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हथेली पर उत्कीर्ण रेखाएं गर्भावस्था में बंद मुट्ठियों से उत्पन्न सलवटें मात्र नहीं हैं वरन ये व्यक्ति की वर्तमान एवं भविष्य के मन-मस्तिष्क एवं शरीरिक स्थिति को अभिव्यक्त करती हैं। न केवल रेखाएं वरन हाथ की बनावट और उसमें स्थित उभार आदि तथा अंगुलियों व अंगूठे की बनावट आदि से व्यक्ति के व्यक्तित्व, विचार, मन:स्थिति, शारीरिक स्थिति, कर्म, भविष्य आदि के बारे में जाना जा सकता है। हस्तरेखा से शारीरिक एवं मानसिक रोग का भी अध्ययन किया जाता है। यह चिकित्सा रेखा शास्त्र कहलाता है। हस्त रेखाशास्त्र में हाथ के अंतर्गत मणिबंध से लेकर अंगुलियों की नोंक तक सम्मिलित किया जाता है। इस प्रकार इसके अंतर्गत मणिबंध, हथेली, अंगुष्ठ, अंगुलियां एवं इन सबके अग्र एवं पृष्ठ भाग सम्मिलित होते हैं। स्थूल रूप से हाथों को सात वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है।
वर्गाकार हाथ: वर्गाकार हाथ में सामान्यत: गुरु एवं शुक्र पर्वत उन्नत होते हैं। सामान्यत: ऐसे व्यक्तियों में गंभीरता एवं प्रौढ़ता होती है। बाल जल्दी ही सफेद होने लगते हैं। यदि वर्गाकार हाथ वालों का गुरु पर्वत अति विकसित हो तो व्यक्ति को उदर संबंधी रोग होते हैं। ऐसे व्यक्ति को आंतों, गालब्लाडर, लीवर, किडनी आदि से संबंधित रोग होने की आशंका होती है। ऐसे व्यक्ति पीलिया इत्यादि से शीघ्र ग्रसित होते हैं। वर्गाकार हाथ में यदि शनि क्षेत्र के समीप मस्तिष्क या जीवन रेखा में एकाएक कोई विकार उत्पन्न होता है तो बात एवं पित्त संबंधी रोग अधिक होते हैं और व्यक्ति को बड़ी आंत से संबंधित रोग से पीड़ा मिलती है। यदि सूर्य क्षेत्र में विकार होता है तो व्यक्ति को टाइफाइड, पेट में गर्मी, जलन आदि की शिकायत होती है। यदि शुक्र क्षेत्र पर जाल या विकार हो तो अंत:स्रावी गंथियों से संबंधित बीमारी हो सकती है। ऐसी बीमारियों में प्रमुख डाइबिटीज है।
चमसाकार हाथ: यह चम्मच के आकार का हाथ होता है। ऐसे हाथ वाले व्यक्ति को जीवन में एक बड़ी चोट अवश्य लगती है। सामान्यत: पैर की हड्डी टूटना, मोच आना आदि की समस्या होती है। ऐसे व्यक्तियों के सिर में भी चोट लगने की आशंका रहती है। चमसाकार हाथ वाले जातकों को हृदय एवं रक्तचाप संबंधी रोगों से भी सावधान रहना चाहिए। कई बार ऐसे व्यक्तियों को उच्च रक्तचाप के कारण मस्तिष्काघात अथवा लकवा जैसी बीमारियां भी हो जाती हैं।
कलात्मक हाथ: कलात्मक हाथ वाले व्यक्ति सामान्यत: दुबले-पतले होते हैं। वे मद्यपान, सिगरेट, सिगार, तम्बाकू इत्यादि का सेवन करते हैं। इसकी अधिकता से तपेदिक, अस्थमा, फेफड़ों की खराबी, गले या मुंह का कैंसर जैसे घातक रोग हो जाते हैं। ये कुपोषण के शिकार होते हैं। प्रौढ़ावस्था में कई प्रकार की बीमारियां प्रारंभ हो जाती हैं। वृद्धावस्था में काफी अस्वस्थ हो जाते हैं।
दार्शनिक हाथ: ये मनोरोग से ज्यादा ग्रसित रहते हैं। इन्हें अवसाद, अनिद्रा, पागलपन आदि रोग ज्यादा होते हैं। दार्शनिक हाथ वाले व्यक्ति उच्च एवं निम्न दोनों ही प्रकार के रक्तचाप से पीड़ित होते हैं। रक्तचाप का कारण शरीरिक न होकर मानसिक होता है।
कोणिक हाथ: इस प्रकार के हाथ में अंगुलियों का झुकाव अंगूठे की ओर होता है। सामान्यत: कोणिक हाथ वाले व्यक्ति स्वस्थ होते हैं और कम बीमार पड़ते हैं परन्तु जब बीमार पड़ते हैं तो लम्बी अवधि के लिए। सामान्यत: ऐसे लोग दीर्घकालीन रोगों के शिकार होते हैं।
आदर्शवादी हाथ: इस तरह के हाथ को साइकिक हैंड भी कहा जाता है। सामान्यत: ऐसे व्यक्ति बाल्यावस्था एवं युवावस्था में स्वस्थ रहते हैं परन्तु प्रौढ़ावस्था व वृद्धावस्था में अनेक प्रकार के रोगों के शिकार हो जाते हैं। उदर व हृदय संबंधी रोग इनमें ज्यादा होते हैं। मनोरोग की भी इनमें अधिकता होती है।
मिश्रित हाथ: मिश्रित हाथ वालों में अनेक प्रकार के रोग हो सकते हैं। जिस प्रकार के हाथ के लक्षण अधिक होते हैं उनसे संबंधित रोगों की अधिकता होती है। सामान्यत: ऐसे जातकों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है और वे शीघ्र ही मौसमी बीमारियों के शिकार होते हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

keyword: hast rekha, palmistry

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  1. agar jankari ke saath hathon ke chitr bhi hote to achche se samajh aata ki ye prastut hast warg kis tarah ke hote hain

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