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चार्वाक विचारधारा के अनुसार प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है। अनुमान, शब्द आदि जितने अप्रत्यक्ष प्रमाण हैं, सभी संदिग्ध या भ्रममूलक हैं। अत: प्रत्यक्ष से ज्ञात वस्तुओं के अतिरिक्त और भी किसी वस्तु के अस्तित्व को नहीं माना जा सकता है। प्रत्यक्ष के द्वारा हमें भौतिक जगत का ज्ञान मिलता है। जड़ जगत चार प्रकार के भौतिक तत्वों से बना हुआ है। वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी। इन तत्वों का ज्ञान हमें इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होता है। संसार में जितने द्रव्य हैं वह चार प्रकार के तत्वों से बने हुए हैं। चार्वाकों के अनुसार आत्मा के अस्तित्व के लिए कोई भी प्रमाण नहीं है। मनुष्य पूर्णतया भूतों से ही बना हुआ है। ‘मैं स्थूल हूं’, ‘मैं क्षीण हूं’, ‘मैं पंगु हूं’ इन वाक्यों से बिल्कुल साफ है कि मनुष्य और उसके शरीर में कोई भेद नहीं है। मनुष्य में चैतन्य है किन्तु चैतन्य मनुष्य शरीर का विशेष गुण है। चैतन्य की उत्पत्ति भौतिक तत्वों से होती है। कुछ लोगों का कथन है कि भौतिक तत्व अचेतन होता है परन्तु चार्वाकों के अनुसार इससे बनी वस्तुएं अचेतन नहीं हो सकतीं। इसलिए अचेतन से चेतन की उत्पत्ति होती है। इस तरह उत्पन्न वस्तुओं में नए गुणों का भी आविर्भाव होता है। यद्यपि लाल रंग न तो पान में, न सुपाड़ी में और न चूने में है, फिर भी उसके चबाने मात्र से लाल रंग की उत्पत्ति हो जाती है। गुड़ में मादक द्रव्य नहीं है फिर भी गुड़ के सड़ जाने से मादक द्रव्य की उत्पत्ति हो जाती है। इसी तरह भौतिक द्रव्यों का जब विशेष ढंग से मिश्रण होता है तब जीव शरीर में चैतन्य उत्पन्न होता है और शरीर के नष्ट होने पर चैतन्य भी नष्ट हो जाता है। मृत्यु के बाद कुछ भी अवशिष्ट नहीं रहता। अत: मृत्यु के बाद कर्मों के फल भोग की कोई संभावना नहीं है। इसीलिए चार्वाकों ने कहा है- ‘यावज्जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत’। चार्वाक दर्शन के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व सत्य भी नहीं है क्योंकि ईश्वर का भी प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता। ईश्वर का ज्ञान अप्रमाणित होने पर उसके द्वारा संसार का निर्माण करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए ईश्वर की आराधना और स्वर्ग की कामना निरर्थक बातें हैं। वेदों व पुरोहितों में श्रद्धा रखना मूर्खता है। पुरोहित तो मनुष्य की श्रद्धा भावना से अनुचित लाभ उठाकर अपनी जीविका निर्वाह करते हैं। अत: बुद्धिमान मनुष्यों को चाहिए कि अधिक से अधिक सुख प्राप्ति को ही जीवन का लक्ष्य बनाएं। सुख का परित्याग इसलिए नहीं करना चाहिए कि वे दु:खों से मिले रहते हैं, भूसे के कारण अन्न का परित्याग नहीं किया जा सकता। पशुओं के चरे जाने के कारण अनाज का बोना नहीं छोड़ा जा सकता। जीवन को अधिक से अधिक सुखमय बनाने तथा दु:ख को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।
भारत में जड़वाद प्राचीन काल से ही किसी न किसी रूप में प्रचलित है। इसक उल्लेख वेदों में, बौद्ध ग्रंथों में, पुराणों तथा दार्शनिक ग्रंथों में भी पाया जाता है। इस मत पर कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं पाया गया है। अन्य दर्शनों की तरह इसके समर्थकों का न तो सुगठित संप्रदाय मिलता है और न ही कोई ग्रंथ। लेकिन प्रत्येक भारतीय दर्शन में चार्वाक मत अर्थात जड़वाद का खंडन किया गया है। कुछ विद्वानों का मत है कि चार्वाक एक ऋषि का नाम था, इसलिए उनके अनुयायी भी चार्वाक कहलाए। इस तरह जड़वाद का दूसरा नाम चार्वाक हो गया। कुछ विद्वानों का कथन है कि देवगुरु वृहस्पति ने चार्वाक मत का प्रचार असुरों में किया था ताकि इसके अनुसार चलने से उनका नाश हो जाय और देवता सुरक्षित हो जायं। वेदों में उल्लेख है कि महर्षि लोक के पुत्र वृहस्पति जिन वैदिक ऋचाओं की रचना किए उनमें विद्रोह की लहर है। महाभारत तथा अन्य कतिपय ग्रंथों में इस बात का उल्लेख पाया जाता है कि जनवादी विचारों का समर्थन वृहस्पति ने किया है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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