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मध्ययुगीन पाश्चात्य दर्शन- संत टॉमस एक्विनस का दर्शन
संत टॉमस एक्विनस के अनुसार दर्शन का साधन है तर्क और धर्म का श्रुति। एक्विनस का जन्म नपेल्स के पास उच्च कुल में हुआ था। वे कैथोलिक संप्रदाय के डोमिनियन शाखा के पादरी थे। इनकी प्रतिभा विलक्षण थी और अपना संपूर्ण जीवन मुख्यतया अध्ययन और अध्यापन में ही बिताया। इन्होंने एरिस्टॉटल की कृतियों पर विस्तृत भाष्य लिखा है और स्वतंत्र ग्रंथों की रचना भी की है। इनके अनुसार तर्क की सीमाएं हैं, वह परमार्थ का ज्ञान नहीं कराता। इसके लिए श्रुति (धर्मशास्त्र) ही एकमात्र प्रमाण है। बाद में दोनों का क्षेत्र प्राय: मिल जाता है। दोनों एक-दूसरे के सहायक और पूरक हो जाते हैं। ईश्वर ज्ञान स्वरूप है, अत: तर्क उनकी ओर संकेत तो करता ही है। श्रुति के सिद्धान्त भी युक्तिसंगत होने के कारण तर्क द्वारा प्रमाणित किए जा सकते हैं। यद्यपि तर्क की गति सीमित होने के कारण प्रधानता श्रुति की ही है। संत एक्विनस के अनुसार ईश्वर की सत्ता के लिए सर्वोत्तम प्रमाण एरिस्टॉटल ने दिया है। वह यह कि जगत की गति और परिणाम के लिए एक स्वयंभू और अपरिणामी चेतन कारण आवश्यक है।


ईश्वर सिद्ध स्वरूप हैं। वे समस्त जगत में अन्तर्निहित हैं और सभी के लक्ष्य हैं। समस्त जगत ईश्वर की ओर विकसित हो रहा है। वे विशुद्ध विज्ञान धन हैं। विश्व जड़ है अत: जड़ता के अभाव और विशुद्ध चैतन्य के भाव में ईश्वर की सत्ता सिद्ध है। इसके अतिरिक्त प्लेटो, प्लोटाइनस और एरिजीना के तर्कों का आश्रय लेकर एक्विनस ने यह भी स्वीकार किया कि ईश्वर का विज्ञान नित्य सामान्य रूप है जो सृष्टि का कारण और विज्ञानों का मौलिक रूप है। अत: विज्ञानों में ईश्वर के दिव्य और विज्ञान की सत्ता सिद्ध होती है। क्योंकि कार्य कारण की ओर संकेत करता है। अपूर्ण और अनित्य विश्व का अपने पूर्ण और नित्य कारण की ओर प्रवाह है। इनके ऊपर एबेलार्ड का प्रभाव पड़ा है। विज्ञानों की असली सत्ता ईश्वर के नित्य विज्ञानों में है। ईश्वर का नित्य विज्ञान, एक ओर तो जड़ पदार्थों के स्वरूप में उतरता है और दूसरी ओर हमारे विज्ञानों के रूप में। विज्ञानों के ये रूप हैं और यह ईश्वर, जीव, जगत के स्वरूप को प्रकाशित करते हैं। ईश्वर, जीव और जगत में अन्तर्यामी हैं और अपने स्वरूप में पर हैं। संसार के समस्त व्यक्ति चेतन जीव और जड़ पदार्थ दोनों, इन समान्य विज्ञानों से विशिष्ट होकर ही सत्तावान हैं। यह मत सामान्य विशिष्ट व्यक्तिवाद है। एक्विनस के अनुसार आत्मा अमर है। हमारे जीवन का प्रधान लक्ष्य ईश्वर के नित्य विज्ञान और नित्य आनंद की अनुभूति है। ईश्वर का संकल्प सदा शिव और मंगलमय होता है क्योंकि संकल्प ज्ञान का ही दूसरा रूप है। जैसे-जैसे हमारा ज्ञान ईश्वराभिमुख होगा, वैसे-वैसे हमारे संकल्प भी मंगलमय होंगे क्योंकि ईश्वराभिमुख होना ही ‘स्वतंत्र’ होना है।

आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

keyword: western-philosophy

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  1. Beautiful article Gajadharji.

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  2. ye shankarachaary ke darshan se bhi mel khata hai jisme Brhm ko hi srishti ka Niyanta aur aadhar kaha gaya hai ,,, shesh samast vishw usi ki maya ka vistaar hai

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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