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भारतीय ज्योतिष एवं संस्कृति में शास्त्रानुमोदित बहुत से व्रतों का विधान है। तिथि, मास, पर्व, देवता आदि की प्रसन्नता हेतु भिन्न-भिन्न अभिप्राय से संबंधित व्रत करने का विधान वर्णित है। वैवाहिक विलम्ब व मंगलदोष के संदर्भ में व्रत का विधान शास्त्र एवं समाज द्वारा अनुमोदित है। मृत्यु लोक के प्राणी ही क्या स्वर्गलोक में देवताओं ने भी अपनी सुख, समृद्धि, सिद्धि व श्रीवृद्धि हेतु व्रतानुष्ठान से लाभ उठाया है।
पर्वतराज हिमांचल पार्वती का विवाह श्रीविष्णु से करना चाहते थे। किन्तु अनुकूल प्रिय जीवन साथी प्राप्त करने के लिए पार्वती ने व्रतानुष्ठान किया और सदाशिव को प्राप्त किया। विष्णु पुराण में वर्णित है कि अमृत कलश व लक्ष्मी को प्राप्त करने हेतु श्रीविष्णु ने समुद्र मंथन कराया और अमृत के साथ-साथ पत्नी के रूप में श्रीलक्ष्मीजी को प्राप्त किया। आशय यह है कि व्रतानुष्ठान से अशुभफल शुभ फल में बदल जाता है। व्रत का चयन जन्मांग के आधार पर किया जा सकता है।
1-वट सावित्री व्रतानुष्ठान- यह व्रत मंगल दोष से दूषित कन्याओं के जीवन में दाम्पत्य सुख हेतु वरदान है। यह व्रत जेठ मास की अमावस को किया जाता है। इसमें वट वृक्ष की पूजा होती है। सुख-सौभाग्य, धन-धान्य प्रदाता इस व्रत में व्रत पूर्ण किए बिना स्त्रियां जल भी ग्रहण नहीं करती हैं। सावित्री द्वारा यमराज के पाश से सत्यवान के प्राण मुक्ति की कथा बड़ी ही मर्मस्पर्शी है। यह व्रत सौभाग्य समृद्धि का विलक्षण व्रत है। वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, तने में विष्णु व ऊपरी भाग में शिव का निवास व सर्वांग में सावित्री का निवास होता है। सोलह श्रृंगार सामग्री व वट वृक्ष के फल के आकार की आटे की मीठी गोलियां बनाकर, घी में सेंककर, इन्हें धागे में पिरोकर माला बनाई जाती है। पूजन की संपूर्ण सामग्री के साथ वट वृक्ष की पूजा की जाती है।
2-यदि जन्मांग में भीषण मंगल दोष हो तो घट विवाह, पीपल अथवा विष्णु की प्राण प्रतिष्ठित प्रतिमा के साथ फेरे लेकर, पूर्व तय किए हुए वर के साथ परिणय संपन्न हो तो मंगलदोष समाप्त हो जाता है। कन्या पुनर्विवाह के दोष बच जाती है। यह कार्य अत्यंत गुप्त तरीके से किया जाए। कन्या स्वयं कुंभ, पीपल या विष्णु प्रतिमा का वरण करे, माता-पिता दर्शक रहें।
3-मंगल चण्डिका स्तोत्र का पाठ नित्य 21 बार कन्या करे। घी का दीपक जलाकर निम्न पाठ करे-
रक्ष, रक्ष जगन्मातर्देवी मंगल चण्डिके।
हारिके विपदाराशेर्हर्षमंगलकारिके।।
हर्षमंगलदक्षे च हर्षमंगलदायिके।
शुभे मंगलदक्षे च शुभे मंगलचण्डिके।।
मंगले मंगलार्हे च सर्वमंगलमंगले।
सदा मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये।।
4- मंगला गौरी व्रतानुष्ठान- मंगली कन्या का विवाह यदि अनजाने में मंगल दोष रहित वर से कर दिया गया हो तो ‘मंगल-गौरी व्रतानुष्ठान’ इसके कुप्रभाव को क्षीण कर देता है। अखण्ड सौभाग्य कामना हेतु यह व्रत सब व्रतों में उत्तम है। इसके अनुष्ठान मात्र से स्त्रियों का विधवापन की अशंका दूर हो जाती है। यह व्रत विवाह के पश्चात पांच वर्ष तक करना चाहिए। यह व्रत सब पापों का नाश करता है। यह व्रत विवाह पश्चात प्रथम श्रावण मास शुक्ल पक्ष के मंगलवार से करें। गणेश पूजा, कलश पूजन, गौरी का ध्यान करें। आवाहन, आसन, अर्घ्य, आचमन, पंचांग, स्नान, गंधादि, पंचोपचार पूजा कर वस्त्र-आभूषण चढ़ाएं। धूप, दीप, नैवेद्य, पान-सुपारी, दक्षिणा अर्पित कर कथा श्रवण कर आरती करें। सात सुहागिनों को भोजन कराएं।
5- पद्म एवं मत्स्य पुराण के अनुसार मंगलवार को स्वाती नक्षत्र के योग में मंगल यंत्र की नित्य षोडशोपचार पूजा-अर्चना निम्न मंत्र से करें-
रक्तमाल्याम्बरधर: शक्तिशूलगदाधर:।
चतुर्भुजो मेषगमो वरद: स्याद्धरासुत:।।
मंगल के 21 नामों का उच्चारण करते हुए मंत्र पर लाल पुष्प अर्पित करें। ऊं भूमि पुत्राय नम:। ऊं अंगारकाय नम:। ऊं भौमाय नम:। ऊं मंगलाय नम:। ऊं भूसुताय नम:। ऊं क्षितिनंदनाय नम:। ऊं लोहितांगाय नम:। ऊं महीसुताय नम:। ऊं क्रूरदृगाय नम:। ऊं कुज:, ऊं अवनि, ऊं लोहित, ऊं महिज, ऊं कू्ररनेत्र, ऊं धराज, ऊं रुधिर, ऊं कुपुत्र, ऊं आवनय, ऊं क्षितिज, ऊं भूतनय, ऊं भूसुत, ऊं यमाय नम:।
6- हरिवंश पुराण के अनुसार मंगल दोष युक्त जातक को महारूद्र यज्ञ करना चाहिए। मंगल का अत्यधिक पाप प्रभाव हो तो महामृत्युंजय मंत्र जप कराकर शांति कराएं तथा मंगलवार व्रत करें।
7- 9 मीठे पुआ दो कन्या व दो लाल गाय को खिलाएं व दो पुआ का भोग श्री हनुमानजी को लगाएं, घी का दीपक जलाकर मंगल स्तोत्र का पाठ करें।
8-कार्तिकेय स्तोत्र का पाठ नित्य करें। पुराणों में मंगल ग्रह को युद्ध के देवता के कार्तिकेय का ही रूप माना गया है। शिव ने अपना तेज अग्नि में डाला, इन्हें अंगारक कहा गया। गंगा ने स्वीकारा और छह कृतिकाओं ने इनको पाला। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार भगवान ने वराह अवतार लिया व हिरण्याक्ष द्वारा चुराई गई पृथ्वी का उद्धार हिरण्याक्ष को मारकर किया। पृथ्वी देवी ने प्रसन्नतापूर्वक भगवान को पति रूप में वरण किया और भगवान विष्णु के साथ एक वर्ष तक एकांत में रहीं। इस संयोग से मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई।
9- लाल कपड़े, मसूर, लाल चंदन, लाल पुष्प, मीठा आदि सात बार उतार कर नदी में बहाएं। मंगलदोष क्षीण होता है।
10- मूंगा जड़ित मंगल यंत्र की पूजा अर्चना कर हनुमानजी के चरणों में चढ़ाएं।
11- मंगल नीच व अत्याधिक अशुभ हो तो मंगल से संबंधित वस्तुओं का दान किसी से न लें।
12- लाल चंदन, लाल पुष्प, बेल की छाल, जटामांसी, मौलश्री, मालकांगुनी, सिंगारक आदि में जो भी उपलब्ध हो उन्हें मिश्रित कर जल में डालें व 28 मंगलवार तक स्नान करें तो मंगल दोष शांत होता है।
13-लाल अक्षर, सुन्दरकाण्ड का पाठ, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण का पाठ करें। हनुमानजी को सिन्दूर लेप करें, स्वयं टीका लगाएं, मंगलवार के दिन दीपदान करें।
14- लाल वस्त्र, लाल पुष्प, गुड़, लाल चंदन, घी, केसर, कस्तूरी, गेहूं, मिठाई, रेवड़ी, बतासा, लाल बछड़ा आदि दान करने से मंगल के शुभत्व में वृद्धि होती है।
15- रामायण के बालकाण्ड के 234 से 236 तक का पाठ करें निम्न संपुट के साथ-
शंकर हो संकट के नाशक। विघ्न विनाशक मंगल कारण।
16- कुपित मंगल की शांति के लिए वैदिक मंत्र या पौराणिक मंत्र से हवन पूजन कराके ‘ऊं क्रां क्रीं क्रौं स भौमाय नम:’ का दस हजार जप करें।
17- इसके अलावा दीप अनुष्ठान, वृहस्पतिवार व्रत, गणगौर व्रतानुष्ठान, सौन्दर्य लहरी पाठ, सौभाग्ष्टक स्तोत्र का पाठ करने से भी मंगल दोष क्षीण होता है।
आचार्य पवन राम त्रिपाठी, प्रवक्ताम श्रीकाशी विश्वे श्वरर संस्कृीत महाविद्यालय, मुंबई

keyword: jyotish, mangal dosh

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