओं के प्रति आकृष्ट होते हैं। भावुकता से निर्णय लेने के कारण अपयश भी प्राप्त करते हैं। किसी भी स्त्री या पुरुष से शीघ्र मेल-मिलाप कर लेते हैं। मन की चंचलता कार्य को अधूरा छोड़ने के लिए बाध्य करती है। ये वचन के कच्चे होते हैं लेकिन रचनात्मक कार्यशैली से बड़प्पन प्राप्त करते हैं।
4-मिश्रित हाथ: प्राय: इस प्रकार के हाथ की उंगलियां विविधता लिए होती हैं। हस्त तल प्राय: चौकोर प्रतीत होता है। इनमें पहले गए समस्त गुणों का मिश्रण होता है।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजादनगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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