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जान स्काटस एरिजेना मध्य युग के दर्शनिक हैं। वे आयरलैण्ड के निवासी थे और बड़े प्रतिभाशाली थे। लैटिन के अतिरिक्त वह ग्रीक भाषा भी जानते थे। इनके दर्शन पर प्लेटो व प्लोटाइनस का प्रभाव पड़ा है। उन्होंने प्लोटाइनस के विचारों का इसाई धर्म के सिद्धान्तों के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है। एरिजेना का मत इस प्रकार है- ईश्वर निर्गुण व सगुण दोनों है। मुक्त जीवों के लिए निर्गुण और बद्ध जीवों के लिए सगुण। ईश्वर वस्तुत: निर्गुण और अनिर्वचनीय है। मानवी बुद्धि उसको पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर सकती। वह न स्रष्टा है न सृष्ट। उसके इस रूप का अनुभव मुक्त जीवों को होता है। हमारे लिए वह परम कारुणिक परमपिता है। कल्याण गुण संपन्न है। वह स्वयंभू है। किन्तु पिता के साथ पुत्र की सत्ता आवश्यक है। पुत्र के कारण ही पिता का नाम सार्थक होता है। यह पुत्र नित्य ज्ञान स्वरूप है और पिता के भीतर स्थित है। जब पिता अपने पुत्र को बाहर उत्पन्न कर देते हैं तब सृष्टि का कार्य प्रारंभ हो जाता है। यह उत्पन्न पुत्र ही शुद्ध आत्मा है। यह विश्वात्मा है और अन्य जीवात्माएं तथा जड़ जगत इसी के कारण उत्पन्न होते हैं। यह पुत्र पिता द्वारा सृष्ट है और स्वयं चित् व अचित् जगत का स्रष्टा है। अत: यह सृष्ट और स्रष्टा दोनों है। जीवात्माओं और जड़ पदार्थों का यह जगत केवल सृष्ट है। विश्वात्मा का जगत में प्राकट्य ईसा मसीह के रूप में होता है। वे जीवात्माओं को परम पिता से मिलाने के लिए अवतरित होते हैं। चर्च उनका शरीर है। चर्च मानव को ईश्वर से मिलाने की श्रृंखला है। ईश्वर ही सबकुछ है और सबमें उसी की सत्ता है। कैथोलिक मत की त्रयी या त्रिपुटी का जिसके पिता, पुत्र व जीव ये तीन अंग हैं। एरिजेना में ग्रीक दर्शन की सामान्य और व्यक्ति की समस्या पुन: प्रकट हुई। असली ज्वलंत सत्ता विज्ञानस्वरूप सामान्य की है। एरिजेना ने प्लेटो और प्लोटाइनस का अनुसरण करके सामान्यों की वास्तविक सत्ता स्वीकार की अत: इनका मत समन्वयवाद या अति वस्तुवाद कहलाता है। इनके बाद लगभग दो शताब्दियों तक दर्शन के क्षेत्र में अंधकार जैसा युग रहा। पुन: संत एन्सेल्म ने अपने विचारों से गति दी।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

keyword:: western-philosophy, john scootus

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