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विवाह के संदर्भ में वर एवं कन्या के माता-पिता मंगल दोष के भय से सदैव अक्रांत रहते हैं। जनमानस में मंगल दोष का भय इतना अधिक व्याप्त है कि क्न्या के माता-पिता मांगलिक कन्या हेतु मांगलिक वर खोजते हैं। इस कारण भी कन्या के विवाह में विलम्ब होता है। क्योंकि मंगल दोष के कुप्रभाव को मनीषियों व ज्योतिर्विदों ने इतना महिमामंडित किया है कि इस दोष के कारण कभी-कभी कन्याओं को आजन्म कुंवारी ही रहना पड़ता है। जनमानस नहीं जानता कि मंगल दोष का परिहार जन्मकुंडली में स्वयंमेव हो जाता है। यहां हम यही बताने की कोशिश कर रहे हैं।
मंगल दोष- जन्मांग में मंगल के लग्नस्थ, द्वितीयस्थ, सप्तमस्थ, अष्टमस्थ एवं द्वादशस्थ होने पर मंगल दोष होता है। विद्वानों का मत है कि लग्न शरीर का, चंद्र मन का, शुक्र रति सुख का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए ही लग्न से, चंद्र लग्न से व शुक्र लग्न से, प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश भाव में मंगल स्थित होने से मंगल दोष होता है। जन्म पत्रिका में जिन पांच स्थानों से मंगल दोष बनता है यदि वहां कोई एक क्रूर ग्रह, पाप ग्रह मंगल के साथ या अलग संस्थित हो तो दुगुना मंगल दोष एवं तीन ग्रह हों तो तिगुना मंगल दोष, चार ग्रह हों तो चौगुना मंगल दोष, यदि इन्हीं भावों में पांचों ग्रह पाप ग्रह एक साथ या अलग-अलग संस्थित हों तो ऐसी जन्म कुण्डली पांचगुनी मंगल दोष से ग्रसित होती है।
लग्नस्थ मंगल दोष: मंगल व्यक्ति को क्रोधी, हठीला बनाता है, क्योंकि यह उग्र एवं आक्रामक ग्रह है। लग्नस्थ मंगल की चतुर्थ दृष्टि सुख स्थान पर गृहस्थ सुख को बिगाड़ती है। सप्तम दृष्टि पति स्थान पर होने से विवाह संबंध तोड़कर दाम्पत्य सुख को खत्म करती है। मंगल की पूर्ण दृष्टि अष्टम भाव पर होने से पति-पत्नी दोनों के लिए मारक है क्योंकि अष्टम भाव सप्तम भाव से द्वितीय होने के कारण उक्त स्थिति बनेगी।
द्वितीयस्थ मंगल दोष: केरल के भाववदीपिका में द्वितीयस्थ मंगल को मंगल दोषी माना है। यह कुटुम्ब स्थान व धन स्थान है। इस भाव में बैठा मंगल जातक-जातिका को परिवारविहीन करता है। द्वितीयस्थ मंगल की दृष्टि क्रमश: पंचम, अष्टम व नवम भाव पर पड़ती है। अत: मंगल की द्वितीय स्थिति जातक-जातिका को पुत्रहीन, मानक व भाग्यहीन प्रभाव देती है। पापाक्रांत द्वितीय भावस्थ मंगल परिवार में विकट स्थिति निर्मित कर संबंधों को विध्वंस करता है।
चतुर्थ भावस्थ मंगल दोष: चतुर्थ भावस्थ मंगल जातक-जातिका के सुख स्थान पर संस्थित होता है। मंगल अचल संपत्ति तो देता है किन्तु सुख-शांति छीन लेता है। मंगल की अशुभ दृष्टि पति स्थान पर होने से पति से संबंध मधुर नहीं बन पाते हैं, वैचारिक मतभेद बना रहता है। ऐसा मंगलदोष क्षीण माना गया है। मंगल की दृष्टि सप्तम, दशम व एकादश भाव में रहती है। ऐसा मंगल पति-पत्नी को पृथक करता है किन्तु अपनी मारक दृष्टि का संधान नहीं करता, यदि पापाक्रांत न हो तो।
सप्तम भावस्थ मंगल दोष: सप्तम भाव पति-पत्नी का स्थान माना गया है। इस भाव का वैवाहिक दृष्टिकोण से अधिक महत्व है। इस भाव से दाम्पत्य सुख, विचारों में सामंजस्य, जीवनसाथी की आकृति-प्रकृति, रूप, गुण आदि पर विचार किया जाता है। सप्तम भाववस्थ मंगल लग्न स्थान, धनस्थान, कर्मस्थान पर पूर्ण दृष्टि डालता है, जिससे धन हानि, विकृत संतान, दुर्घटना, चारित्रिक पतन व व्यवसाय में अवरोध होता है। दाम्पत्य जीवन में कलह करके पति-पत्नी को अलग-अलग के लिए बाध्य करता है। मेष, सिंह, वृश्चिक का मंगल दुराग्रही, दंभी भी बनाता है। हमारे अनुभव में आया है कि किसी भी राशि का सप्तम भावस्थ मंगल अपना कुप्रभाव देता ही है। अत: मंगल दोष परिहार अवश्य कर लेना चाहिए। सप्तम भावस्थ मंगल जातक-जातिका को मृत्युतुल्य कष्ट देता है या तलाक करा देता है।
अष्टम भाववस्थ मंगल दोष: यह मंगल दोष की पराकाष्ठा है। अष्टम भाव से हमें जातक के विघ्न, बाधा, अनिष्ट, आयु, विषाद, मृत्यु, मृत्यु का कारण व स्थान का ज्ञान होता है। स्त्री की जन्कुण्डली में यह स्थान सौभाग्य सूचक माना जाता है। अष्टम भाववस्थ मंगल संपूर्ण वैवाहिक सुख का नाश करता है। शरीरिक सौन्दर्य में दाग, जीवन सहचर की मृत्यु, अपघात से सामाजिक प्रतिष्ठा को हानि व अपयश मिलता है। असहनीय मानसिक संताप झेलता हुआ जातक मर्मान्तक कष्ट पाता है। मंगल की दृष्टि धन स्थान पर होने से ऋषि पराशर के अनुसार - मृत्यौ धननाशं पराभव। सभी ऋषि-मुनियों और ज्योतिषियों ने मंगल की इस स्थिति को बहुत अशुभ बताया है। जातक-जातिका सदैव रोगग्रस्त, फलत: दाम्पत्य सुख का नाश, अल्पायु एवं दरिद्री होंगे। शास्त्रकारों का मत है कि अष्टम भाव वस्थ मंगल हो तो शुभ स्थान में बैठे शुभ ग्रह भी शुभता नहीं देते, विवाह से अधिक पीड़ा मिलती है। ऐसे मंगल का परिहार होना बहुत आवश्यक है। अष्टम भावस्थ मंगल वृष, कन्या, मकर का हो तो कुछ शुभ रहता है। मकर का मंगल संतानहीन बनाता है। कर्क, वृश्चिक, मीन का मंगल जल में डूबकर मृत्यु भय देता है। पारिवारिक कोप भी सहना पड़ता है।
द्वादश भावस्थ मंगल दोष: द्वादश भाव से भोग, त्याग, शैय्यासुख, निद्रा, यात्रा, व्यय, क्रय शक्ति व मोक्ष का विचार किया जाता है। द्वादश भावस्थ मंगल जातक-जातिका को मंगल दोष देता है, फलत: पति-पत्नी का आपस में सामंजस्य नहीं रहता है। जीवन साथी अति भोगी से अति रोगी बन जाता है। यौवन-जीवन रोग से ग्रसित हो जाता है। यौवन-जीवन अनुशासित न रहकर स्वतंत्र हो बिखर जाता है। जातक क्रोधी, कामुक, विद्रोही, दुष्कर्मी हो जाता है। धन का अभाव, दुर्घटना, विष-बाधा, रक्त विकृति, गुप्त रोग आदि व्याधियों से पीड़ित हो पत्नी से दूर हो जाता है। फलत: पति अपमानित व पत्नी घाती बन जाती है। रोग, कष्ट एवं पति की यौन क्रूरता असहनीय होती है।
आचार्य पवन कुमार राम त्रिपाठी, प्रवक्‍ता श्री काशी विश्‍वेश्‍वर संस्‍कृत महाविद्यालय मुंबई

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