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परम तत्व उस प्याले के समान है जिसमें अनंत जल हो और समा न सकने के कारण निरंतर उसमें से बह रहा हो। जैसे जल प्रपात से निरंतर जल गिरता रहता है वैसे ही परम तत्व से सृष्टि गिरती रहती है। प्लोटाइनस कहते हैं कि इन उपमाओं से यह न समझा जाय कि सृष्टि तत्व से अलग हो जाती है या तत्व से भिन्न उसकी सत्ता है। तत्व एक, पूर्ण और अविभाज्य है। प्लोटाइनस का परम तत्व प्लेटो के विज्ञान स्वरूप शिव तत्व के समान और वेदान्त के परब्रह्म के समान है। सृष्टि में इस परम तत्व की अभिव्यक्ति चार रूपों में होती है। ये रूप हैं- ईश्वर, विश्वात्मा, जीवात्मा और जड़ जगत। इसमें से प्रत्येक ज्योति ऊपर से लेता है और नीचे भेजता है। ज्योति ज्यों-ज्यों नीचे उतरती है उतनी ही क्षीण होती जाती है। इस तारतम्य में प्रत्येक रूप अपने ऊपर के रूप का अनुकरण करता है। ब्रह्म स्वरूप अनिर्वचनीय परम तत्व विशुद्ध विज्ञान स्वरूप है। जब यह स्वयं अपना बोध करता है तो ईश्वर की अभिव्यक्ति होती है। ईश्वर परम तत्व की दृष्टि है। प्लोटाइनस ने ईश्वर को परम तत्व की दिव्य दृष्टि, दिव्य विज्ञान या दिव्य प्रकाश बताया है। यह परम तत्व का प्रतिबिम्ब है। विश्वात्मा इस दिव्य विज्ञान रूप ईश्वर का प्रतिबिम्ब है। यह सूर्य के समान है। इसकी किरणें जीवात्माओं के रूप में फूट पड़ती हैं। विश्वात्मा से जगत की अभिव्यक्ति होती है। परम तत्व की ज्योति इसमें अत्यंत मंद हो जाती है। जब तक जीव में अविद्या है, तब तक संसार है। परन्तु व्यवहार की दृष्टि से जगत को ठुकराना अनुचित है। जगत का निराकरण (निषेध) करना अच्छे व्यक्ति का लक्षण नहीं है। आत्मा ईश्वर की पुत्री है। विज्ञानस्वरूप दोनों से आत्मा नित्य है किन्तु अविद्या के कारण जीवात्माओं में भेद प्रतीत होता है। मृत्यु के उपरांत पुनर्जन्म मानना उपयुक्त है क्योंकि अपने कर्मों के फल तो जीव को भोगने ही होंगे। जीवात्मा इस जगत में आकर जड़ जगत के मोह में फंस जाती है। अत: शरीर के मोह को, सांसारिक अनित्य पदार्थ के मोह को छोड़े बिना छुटकारा नहीं हो सकता है। जीवात्माएं उन बालकों के समान हैं जिनको जन्म लेते ही उनके माता-पिता से दूर रहकर पाला गया हो और वे अपने माता-पिता के स्वरूप को भूल गए हों। अत: जीव को तुरंत ही परम तत्व का ज्ञान नहीं हो पाता। इसके लिए साधना करनी पड़ती है। जब दिव्य ज्योति उतरती है तो उसको ग्रहण करके जीव अपने बंधन से छुटकारा पा सकता है। जीवात्मा का स्वरूप भी परमतत्व का स्वरूप है। दोनों अद्वितीय हैं। जीव और परम तत्व का आकर्षण सहज है। यह आकर्षण अद्वितीय की अद्वितीय की ओर उड़ान है। स्वरूप ज्ञान होने पर आत्मा और परम तत्व का पूर्ण तादात्म्य हो जाता है। यह दिव्य आनंद है। यह दिव्य आनंद की अवस्था स्वानुभूति का विषय है, वाणी और बुद्धि का नहीं। प्लोटाइनस के बाद उसके शिष्य एथेंस में एकेडमी को अपना केन्द्र बनाकर दार्शनिक विचार प्रस्तुत करते रहे किन्तु मत के विपरीत होने से रोमन सम्राट जस्टीनियन ने 529 एडी में एकेडमी को बंद कर दिया और इस विचार पर प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रकार ग्रीक दर्शन की स्वतंत्र विचारधारा का यूरोप में अंत हुआ।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तयमपुर, गोरखपुर

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  1. bahut achha..aap itni achhi hindi kaise likh lete hein.??
    heads off to u.

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  2. It is sad that such profound philosophy was rejected and denied. Very nice article.

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