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इसाई धर्म के प्रारंभ काल में उनके अनुयायी ईसा मसीह द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों को ही दिव्य वचन मानकर अपने जीवन को उनके उपदेशों के अनुरूप बनाने के प्रयत्न में लगे रहे। धार्मिक विश्वास ही उनकी मान्यता थी और उन्होंने तर्क की शरण में जाना उचित नहीं समझा। किन्तु कालान्तर में जब इसाई धर्म का वेग से प्रचार होने लगा और यूरोप के विद्वान और दार्शनिक भी उस धर्म को स्वीकार करने लगे तो इसाई धर्म की मान्यताओं को तर्क से सिद्ध करने का कार्य भी होने लगा। इसके लिए उन्होंने एरिस्टाटल के दार्शनिक विचारों की शरण ली। इसके अतिरिक्त ग्रीक दर्शन के वे विचार जो इसाई धर्म के प्रतिकूल नहीं पड़ते थे, वे भी स्वीकार किए गए। प्लोटाइनस का इसाई धर्म पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। दोनों के विचारों में भेद होने पर भी वह ईश्वराभिमुख थे और जगत-जीव के संबंध की, पाप की स्थिति और उसके कारण व दु:ख से मुक्ति प्राप्त कर दिव्य जीवन बिताने की समस्याओं पर वह विशेष रूप से विचार करते थे।
इसाई धर्म के अनुसार यह जगत ईश्वर की सत्य सृष्टि है। ईश्वर उसके ऊपर दिव्य लोक में रहते हैं। वे परमपिता और परम कारुणिक हैं। ईसा मसीह उनके पुत्र हैं। ईसा मसीह के उपदेशों के अनुरूप चलकर जीव इस दु:ख से छूटकर परम पिता के पास जा सकता है। जीवात्मा अमर और शाश्वत है क्योंकि वह ईश्वर की प्रतिकृति है। इन सिद्धान्तों की पुष्टि होने लगी और धीरे-धीरे इस विचार ने इसाई धर्म के दर्शन का रूप ले लिया। चर्च की मान्यताओं का स्वरूप बनने लगा। इस कार्य में शताब्दियां लग गर्इं। मध्य युग में आकर चर्च के धार्मिक विचार स्थिर हो गए। मध्य युग के पहले जिन पादरियों ने इस कार्य में योगदान दिया उसमें सबसे महान संत आॅगस्टाइन हैं। इनका कार्यकाल 354 एडी से 430 एडी तक था। युवावस्था में विलासी जीवन व्यतीत करने के पश्चात वह रोम चले गए और वहां अध्यापक हो गए। इनके ऊपर संत एम्ब्रोस का काफी प्रभाव पड़ा। प्लेटो और प्लोटाइनस का भी अध्ययन इन्होंने किया। बाद में इसाई धर्म स्वीकार कर लिए। इन्हें अपने पुराने विलासी जीवन से विरक्ति हो गई और धार्मिक जीवन प्रारंभ किया। ये हिप्पो के पादरी बने और मृत्युपर्यन्त इसाई धर्म और चर्च की पूर्ण सेवा की। इनके जीवन में दो प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं- दार्शनिक और धार्मिक। दर्शन में इन्होंने जगत को हटाकर आत्मा को केन्द्र बनाया और आत्मा के अमरत्व, स्वत: सिद्धत्व, ज्ञानस्वरूप का समर्थन किया। आत्मा ज्ञाता है और उसकी सत्ता स्वत: सिद्ध है। उसका निराकरण नहीं हो सकता है। यदि मैं अपना निषेध भी करूं तो मेरी सत्ता अनिवार्य है। पादरी बनने पर इनकी धार्मिक प्रवृत्तियां बलवती होती गर्इं और चर्च की प्रतिष्ठा करने में लग गए। इनके अनुसार ईश्वर और आत्मा को मिलाने वाली श्रृंखला चर्च है। चर्च की प्रभुता सार्वभौम होनी चाहिए। प्रथम मानव आदम को ईश्वर ने संकल्प और कर्म की स्वतंत्रता दी थी, किन्तु शैतान के बहकावे में आकर उसने निषिद्ध फल खा लिया। तभी से पाप और दु:ख संसार में छा गए। आदम के पाप से उसकी संतति सारी मानव जाति कलुषित हो गई। मानव की पाप में स्वाभाविक प्रवृत्ति हो गई। इस पाप और दु:ख से बचने का एकमात्र उपाय ईश्वर की करुणा है। ईश्वर की करुणा या प्रसाद का वितरण चर्च बपतिस्मा द्वारा इसाई बनाकर करता है। चर्च को ही उसका एकाधिकार है। चर्च ईश्वर का नगर है। सांसारिक नगर से इस दिव्य नगर का संघर्ष होता है किन्तु अंत में विजय दिव्यनगर की होती है। पाप पर धर्म की विजय निश्चित है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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