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निकोलस ने ज्ञान के चार स्तर बताए हैं- प्रथम इन्द्रिय संवेदन, जिसमें बाह्य और अंतर दोनों प्रकार का प्रत्यक्ष ज्ञान आता है। द्वितीय- सविकल्प तर्क या विश्लेषणात्मक बुद्धि, तृतीय संश्लेषणात्मक प्रज्ञा और चतुर्थ निर्विकल्प ज्ञान या अपरोक्षानुभूति। प्रत्यक्ष इन्द्रिय द्वारा वस्तु का संवेदन होता है। इसमें ज्ञान धुंधला और क्षीण होता है। इन अस्त-व्यस्त संवेदनों में एकता नहीं अनेकता होती है। यह द्वैत का स्तर है। इससे ऊपर का स्तर सविकल्प तर्क या अनुमान का स्तर है। तर्क के विकल्पों में एकता और अनेकता दोनों का आभास मिलता है, यह अलग-अलग होता है। इसमें द्वैत और अद्वैत की पृथक-पृथक कल्पना उपलब्ध होती है। दोनों विरोध प्रतीत होता है। सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता है। तर्क का काम विश्लेषण और विभाग करना है। यह स्तर द्वैताद्वैत का है। इसके ऊपर उठने पर संश्लेषणात्मक प्रज्ञा का स्तर आता है जो अनेकत्व में आधारभूत एकत्व को जान लेती है। यह स्तर विशिष्टाद्वैत का है। इसमें अद्वैत द्वैत से विशिष्ट रहता है। प्रधानता अद्वैत की है परन्तु बिना द्वैत के अद्वैत नहीं रह सकता। निकोलस के अनुसार बिना अद्वैत के आधार के द्वैत भी टिक नहीं सकता है। इस स्तर पर ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान की त्रिपुटी बना रहता है। द्वैत में अन्तर्निहित सात्विक अद्वैत का साक्षात करना मानवी सविकल्प बुद्धि की पराकाष्ठा है। सविकल्प बुद्धि परमार्थ को ग्रहण नहीं कर सकती है। तत्व का साक्षात्कार निर्विकल्प ज्ञान या अपरोक्षानुभूति द्वारा ही हो सकता है, वहां वाणी, बुद्धि का प्रपंच, ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान की त्रिपुटी नहीं रहती है। यह स्तर अद्वैत का है। बुद्धि तत्व की ओर संकेत तो कर सकती है परन्तु ग्रहण नहीं कर सकती। सविकल्प बुद्धि का अपनी सीमा को जान लेना बड़ी बात है। तत्व की अज्ञेयता और अनिर्वचनीयता का ज्ञान मानवी बुद्धि की चरम सीमा है। तत्व का निर्विकल्प अनुभूति द्वारा ही साक्षात्कार हो सकता है, सविकल्प बुद्ध द्वारा ग्रहण नहीं हो सकता। तत्व के विषय में सविकल्प बुद्धि के इस अज्ञान को निकोलस ने बड़ा सुन्दर नाम दिया है- ज्ञानोत्पन्न ज्ञान। यह अज्ञान बुद्धि की चरम सीमा है। यह विद्वानों को ही सौभाग्य से प्राप्त होता है। यह मूर्खों का अज्ञान नहीं है। यह ‘अज्ञान’ तत्व की अज्ञेयता और अनिर्वचनीयता का ज्ञान है। यह ‘नेति-नेति’ का ज्ञान है। इन चारो स्तरों में नीचे का स्तर ऊपर उठने का प्रयत्न करता है और ऊपर का स्तर नीचे के स्तर को अनुप्राणित करता है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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  1. Hi Gajadhar,

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  2. I believe the highest stage can come only through samadhi!

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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