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सामान्य विशिष्ट व्यक्तिवाद का सूत्रपाल एबेलार्ड ने किया। इनका सिद्धान्त सामान्यवाद और व्यक्तिवाद का मिश्रण है। इनके अनुसार सामान्य की तात्विक सत्ता व्यक्तियों से भिन्न नहीं हो सकती। सामान्य उन साधारण गुणों को कहते हैं जिनकी सत्ता एक जाति के सब व्यक्तियों में समान रूप से हो। ये गुण हमारी बुद्धि की कल्पना नहीं हैं, ये वास्तविक गुण हैं जो वस्तुओं में वस्तुत: रहते हैं। इनकी प्रतिकृति हमारी बुद्धि में भी रहती है। इन गुणों के मूल रूप ईश्वर के विज्ञान में रहते हैं। एबेलार्ड के अनुसार सामान्यों की सत्ता तीन प्रकार की होती है- 1- सांसारिक वस्तुओं के यथार्थ गुणों के मूल रूप में ईश्वर के विज्ञान में इनकी सत्ता है। 2- सांसारिक वस्तुओं में इनके यथार्थ गुणों के रूप में इनकी सत्ता है। 3- इन गुणों की प्रतिकृति के रूप में हमारी बुद्धि में इनकी सत्ता है। इस मत को कान्सेप्टुलिज्म कहा जा सकता है। दूसरा कार्य जो एबेलार्ड ने किया वह था तर्क का महत्व बतलाना। धर्म के सिद्धान्तों को तर्क से सिद्ध कर मानना चाहिए। अंधविश्वास ठीक नहीं है। संदेह पाप नहीं है, वह सच्चे दर्शन का जनक है। संदेह साधन मात्र है, साध्य नहीं। इनके दर्शन में धार्मिक सहिष्णुता और उदारता है। ये अन्य धर्मों के विद्वानों, संतों और दार्शनिकों का भी आदर करते थे। इसाई त्रिपुटी के तीनों अंगों को इन्होंने तीन तत्व न मानकर एक ही तत्व के तीन गुणों के रूप में स्वीकार किया। इनके विचारों का पादरियों ने बड़ा विरोध किया। इनकी धार्मिक उदारता से वे क्षुब्ध हुए। कालान्तर में इनके विचारों का प्रभाव विद्वानों पर पड़ा और बाद में धर्म के अंधविश्वास तर्क के प्रहारों से गिरने लगे। चर्च अपनी विचारधारा का संतोषजनक समाधान न कर सका। चर्च के लोगों ने राज्य की सहायता से एक धार्मिक न्यायालय स्थापित किया और इसाई धर्म के ईश्वर के प्रति विद्रोह राजद्रोह ठहराया गया। इस विद्रोह का दंड मृत्युदंड था। एबेलार्ड के विचारों का प्रभाव तत्कालीन विद्वानों पर पड़ा है ओर वे जीवन और जगत को समझने के लिए धीरे-धीरे इसाई धर्म से पृथक होकर प्रयास करने लगे। ग्रीक भाषा के मौलिक ग्रंथों के अनुसार किए जाने लगे। इस प्रकार परवर्ती विद्वानों पर प्लेटो और एरिस्टाटल का प्रभाव पड़ा। इसाई धर्म ने प्लेटो की बजाय एरिस्टाटल का अधिक आदर किया। संत टामस एक्विनस पर एरिस्टाटल का बहुत प्रभाव पड़ा और उन्होंने जिस दर्शन की प्रतिष्ठा की वह वर्षों तक चर्च का मान्य दर्शन बना रहा।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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