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विश्व के मूल तत्वों के संबंध में चार्वाक का मत उनके प्रमाण संबंधी विचारों पर अवलम्बित हैं। चूंकि प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है इसलिए हम केवल उन्हीं वस्तुओं का अस्तित्व मान सकते हैं जिनका प्रत्यक्ष हो सकता है। ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग, जीवन, जीवन की नित्यता, अदृष्ट आदि विषयों को हम नहीं मान सकते क्योंकि उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है। हमें केवल जड़ द्रव्यों का ही प्रत्यक्ष होता है। अत: हम केवल उन्हीं को मान सकते हैं। इस तरह चार्वाक जड़वाद का प्रतिपाद करते हैं। उनके अनुसार जड़ ही एकमात्र तत्व है। जड़वाद के निर्माण के संबंध में अनेक भारतीय दार्शनिकों का मत है कि आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन पंचमहाभूतों से जगत निर्मित है। किन्तु चार्वाक आकाश के अस्तित्व को नहीं मानते क्योंकि इसका ज्ञान अनुमान के द्वारा होता है, प्रत्यक्ष नहीं। इन पदार्थों से निर्जीव पदार्थों की ही उत्पत्ति नहीं हुई है बल्कि उद्भिज आदि सजीव द्रव्य भी इन्हीं से उत्पन्न हुए हैं। प्राणियों का जन्म तत्वों के संयोग से होता है। मृत्यु के बाद वे फिर भूतों में मिल जाते हैं।


प्रत्यक्ष दो प्रकार के हो सकते हैं- बाह्य तथा मानस। चार्वाक स्वीकार करते हैं कि चैतन्य का ज्ञान प्रत्यक्ष के द्वारा होता है किन्तु ये नहीं मानते कि चैतन्य किसी अभौतिक तत्व अर्थात आत्मा का गुण है। इनके अनुसार शरीर से भिन्न यदि आत्मा का अस्तित्व नहीं है तो उसके अमर या नित्य होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। मृत्यु के बाद जीवन नष्ट हो जाता है और उसे ही जीवन का अंत समझना चाहिए। पूर्व जीवन, भविष्य जीवन, पुनर्जन्म, स्वर्ग, नरक, कर्मभोग आदि सभी विश्वास निराधार हैं। जड़भूतों के अंतर्निहित स्वभाव से ही जगत की उत्पत्ति होती है, इसलिए चार्वाक मत ‘स्वभाववाद’ कहलाता है। इसे ‘यदृच्छावाद’ भी कहते हैं। संसार की उत्पत्ति किसी प्रयोजन साधन के लिए नहीं हुई है। संसार जड़ तत्वों का आकस्मिक संयोग है। चार्वाक शास्त्रों, धर्म-अर्धम व परलोक को नहीं मानते, इसलिए यज्ञादि कर्मों का घोर विरोध करते हैं। इनके अनुसार स्वर्ग पाने के लिए, नरक से बचने के लिए या प्रेतात्माओं की तृप्ति के लिए वैदिक कर्म करना सर्वथा व्यर्थ है। नीचे की कोठरी में अर्जित किया भोजन ऊपर की कोठरी में रहने वालों की भूख नहीं मिटा सकता। चार्वाकों के लिए आहार-व्यवहार के अतिरिक्त कोई धर्म नहीं है और लोक व्यवहार भी सुख के लिए ही है।

चार्वाक सुख को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं। उनके अनुसार सफल जीवन वही है जिसमें अधिक से अधिक सुख भोग होता है। अच्छा कार्य वही है जिसमें दु:ख की अपेक्षा सुख ज्यादा मिलता है। इस मत को प्रत्यक्षवाद व सुखवाद भी कहा जा सकता है। चार्वाक मृत्यु को परम मुक्ति मानते हैं। वृहस्पति सूत्र में कहा गया है- ‘मरणं एव अपवर्ग’ अर्थात मृत्यु से ही दु:ख और सुख दोनों से छुटकारा मिलता है। ग्रीस के दार्शनिक एपिक्यूरस के अनुयायियों की तरह भारत के चार्वाकों को लोगों ने घृणा की दृष्टि से देखा परन्तु इसने संशय उत्पन्न करके अन्य भारतीय दर्शनों को पुष्ट किया है। क्योंकि इसके विरोध में उन्होंने अनेक प्रमाण देकर इसका खंडन किया।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी, आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

keyword: charvak darshan, indian-philosophy

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  2. यह सब गलत मान्यता है . इन मान्यता को अमल कर तो काफी गलत कार्य और अपराध हो सकते है .

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  3. Yaavat jeevet sukhen jeevet.......USA HAS FOLLOWED THE POLICY OF LIVING ON DEBTS &^ SEE THE RESULTS.

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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