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भारतीय ज्योतिष में शनि की साढ़ेसाती को ‘वृहद कल्याणी’ और शनि की ढैया को ‘लघु कल्याणी’ कहा जाता है। यदि शनि की साढ़ेसाती अथवा ढैया चल रही हो और शनि की महादशा, अंतरदशा, प्रत्यन्तर दशा में प्रतिकूल फल प्राप्त हो रहे हों या दूसरे किसी कारण से शनि के प्रकोप से आक्रान्त हैं तो घबराइए नहीं, कुछ सुगम उपाय हैं जिनसे शनि के प्रकोप से मुक्ति पाई जा सकती है।
1- शनिवार सहित प्रतिदिन प्रात:काल हनुमानजी की उपासना करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। महीने में एक बार शनिवार को चमेली के तेल अथवा देशी घी में सिन्दूर मिलाकर मंदिर में हनुमानजी की मूर्ति पर चढ़ाएं। प्रतिदिन न हो सके तो शनिवार को चीटियों को अवश्य आटा खिलाएं।
2- प्रतिदिन या शनिवार को तिल का तेल शरीर पर मलकर स्नान करें।
3- प्रत्येक शनिवार को सायंकाल पीपल वृक्ष की जड़ में तेल का दीपक जलाएं और एक लोटा जल में काला तिल व चावल मिलाकर चढ़ाएं। इस दिन भगवान विष्णु की पंचोपचार अर्चना करके आपत्ति-विपत्तियों से रक्षा की प्रार्थना करें।
4-काले घोड़े की नाल अथवा गंगा नदी में चलने वाली नाव की कील से निर्मित मुद्रिका दाएं हाथ की मध्यमा उंगली में धारण करें।
5- सात शनिवार तक शनिदेव की आराधना करें और सातवें दिन हवन करें। आराधना विधि इस प्रकार है-
शनिवार को प्रात:काल हनुमानजी की अर्चना के बाद और दिन में किसी भी समय शनि मंदिर अथवा घर पर ही लोहे से बनी शनि मूर्ति को काजल मिश्रित अक्षत से बनाए हुए चौबीस दल के कमल पर स्थापित करके काले रंग के फूल, गंध, धूप, कृष्ण अक्षत, तिल के तेल का दीपक और काले तिल का नैवेद्य अर्पित कर अर्चना करें और ‘ऊं शं शनैश्चराय नम:’ या ‘ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:’ मंत्र का 108 बार जप करें। सातवें शनिवार को अर्चना व जप के बाद इस मंत्र से शनि की समिधा (शमी की लकड़ी) में काली गाय के घी और काले तिलों की 108 बार आहुति दें। इसके बाद ब्राह्मणों व निर्धनों को भोजन कराकर दक्षिणा प्रदान कर विसर्जन करें। शनि अर्चना के सातों दिन रात्रि में ही भोजन करें।
6- निर्धन या असहाय व्यक्ति की कुछ सहायता करने से शनि ग्रह का प्रकोप शांत होता है।
7- यदि हो सके तो सोमवार से प्रारंभ कर कुछ दिन शिवार्चन अवश्य करें और लघु मृत्युंजय ‘ऊं जू स:’ मंत्र 5 या 11 माला जप रोज करें।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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