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मध्यकाल का पाश्चात्य दर्शन

केन्टरवरी के बड़े पादरी संत एन्सेल्म बहुत प्रतिभावान और चरित्रवान थे। धार्मिक मान्यताओं में उनका कट्टर विश्वास था। उनके अनुसार श्रद्धा ही ज्ञान की जननी है। ज्ञानी बनने के लिए पहले श्रद्धालु बनना जरूरी है। श्रद्धालु बनकर धार्मिक मान्यताओं पर विचार करना चाहिए। यदि धार्मिक मान्यताओं का अर्थ समझ में आ जाय तो ईश्वर की कृपा समझनी चाहिए, यदि नहीं समझ में आए तो उसे भी ईश्वर की इच्छा समझकर संतोष करना चाहिए। मानवी बुद्धि की समझ में न आने से धर्मशास्त्र के दिव्य ज्ञान (बाइबिल) की अवहेलना करना उचित नहीं है।


एरिजेना के समान एन्सेल्म भी समन्वयवादी हैं। सामान्य या विज्ञानों की अपनी स्वतंत्र सत्ता है और चिदचिद्रूप विश्व की सत्ता इसलिए है कि यह विश्व इन विज्ञानों की अभिव्यक्ति है। विज्ञान ईश्वर के उच्चरित शब्द हैं और दिव्य विज्ञान ईश्वर के अनुच्चरित शब्द हैं। उच्चारण के पूर्व भी ये दिव्य विज्ञान ईश्वर में अंतर्निहित हैं। यह दिव्य विज्ञान पुत्र है जो पिता में विद्यमान है। यह नित्य विज्ञानस्वरूप पुत्र ही सृष्टि का कारण और हमारे विज्ञानों का मूल रूप है। इस प्रकार पिता, पुत्र, जीव की त्रिपुटी में एक ही ईश्वर अस्तित्व और ज्ञान विद्यमान है। पिता, पुत्र और जीव अपने स्वरूप का भेद रखते हुए भी ईश्वरीय सत्ता और ज्ञान के उपभोक्ता हैं। इसाई धर्म के पुनीत त्रिपुटी का अर्थ समझने के लिए उन्होंने इस विचारधारा का प्रतिपादन किया। इसाई धर्म के अनुसार पिता, पुत्र, जीवात्मा की त्रिपुटी में एक ही ईश्वर की दिव्य सत्ता और दिव्य ज्ञान है। तीनों का अलग-अलग व्यक्तित्व होते हुए भी वे एक ही ज्योति से आलोकित हैं। सामान्य नित्य है और पुत्र के रूप में पिता में विद्यमान है। संत एन्सेल्म ने धार्मिक मान्यताओं में कट्टर विश्वास होने के कारण सामान्यवाद की पुष्टि की है। अपने पूर्व विद्वान संत एरिजेना के समान इन्होंने भी सामान्यवाद की सहायता से त्रिपुटी के तीनों अंगों का प्रतिपादन किया है। इनका मूल और महत्वपूर्ण कार्य रोमन कैथोलिक मत के लिए प्रमाण प्रस्तुत करना था। इसके लिए इन्होंने सत्तामूलक तर्क का सहारा लिया। सत्तामूलक तर्क का आशय है कि हमारी आत्मा में पूर्ण ईश्वर का विचार उत्पन्न होता है और इस विचार में ईश्वर की सत्ता सिद्ध है।

आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर
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  1. bahut acchi jaankari dee hai aapne . mere hisaab se gyaan aur bhakti mein bhakti ko hi chunanaa chahiye. gyaani banana sabke bas ki baat nahi hai.

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