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अमावस्या और पूर्णिमा दो महत्वपूर्ण तिथियां हैं क्योंकि इन दोनों तिथियों पर पृथ्वी के किसी न किसी भाग में सूर्य या चंद्र ग्रहण अवश्य होता है। अमावस्या के दिन सफेद भाग सूर्य की ओर रहने से पृथ्वी पर किए गए दान, पुण्य और भोजनादि के वाष्पसंभूत अंश सूर्य की किरणों से आकर्षित होकर चंद्रमंडल (जहां पितृगण रहते हैं) में चले जाते हैं। अमावस्या के दिन चंद्रमा का प्रकाशमान भाग सूर्य के आगे आ जाने से सूर्यग्रहण होता है। ‘लोकान्तर में कहीं भी ग्रहण हुआ होगा’ इस संभावना से धर्मज्ञ मनुष्य अमावस्या को स्नान-दान इत्यादि पुण्य कार्य करते हैं। व्रतादि-दान में अमावस्या परविद्धा (प्रतिपदा युक्त) ग्रहण करना चाहिए। चतुर्दशी युक्त यानी पूर्व विद्धा अमावस्या निषिद्ध मानी जाती है।
हृषिकेश पंचांग के अनुसार 10 फरवरी दिन रविवार को सूर्योदय 6 बजकर 28 मिनट पर और अमावस्या तिथि का मान 15 दंड 35 पला अर्थात दिन में 12 बजकर 42 मिनट तक है। घनिष्ठा नक्षत्र 55 दंड 18 पला रात्रिशेष (संपूर्ण रात्रि व्यतीत होने पर) 4 बजकर 35 मिनट, वरीयान योग 35 दंड 20 पला अर्थात रात्रि 8 बजकर 36 मिनट तक है।
माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या की प्रसिद्धि मौनी अमावस्या के रूप में है। इस पवित्र
तिथि को चुपचाप रहकर अर्थात मुनियों के समान आचरण पूर्वक स्नान करने का विधान है। माघ मास में गंगा स्नान विशेषकर त्रिवेणी स्नान की बड़ी महिमा है। इस दिन तीर्थराज प्रयाग (इलाहाबाद) में भारतवर्ष का सबसे बड़ा मेला लगता है। इस वर्ष 12 वर्ष के पश्चात कुंभ का मेला रहेगा और शाही स्नान की द्वितीय तिथि होगी।
पुराणों में मौनी अमावस्या के दिन त्रिवेणी स्नान की महिमा बताई गई है। प्रयाग का स्मरण भी पाप हरण करने वाला है। पंच प्रयागों में तीर्थराज प्रयाग सर्वश्रेष्ठ है। प्रयाग की महिमा प्रयाग शताध्यायी के अतिरिक्त महाभारत के वनपर्व के साथ ही अग्नि, नारद, कूर्म, पद्म, स्कंद, मत्स्यादि पुराणों में कई अध्यायों में दी गई है। इसके साथ ही त्रिस्थलसेतु, तीर्थ कल्पतरु, तीर्थ चिंतामणि आदि ग्रंथों में भी प्रयागराज की महिमा दी गई है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि प्रयाग में स्नान करने से लोग स्वर्ग जाते हैं और जो लोग वहां प्राण त्यागते हैं उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। यदि किसी का स्वल्प अथवा थोड़ा ही पाप होगा तो प्रयाग का स्मरण करने से ही नष्ट हो जाएगा।
प्रयाग क्षेत्र में पांच कुण्ड हैं, उन्हीं के मध्य में गंगा बहती हैं। इसलिए प्रयाग में प्रवेश करते समय ही समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, यदि वह हजारों योजन दूर से भी गंगा का स्मरण करता है तो उसे परम गति प्राप्त होती है।
इस वर्ष महोदय योग में होगा स्नान-दान- यदि माघ अमावस्या का दिन रविवार, श्रवण नक्षत्र और व्यतिपाल योग से युक्त तो अर्धोदय योग और तीनों में से एक भी रहने पर महोदय योग बनता है। रविवार को होने से इस बार महोदय योग बन रहा है। इस योग में स्कंद पुराण के अनुसार सभी स्थानों का जल गंगा जलतुल्य हो जाता है। इस दिन स्नान के बाद तिल का लड्डू, आंवला व वस्त्र आदि दान किया जाता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर रूस्तमपुर, गोरखपुर

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  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (9-2-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  2. इन जानकारीपूर्ण पोस्ट के लिए बहुत धन्यवाद. मैं भी इस पोस्ट देख रहा हूँ चर्चा मंच पर भी है ।

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