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प्राचीन और अर्वाचीन हिन्दू या अहिन्दू, आस्तिक तथा नास्तिक, जितने प्रकार के भारतीय हैं इन सभी के दार्शनिक विचारों को भारतीय दर्शन कहते हैं। कुछ विद्वानों द्वारा भारतीय दर्शन को हिन्दू दर्शन का पर्याय माना गया है किन्तु भारतीय दर्शन को मात्र हिन्दुओं का दर्शन समझना अनुचित है। इसके विषय में माधवाचार्य के ‘सर्व संग्रह दर्शन’ का उल्लेख किया जा सकता है, जिस ग्रंथ में चार्वाक, बौद्ध तथा जैन मतों को स्थान दिया गया है। इन तीनों मतों के प्रवर्तक वैदिक धर्मानुयायी या हिन्दू नहीं थे लेकिन इन मतों को भारतीय दर्शन में वही स्थान प्राप्त है जो हिन्दुओं के द्वारा प्रवर्तित दर्शनों को है। भारतीय दर्शन की दृष्टि व्यापक है क्योंकि भारतीय दर्शन की अनेक शाखाएं हैं तथा उनमें मतभेद भी हैं और वे एक-दूसरे की अपेक्षा नहीं करतीं। सभी विचारधाराएं एक-दूसरे के विचारों को समझने का प्रयत्न करती हैं। वे विचारों को समझने की युक्तिपूर्वक समीक्षा करती हैं तभी किसी सिद्धान्त पर पहुंचती हैं। इसी उदार मनोवृत्ति का फल है कि भारतीय दर्शन में विचार-विमर्श के लिए एक विशेष प्रणाली की उत्पत्ति हुई। इस प्रणाली के अनुसार पहले पूर्व पक्ष की विचारधारा होती है और पश्चात उसका खंडन होता है और अंत में उत्तर पक्ष या सिद्धान्त होता है। पूर्व पक्ष में विरोधी मत की पूर्ण व्याख्या होती है, उसके बाद उसका खंडन (निराकरण) होता है और दार्शनिक अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है। उत्तर दृष्टि के कारण भारतीय दर्शन की प्रत्येक शाखा अत्यंत समृद्ध है। वेदान्त मत का प्रतिपादन करते समय पहले चार्वाक, बौद्ध, जैन, सांख्य, मीमांसा, न्याय, वैशेषिक आदि मतों पर विचार किया गया है। यह प्रणाली मात्र वेदान्त में ही नहीं बल्कि अन्य भारतीय दर्शनों में भी पाई जाती है। अगर गौर से देखा जाय तो भारत का प्रत्येक दर्शन ज्ञान का एक भंडार है। यही कारण है कि जिन विद्वानों को भारतीय दर्शन का भली-भांति ज्ञान प्राप्त है वे बड़ी सुगमता से पाश्चात्य दर्शन की समस्याओं का भी समाधान कर लेते हैं। भारतीय दर्शन में तत्व चिंतन, नीतिशास्त्र, तर्क शास्त्र, मनोविज्ञान और ज्ञान मीमांसा की विभिन्न समस्याओं पर विचार किया गया है, परन्तु अलग-अलग नहीं। इस प्रवृत्ति को संश्लेषणात्मक दृष्टिकोण कहा जाता है। भारतीय दर्शन की उदार दृष्टि ही उसकी प्राचीन समृद्धि तथा उन्नति का कारक है। यदि हम अपने प्राचीन गौरव को स्थापित करना चाहते हों तो हमें प्राच्य, पाश्चात्य, आर्य तथा अनार्य, यहूदी तथा अरबी, चीनी तथा जापानी, सभी दार्शनिक मतों का पूर्ण विवेचन करना चाहिए। यदि अपनी ही विचारधारा में सीमित हो जाएंगे तो हमारी विचारधारा पुष्ट और समृद्ध नहीं हो पाएगी। दर्शन यही समझने की चेष्टा है कि मनुष्य क्या है? जीवन का रहस्य क्या है? यह संसार क्या है? इसका कोई स्रष्टा है या नहीं? मनुष्य को इस संसार में किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए?
तत्व दर्शन या दर्शन का अर्थ है तत्व साक्षात्कार। मनुजी का कथन है कि सम्यक दर्शन प्राप्त होने पर कर्म मनुष्य को बंधन में नहीं डाल सकता तथा जिनको सम्यक दृष्टि नहीं है वे ही संसार के महामोह और जाल में फंस जाते हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी, आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

keyword: indian-philosophy

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  1. Hindu world itself was coined much later ( may be at the times of greek invasion)as our historian tell us, the philosophy of Hinduism goes far back, when it was not a religion but way of life.

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  2. Nice website and interesting content. Hope you'll keep writing on these issues in detail

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