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प्लोटाइनस ने एक नए दर्शन व विचारधारा की स्थापना की जो नव प्लेटोवाद के नाम से जाना जाता है। प्लोटाइनस का जन्म मिश्र में हुआ था और ये एमोनियस सैकस के शिष्य थे। यह महान दार्शनिक व रहस्यवादी संत थे। इनके ऊपर मिश्र व पर्सिया के विचारों और कतिपय विद्वानों का मत है कि भारतीय विचारधारा का भी प्रभाव पड़ा है। प्लोटाइनस प्लेटो के अनन्य भक्त हैं। इनके नव प्लेटोवाद पर कुछ प्रभाव एरिस्टाटल का भी पड़ा है। प्लेटो के साथ-साथ प्लेटो के पूर्ववर्ती ग्रीक दार्शनिकों का जैसे पाइथेगोरस, हरेक्लाइटस, पार्मेनाइडीज और साक्रेटीज का भी प्रभाव इनके मत पर स्पष्ट प्रतीत होता है। प्लोटाइनस की विचारधारा ग्रीक दर्शन की अंतिम विचारधारा है। इसाई धर्म का वेग से प्रचार होने के कारण और राजकीय सत्ता का आश्रय मिलने के कारण कालान्तर में प्लेटो का मत टिक न सका। ये ग्रीक दर्शन के अंतिम और इसाई दर्शन के आदि हैं। संत अगस्टाइन के विचार से- प्लोटाइनस में प्लेटो का पुनर्जन्म हुआ। व्यवहार और परमार्थ का भेद प्राय: सभी दर्शनों और धर्मों में किसी न किसी रूप में आया है। किसी में स्पष्ट रूप से और किसी में गुप्त रूप से। पार्मेनाइडीज में व्यवहार और सत्व का भेद है। हरेक्लाइटस में अवनत मार्ग और उन्नत मार्ग का भेद है। इसी प्रकार प्लेटो में इन्द्रियातीत और विज्ञान का, छाया और प्रकाश का भेद है। स्पिनोजा में अनित्य और नित्य का भेद है। कांट के दर्शन में व्यवहार और परमार्थ का भेद है। हेगल में भ्रम और तत्व का भेद है। भारतीय दर्शनों- वेदांत में व्यवहार और परमार्थ का, बौद्ध दर्शन में (शून्यवाद में) परतंत्र और निष्पन्न का, जैन दर्शन में पर्याय और द्रव्य का का या स्यादवाद और केवल ज्ञान का भेद है। धर्मों में भी वैदिक धर्म में सुर और असुर का, बौध धर्म में बुद्ध और मार का, जैनधर्म में जीव और पुद्गल का, पारसी धर्म में अहुरमन्दा व अहिरमान का, इसाई धर्म में ईश्वर और शैतान का तथा इस्लाम धर्म में अल्लाह और शैतान का भेद है।
पाश्चात्य दर्शन में व्यवहार और परमार्थ के भेद का सर्वप्रथम अत्यंत सुस्पष्ट और युक्तिसंगत प्रतिपादन का श्रेय प्लेटो को है। प्लोटाइनस ने भी अपने दर्शन का आधार इसे ही बनाया है। प्लोटाइनस के अनुसार परम तत्व अकेला है। यह शुद्ध सत् है जो निर्गुण, निर्विकार और निराकार है। यह अंतर्यामी भी है और परात्पर भी है। सृष्टि इसका शरीर है। यह प्लेटो का विज्ञान स्वरूप शिवतत्व है। यह सृष्टि की आत्मा है। इसके बाहर कुछ नहीं है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तयमपुर, गोरखपुर

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  1. ज्ञानवर्धक जानकारी.
    आभार

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