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फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली आमलकी एकादशी इस वर्ष 23 मार्च को पड़ रही है। यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली है। इस दिन व्रत करने वाले मनुष्य पर नारायण की कृपा बनी रहती है। यह भगवान विष्णु को अतिप्रिय है। इस दिन भगवान की पूजा का विशेष विधान है। 23 मार्च को एकादशी तिथि का मान 22 दंड 26 पला है अर्थात दिन में 2 बजकर 56 मिनट तक एकादशी है। इसलिए इस वर्ष वैष्णव व स्मार्तों दोनों के लिए व्रत का यही दिन प्रशस्त रहेगा।
आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति: विष्णु पुराण एवं पद्मपुराण के उत्तरखंड में भगवान कृष्ण युधिष्ठर से कहते हैं कि राजा मान्धाता के प्रश्न करने पर महात्मा वशिष्ठ ने कहा कि भगवान विष्णु के थूकने से चंद्रमा के समान कांतिमय एक बिन्दु पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ जिससे आमलकी (आंवले) का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसी समय भगवान ने प्रजा की सृष्टि के लिए ब्रह्माजी को उत्पन्न किया और उन्होंने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा नाग व महर्षियों को जन्म दिया। उनमें से देवता व महर्षि उसी स्थान पर आए जहां आंवले का वृक्ष था। तभी आकाशवाणी हुई कि हे महर्षियों! यह सर्वश्रेष्ठ आंवले का वृक्ष है जो भगवान विष्णु को अतिप्रिय है। इसके स्मरण मात्र से ही सहस्र गोदान का फल मिलता है। आंवले के वृक्ष के स्पर्श मात्र से दुगुना व फल खाने से तीनगुना पुण्य प्राप्त होता है। इस पेड़ के मूल में विष्णु, ऊपर ब्रह्मा, तने में रूद्र, शाखाओं में मुनिगण, टहनियों में देवता, पत्तों में आठ वसुगण, फूलों में मरुदगण और फलों में समस्त प्रजापति वास करते हैं। आमलकी एकादशी के दिन आंवले का सेवन करना चाहिए।
व्रत विधि: व्रती को दशमी की रात्रि में एकादशी व्रत के साथ भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए शयन करना चाहिए तथा आमलकी एकादशी के दिन प्रात:काल संकल्प लेना चाहिए। पुन: आंवले के समीप बैठकर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। इस वृक्ष की 108 या 28 परिक्रमा की जाती है। भगवान विष्णु का चित्र स्थापित कर उत्तम प्रकार के गंध, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पण कर नीराजन करना चाहिए। इस दिन विष्णु के अवतार भगवान परशुरामजी के पूजन का भी विधान है। संपूर्ण दिन भगवान विष्णु का स्मरण करें। आंवले के वृक्ष के समीप बैठकर संपूर्ण रात्रि जागरण और भगवत नाम स्मरण का विधान है। जागरण से जो फल प्राप्त होता है वह हजारों वर्ष तपस्या करने से भी नहीं प्राप्त होता।
व्रत कथा: वशिष्ठ जी ने राजा मान्धाता को व्रत कथा सुनाई थी। राजा चैत्ररथ के पास दस हजार हाथियों की सेना थी। वह विदिशा नगर का राजा था। एक दिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी के दिन राजा प्रजा समेत प्रात:काल नदी के किनारे गया और स्नान कर भगवान विष्णु के मंदिर में प्रवेश किया। वहां आंवले का वृक्ष था। राजा आंवले के वृक्ष को जल अर्पित किया, वहां अन्य लोग परशुराम जी का पूजन कर रहे थे। राजा ने भी आदर पूर्वक पूजन कर आंवले के वृक्ष की परिक्रमा कर प्रार्थना की- हे आमलकी! आप हमें समस्त प्रकार के पापों से मुक्त करें। राजा वहीं रात्रि जागरण किया। वहीं एक शिकारी भी निराहार रहकर प्रार्थना कर रहा था कि मृत्यु के बाद वह स्वर्ग चला जाय। पुन: पृथ्वी लोक पर वह शिकारी राजा के रूप में जन्म ग्रहण किया और एकादशी का व्रत करने लगा। एक बार सेना लेकर वह जा रहा था तभी शत्रुओं से घिर गया। परन्तु उसके शरीर से एक दिव्य स्त्री प्रकट हुई और उसने शत्रुओं का विनाश कर दिया। उसने प्रसन्न होकर भगवान का स्मरण किया और प्रजा को आमलकी एकादशी का महात्म्य सुनाया। इस व्रत के प्रभाव से राजा ने निष्कंटक राज्य किया और प्रजा को सुखी बनाया।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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