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निकोलस आफ कुसा का दर्शन
यह जड़ जगत और चेतन जीव दोनों ही ईश्वर के अंग हैं। ईश्वर इन दोनों की आत्मा है और इन दोनों में अंतर्यामी रूप में विराजमान है। ईश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी की स्वतंत्र सत्ता नहीं है क्योंकि जो कुछ है, ईश्वर के आधार पर टिका है। सबकुछ ईश्वर के अंतर्गत है। अद्वैत ईश्वर की आत्मा है। द्वैत ईश्वर का शरीर है। ईश्वर की महिमा और शक्ति अनिर्वचनीय और अचिन्त्य है। ईश्वर में सत् और चित् का तादात्म्य है। ईश्वर सृष्टि के केन्द्र और परिधि दोनों हैं। वे बड़े से बड़े और छोटे से छोटे हैं। वे अणु से भी अणु और महान से भी महान हैं। ईश्वर सृष्टि में अंतर्यामी हैं और सृष्टि ईश्वर के अंतर्गत है। ईश्वर एक होते हुए भी अपनी अभिन्न और अचिन्त्य शक्ति के कारण अनेकवत प्रतीत होता है। जैसे एक मुख का प्रतिविम्ब अनेक दर्पण में पड़े तो अनेक मुख दिखाई देते हैं परन्तु मुख एक ही है, भेद केवल प्रतिविम्बों में है। उसी प्रकार ईश्वर भी अपनी अचिन्त्य शक्ति के कारण जड़ और चेतन जगत के विभिन्न रूपों में अभिव्यकत होते हैं। जड़ है नश्वर ईश्वर और चेतन है मानव ईश्वर। व्यष्टि समष्टि का ही छोटा रूप है। अणु विराट का ही प्रतिविम्ब है। प्रत्येक पदार्थ संपूर्ण विश्व को और ईश्वर को अपने आप में प्रतिविम्बित करता है किन्तु विभन्न मात्राओं में। जड़, प्राण, संवेदन, बुद्धि- इन चारों में विविधि अंशों में ईश्वर का प्रतिविम्ब झलकता है। प्रत्येक में ईश्वरीय चित्शक्ति का उत्तरोत्तर विकास होता है। अनंत आनंद के अनुभव के लिए ईश्वर का साक्षात्कार आवश्यक है। ईश्वर केवल अंतर्यामी ही नहीं अपितु पर है। वे अनंत, अनिर्वचनीय और अचिन्त्य हैं। वाणी और बुद्धि की पहुंच उन तक नहीं है। उनको सर्वोत्तम निर्वचन नेति-नेति है। पश्चात के दार्शनिकों पर निकोलस आॅफ कुसा का काफी प्रभाव है। अपने-अपने अंशों में वे सब निकोलस के ऋणी हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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