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गोकुल अतिथि गृह सिविल लाइन्स गोरखपुर में ओशो प्रेमियों द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय ओशो नृत्य ध्यान शिविर की शुरुआत 7 मार्च को संध्या सत्संग से हुई। संध्या सत्संग की विशेषता यह है कि भगवान श्रीरजनीश ‘ओशो’ ने कहा था कि मैं शरीर में भ्‍ले न रहूं लेकिन जहां भी संध्या सत्संग होगा और उसमें पांच लोग शामिल होंगे, वहां मैं सूक्ष्म रूप से उपस्थित रहूंगा। फिर बाद में उनकी करुणा और बढ़ी और कहा कि जहां शाम को एक व्यक्ति भी संध्या सत्संग करेगा, मेरी उपस्थिति महसूस करेगा। शिविर का उद्घाटन पूर्व कमिश्नर के. रविन्द्रनायक की धर्मपत्नी श्रीमती हिमा बिन्दु नायक ने दीप प्रज्वलित कर की। उन्होंने कहा कि ध्यान अंतर के जगत से परिचय कराता है। हम बाहर की दौड़ में थक जाते हैं और भीतर के जगत में यात्रा कर आनंदित होते हैं। शिविर संचालक मां ध्यान आभा ने ध्यान में प्रवेश करने पूर्व कुछ सावधानियों से साधकों को अवगत कराया। उन्होंने कहा कि चूंकि यह नृत्य विशेष ध्यान शिविर है इसलिए कोशिश होगी कि ओशो द्वारा नृत्य पर जो ध्यान प्रयोग दिए गए हैं, उनका अधिक से अधिक प्रयोग कराया जाय। गुरजिएफ की ध्यान विधि है- नो डायमेंशन, ओशो की ध्यान विधि कुण्डलिनी, सूफी नृत्य, नटराज, हर्ट टू हर्ट आदि का विशेष रूप से प्रयोग कराया जाएगा। स्वामी अंतर जगदीश ने कहा कि नृत्य जब बिना किसी पूर्ववत तैयारी के होता है, बिना किसी बंधन के होता है तो उसमें हमारे मूल दस ऊर्जा पथों में जो ऊर्जा सक्रिय होती होती उसे ध्यान में ले जाना आसान होता है। भगवान शिव नृत्य के सबसे बड़े प्रणेता हैं उन्होंने 112 ध्यान विधियां दी, इसीलिए उनका एक नाम नटराज भी है। नृत्य का ध्यान से गहरा जोड़ है। नृत्य पर ओशो की वाणी से भी लोग इस शिविर में परिचित होंगे और उनका प्रयोग भी कराया जाएगा। इसके बाद संध्या सत्संग की शुरुआत मद्धम प्रकाश में शांत व मधुर म्यूजिक के साथ हुई। म्यूजिक की गहराई बढ़ती गई और श्वेत गाउन में साधक झूमने लगे। लगभग 20 मिनट तक गुरु प्रति अहोभाव में नृत्य करते रहे। इसके बाद ड्रम की तीन आवाज के साथ तीन बार समवेत स्वर में ‘ओशो’ उच्चारण किया और मौन, शांत बैठ गए। ध्यान के बाद साधकों ने ओशो के आडियो प्रवचन का भी आनंद लिया। ओशो ने अपने प्रवचन में कहा कि तीन दिनों के लिए आप सब अपना घर-बार छोड़कर आए हैं ताकि अपने एकांत व अकेलेपन को जी सकें। इन तीन दिनों के लिए पूरी तरह आनंदित और गैर गंभीर रहें, एकांत और मौन को जिएं, बातचीत जितनी कम होगी, ध्यान की गहराई उतनी ही बढ़ेगी। शिविर में भारी संख्या में साधकों ने हिस्सा लिया। अंतिम दिन कुल 14 लोगों ने संन्यास लेकर जीवन की नई पारी शुरू की। संन्यास के समय माहौल उत्सव पूर्ण था। सभी के पैर थिरक रहे थे और संन्यास लेने वाले नए जीवन में प्रवेश की खुशी में नाच रहे थे तो पुराने संन्यासी अपने मार्ग पर कुछ नए सहयात्रियों के आ जाने से खुश थे। वहां केवल नृत्य था और ध्यान की ऊर्जा, शांति भी अपनी गरिमा में उपस्थित थी। संन्यास मां ध्यान आभा व स्वामी अंतर जगदीश ने दिया। संन्यास के पूर्व साधकों ने ओशो के आडियो प्रवचन का लाभ लिया। अपने प्रवचन में ओशो ने कहा था कि त्याग की प्रक्रिया नकारात्मक है और उसी के कारण धर्म मुर्दा हो गया है। मैं तुम्हें परमात्मा का भोग सिखाता हूं, संसार का त्याग नहीं। संसार का भोग आ जाए तो संसार का त्याग अपने से घटता है। जिसे श्रेष्ठ मिलने लगे उसका निकृष्ट अपने से छूट जाता है, निकृष्ट को छोड़ने से श्रेष्ठ नहीं मिलता। इसलिए मेरा पूरा जोर श्रेष्ठ को पाने पर है, निकृष्ट को छोड़ने पर नहीं। इसी क्रम में उन्होंने नवसंन्यास पर बोलते हुए कहा कि मेरे संन्यासी के लिए नियम आबद्धता नहीं है कि ब्रह्म मुहूर्त में उठना, इतने बजे ध्यान करना, ऐसे रहना-वैसे रहना आदि। मेरा संन्यासी जब भूख लगेगी तो खाना खा लेगा, जब नींद आएगी तो सो जाएगा, जब नींद खुलेगी तभी ब्रह्म मुहूर्त। किसी तरह की कोई बाध्यता नहीं है, मेरा संन्यासी पूरी तरह मुक्त होगा।
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  1. Ek Sundar post . Osho ki kai baato se main bhi prerit hoon.

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