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महर्षि वात्स्यायन भी चार्वाकों की तरह तीन पुरुषार्थों को ही मानते थे। उन्होंने नैतिक विषयों पर विचार किया है। वह ईश्वरवादी थे लेकिन परलोक को नहीं मानते थे। वे मोक्ष को पुरुषार्थ नहीं मानते थे और काम को श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया। इनके अनुसार धर्म, अर्थ और काम ये तीन पुरुषार्थ हैं और इस त्रिवर्ग का उचित सामंजस्यपूर्वक सेवन करना चाहिए। वे कहते हैं कि धर्म और अर्थ को काम प्राप्ति का साधन मात्र समझना चाहिए। धर्म और अर्थ अंतिम लक्ष्य नहीं हैं, अंतिम लक्ष्य केवल काम है। वात्स्यायन का सुखवाद इसलिए शिष्ट समझा जा सकता है कि वे ब्रह्मचर्य, धर्म तथा नागरिक वृत्ति को अधिक महत्व देते हैं। इनके बिना मनुष्य का सुखभोग पाशविक सुखभोग से भिन्न नहीं होगा। वात्स्यायन के अनुसार पंचेन्द्रियों की तृप्ति ही काम या सुख का मूल है। शरीर रक्षा के लिए जिस तरह भूख की शांति नितांत आवश्यक है, उसी तरह इन्द्रियों की तृप्ति भी परम आवश्यक है। किन्तु इन्द्रियों को चौसठ ललित कलाओं के अभ्‍यास के द्वारा शिष्ट और संयत बनाना चाहिए। कोई व्यक्ति इन ललित कलाओं का अभ्‍यास करने का अधिकारी तभी होता है जब उसने बाल्यकाल में ब्रह्मचर्य का पालन किया हो तथा वेदों का अध्ययन किया हो। शिक्षा के बिना मनुष्य का सुख भोग पाशविक सुखभोग से भिन्न नहीं हो सकता। वात्स्यायन कहते हैं कि सुख प्राप्ति के लिए अधैर्य घातक होता है। आधुनिक वैज्ञानिक की तरह वात्स्यायन यह कहते हैं कि हमें सुख भोग की अवस्थाओं तथा साधनों का विचार-विश्लेषण करना चाहिए। कार्य तभी सफल हो सकता है जब उसका आधार शास्त्र (विज्ञान) पर आधारित हो। वह सुखवादी थे, ऐसे विचारक शिष्ट चार्वाक में परिगणित हो सकते हैं। ‘श्रामण्य फलसूत’ इत्यादि बौद्ध ग्रंथों में भिन्न प्रकार के संशयवादियों, अज्ञेयवादियों, वितंडावादियों तथा स्वेच्छाचारवादियों का उल्लेख मिलता है। पूरन कस्रुण पाप-पुण्य या किसी प्रकार का नैतिक दायित्व नहीं मानते थे। मक्खलि गोशालक नियतिवादी थे। अजित केसकम्बली का मत था कि मनुष्य जड़ द्रव्य से उत्पन्न है और विनाशशील है। उनका यह भी कथन था कि यथार्थ ज्ञान असंभव है और सत्कर्मों का फल नहीं होता है। संजय वेलट्टिपुत्र किसी प्रचलित मत के विषय में पूछने पर चतुष्कोटि न्याय से उत्तर देते थे। ‘तत्वो पल्लव सिंह’ नामक एक प्राचीन पाण्डुलिपि में चरम संशयवाद का मनोरंजक नमूना है। इसके प्रणेता जयराशि परले सिरे के चार्वाक या लौकायितिक हैं। बुद्धिवाद विरोधी व्यवहारवादियों की तरह वे भी इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सभी सिद्धान्तों का निषेध करने पर भी व्यावहारिक जीवन पूर्ववत मजे में चलता रहेगा।


हालांकि चार्वाक के प्रमाण विज्ञान की देन कम महत्वपूर्ण नहीं है। चार्वाक के नाम से उनके विपक्षियों ने अनुमान के खंडन के लिए जो युक्तियां दी हैं वे भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। इस तरह की युक्तियां आधुनिक पाश्चात्य तर्कशास्त्र में पाई जाती हैं। चार्वाक के अनुसार अनुमान के निश्चित ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है। पाश्चात्य देशों के प्रेग्मेटिक या लॉजिकल पॉजिटिविस्ट आदि अनेक संप्रदायों के विद्वानों का भी कुछ ऐसा ही मत है। लोकायतिक दर्शन में दण्डनीति तथा वार्ता का भी विचार पाया जाता है। प्राचीन काल में कुछ चार्वाक राजा को ईश्वर मानते थे। इससे स्पष्ट है कि वे समाज तथा उसके प्रमुख की आवश्यकता को मानते थे।

आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी, आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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