1
हमारे पूर्व आचार्यों, ऋषि-मुनियों ने गंभीर अध्ययन व अनुसंधान के द्वारा वास योग्य भूमि के विषय में उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त कर जनकल्याण की भावना से वास्तुशास्त्र विषय ज्ञानराशि को प्रदान किया है। इस संसार में मनुष्य या मनुष्येत्तर प्राणी अथवा कोई भी पदार्थ पंचतत्व के संयोग से ही बना है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश, इन पांच तत्वों का मनुष्य के साथ अथवा उसके पर्यावरण के साथ गंभीर संबंध है। पंचतत्व की महत्ता के कारण ही प्रकृति में इसका विशिष्ट स्थान है। निवास स्थान में यदि पंचतत्वों को उचित स्थान दिया जाय तो मनुष्य प्रकृति के अनुरूप हो उसका आत्मीय हो सकता है, इसमें संदेह नहीं।
जिस गांव या नगर में हम बसने जा रहे हैं उसके पहले यह जान लेना आवश्यक है कि वह गांव या नगर वास्तु शास्त्र के अनुरूप प्रतिष्ठित है या नहीं। अर्थात उपयुक्त दिशा व उपयुक्त स्थानों में उस गांव में देव मंदिरों की स्थिति, विभिन्न जाति वर्णों के अनुसार वासव्यवस्था तथा जलाशय आदि की व्यवस्था वास्तु के अनुरूप है या नहीं। जो गांव वास्तुशास्त्र के अनुरूप है वहीं बसने के लिए भूमि का चयन करना चाहिए। इसके बाद वह गांव किसके लिए अनुकूल है और किसके लिए प्रतिकूल यह भी जान लेना चाहिए। निवासकर्ता की नाम राशि से गांव की राशि यदि 2, 5, 9, 10, 11वीं हो तो उत्तम तथा 1, 3, 4, 7वीं हो तो सम तथा 6, 8 व 12वीं हो तो निषिद्ध समझना चाहिए। इसी तरह काकिणी, नराकृति आदि विचारों के द्वारा भी शुभकारक गांव का चयन करना चाहिए।
काकिणी विचार: अवर्ग, कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, यवर्ग व शवर्ग ये आठ वर्ग हैं। यहां अवर्ग आदि गणना क्रम से वासकर्ता के नाम की संख्या जो हो उसे दो गुना कर गांव वर्ग संख्या को उसमें जोड़ दें और उसमें आठ का भाग देने पर जो शेष बचता है वह गांव की काकिणी होती है। इसके बाद वासकर्ता और गांव के काकिणी का अंतर करने पर जिसकी काकिणी अधिक बचती है वह अर्थदायक होता है।
नराकृतिचक्र विचार: यहां सर्वप्रथम एक नराकार ग्राम शुभाशुभ ज्ञानबोधक चक्र लिखना चाहिए। इसके पश्चात ग्राम नक्षत्र से व्यावहारिक नाम नक्षत्र तक गिने। अब नराकृति चक्र से मस्तक में पांच नक्षत्र लिखें। यहां यदि गृह स्वामी का नाम नक्षत्र हो तो वह ग्राम धनादि लाभकर होता है। उसके बाद तीन नक्षत्र मुख में लिखें, मुख में नाम नक्षत्र के होने से वासकर्ता की धनहानि होती है। इसी तरह कुक्षि आदि में नक्षत्रों का न्यास कर फल का विचार करना चाहिए। इस तरह वास्तुशास्त्रानुसार ग्राम का चयन कर उसमें किस दिशा में वास्तु का चयन करें, यह विचार करना चाहिए। जैसे गृहपति का नाम वर्गांक, ग्रामवर्गांक तथा दिशावर्गांक इन तीनों वर्गांकों का योग कर नौ से भाग देकर जो एक आदि शेष बचे उसका निम्प्रकार से उद्वेग आदि फल समझना चाहिए-
उद्विग्नचित्त: परिपूर्णवित्तो वह्नयाभिभूतो ज्वरपीड़ितांग।
सौख्यान्वितो रोगयुत: सुखाढ्यो दु:खान्वित: सर्वसुखान्वितश्च।।
इसी तरह गृहदशादि का भी विचार कर उपयुक्त दिशा में प्रशस्त भूमि का चयन करना चाहिए। तात्पर्य यह है कि जिस भूमि में प्रशस्त औषधियां जैसे- जाया, जयंती, जीवन्ती, जीवपुत्र आदि हों, याज्ञिक वृक्ष जैसे - पलाश, पीपल आदि लगे हों, मधुर मिट्टी वाली भूमि, सुगन्धयुक्त, निर्मल,समान और छिद्ररहित भूमि निवास के लिए उत्तम होती है।
इसके बाद भूमि का अंत:परीक्षण भी करना चाहिए। इसके लिए गृहस्वामी के हाथ से एक हाथ लम्बी, चौड़ी व गहरी भूमि खोदकर उसे जल या मिट्टी से भरकर शुभाशुभ विचार निम्न प्रकार करना चाहिए। जैसे ज्योतिर्निबन्धकार लिखते हैं-
स्मृत्वेष्टदेवतां प्रश्नवचनस्याद्यमक्षरम्।
गृहीत्वा तु तत: शल्याशल्यं समम्यग् विचार्यते।।
अ क च ट त प य श ह्पया: पूर्वादिमध्यान्ता:।
शल्यकरा इह नान्ये शल्यगृहे निवसतान्नश:।।
इसी तरह अहिबलचक्रादि के द्वारा भी भूमि का संशोधन कर उसका प्लवादि विचार भी करना चाहिए। प्लव विचार का मण्डल मण्डलेश आदि का विचार करना चाहिए। यथा मण्डल विचार द्रष्टव्य है-
स्वामिहस्तप्रमाणेन दीर्घविस्तारसंयुतम्।
नवभिश्च हरेद्भागं शेषं मण्डलमुच्यते।।
दाता च भूपतिश्चैव क्लीवश्चौरो विचक्षण:।
षष्ठो भोगी धनाढ्यश्च दरिद्रो धनदस्तथा।।
मण्डलेश विचार द्रष्टव्य है-
स्वामिहस्तप्रमाणेन दीर्घविस्तारसंयुतम्।
द्विगुणं चाष्टभिर्भक्तं मण्लाधिप उच्यते।।
इन्द्रो विष्णुर्यमो वायु: कुबेरो धूर्जटिस्तथा।
विधाता विघ्नराजश्च मण्डलेशा: प्रीकीर्तिता:।
इन्द्र: सौख्यं यशो विष्णुर्यमो दु:खं निरंतरम्।।
वायुचोच्चाटनं कुर्यात् कुबेरो धनदो भवेत्।
धूर्जटि: कलहो नित्यं धाता सौख्यप्रवृद्धिदम्।
सर्वसिद्धं गणाधीश: फलमुक्तं मनीषिभि:।।
मण्डलादि विचार के पश्चात आंगणा विचार करना चाहिए- यथा
दीर्घविस्तरहस्तैक्यं वसुभिर्गुणितं तथा।
नवभिर्भाजिते शेषं वदेद्गेहांगणं सुधी:।।
तस्करभोगिविचक्षणदाता नृपतिर्नपुंसको धनद:।
दारिद्रयौ भयदाता नामसमाना: फलप्रदा: स्यु।।
यद्यपि आधुनिक युग में प्राय: लघु भूखंड में ही लोग भवन निर्माण करते हैं। उसमें भी खासकर मध्यमवर्ग के लोग तो लघु भूखंड का ही प्रयोग कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में उपर्युक्त व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग काम की दृष्टि से अलग-अलग घरों का निर्माण करना प्राय: दुष्कर होता है। इस कारण उक्त विस्तृत गृह व्यवस्था का इस तरह संक्षेपीकरण किया जा सकता है। जिससे मूल सिद्धान्त का अनुपालन भी हो जाए और लघु भूखंड का सदुपयोग भी। जैसे दधिमंथन गृह, घृत गृह, शास्त्रागार इत्यादि जो सामान्यतया आवश्यक नहीं है, उसे छोड़ा जा सकता है। इसी तरह रोदन गृह व रतिगृह की प्रासंगिता भी नहीं दिख रही है। रोदन गृह के स्थान पर अतिथि गृह का निर्माण किया जा सकता है।
इसके बाद स्नानागार और शौचालय विषय में आजकल की धारणा या परिस्थिति शास्त्रानुकूल नहीं देखी जा रही है, परन्तु इस विषय में ध्यातव्य है कि जहां तक हो सके शास्त्रीय विधि का ही पालन करना चाहिए। यदि वैसा सुविधाजनक न हो तो भवन के दक्षिण भाग में, पश्चिम भाग में अथवा वायव्य क्षेत्र में शौचालय व स्नानागार बनाया जा सकता है। परन्तु पूरब में नहीं बनाएं, यह उत्तम पक्ष है। यदि ऐसा भी संवभ न हो तो अग्निकोण में शौचालय का निर्माण कर उससे साक्षात् पूर्व स्नानगृह का समायोजन करना चाहिए, परन्तु नैर्ऋत्य और ईशान में ये दोनों कदापि न बनाएं।
आचार्य पवन कुमार राम त्रिपाठी
ग्राम गाजर नरसिंह, खजनी, गोरखपुर
प्रवक्ता श्रीकाशी विश्वेश्वर संस्कृत महाविद्यालय मुंबई

keyword: vastu

नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा

Post a Comment

  1. Very nice article Gajadharji:) You really put so much hard work in ur articles,keep it up:)

    ReplyDelete

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top