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भगवान शिव सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाले, पापों का क्षय करने वाले और पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्ध करने वाले हैं। प्राचीन काल से ही दु:साध्य कार्यों को करने के लिए और भीषण संकटों से बचाव के लिए भगवान शिव की पूजा-उपासना व अनुष्ठान किए जाते हैं। वेदों में भी पुरुष सूक्त, रूद्रसूक्त, शतरूद्रीय आदि के द्वारा शिव की स्तुति की गई है।
भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए पंचाक्षर मंत्र, शतनाम, सहस्रनाम, चालीसा, रूद्राष्टाध्यायी पाठ से सहस्रघटाभिषेक, पार्थिव लिंग अनुष्ठान आदि का विधान है। इन सभी का रूद्राष्टाध्यायी के पाठ सहित अभिषेक करने का वर्तमान में अत्यधिक प्रचलन है। भगवान शिव को जलाभिषेक अत्यधिक प्रिय है। यही कारण है कि दिन-रात दोनों समय में उन्हें जल चढ़ाया जाता है। सहस्रघटाभिषेक से अनेक विकट समस्याओं का अंत हो जाता है। जैसे मारक दशा के निवारण हेतु, किसी दुर्घटना से बचाव हेतु, वंश वृद्धि या पुत्र प्राप्ति हेतु, जन्मपत्रिका में स्थित कालसर्प दोष निवारण हेतु, केमदु्रम योग, शकट योग या अन्य अशुभ योगों के निवारण हेतु, चंद्रमा की अशुभ दशा से बचाव हेतु, कुष्ठ रोग, चर्म रोग, असाध्य रोगों से मुक्ति हेतु, प्रेतादिक दोष के उपशमन तथा परकृत प्रयोग से बचाव के लिए जलाभिषेक उपयोगी है।
सामान्य रूप से दुग्ध या जल से अभिषेक किया जाता है। लेकिन कुछ विशिष्ट मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु विशिष्ट द्रव्यों के प्रयोग का भी विधान है। अनावृष्टि निवारण हेतु जल से, व्याधि नाश के लिए कुशयुक्त जल से, पशुधन की प्राप्ति के लिए दही से, लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से, लक्ष्मी को स्थिर करने के लिए शहद से, मोक्ष प्राप्ति एवं पाप नाश के लिए तीर्थ जल से, पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध या शर्करा मिश्रित दुग्ध से, बंध्यत्व से मुक्ति, काकबंध्या या मृतवत्सा दोष निवारण के लिए गाय के दूध से, भीषण या निरंतर ज्वर को दूर करने के लिए शीतल जल की अनवरत धारा से, प्रमेह रोग की शांति व मनोवांछित कामना की सिद्धि के लिए मिश्री मिश्रित दुग्ध से, बुद्धि के लिए शर्करा मिश्रित दुग्ध से, शत्रुनाश के लिए सरसो के तेल से, यक्ष्मा या तपेदिक रोगों से मुक्ति के लिए शहद से, अरोग्य प्राप्ति हेतु घी से, दीर्घायु हेतु गाय के दूध से रूद्राभिषेक किया जाता है।
भगवान शिव को भष्म अत्यधिक प्रिय है। अत: पूजन में शिवलिंग पर श्मशान की भष्म लगानी चाहिए। श्रृंगार में आक-धतूरों का प्रयोग करना और नैवेद्य में भांग चढ़ाना चाहिए। भगवान शिव को विल्व पत्र प्रिय हैं इसलिए विल्व पत्रों पर ‘ऊं नम: शिवाय’ अथवा ‘राम’ लिखकर शिवलिंग पर अर्पण करना चाहिए। भगवान शिव की पूजा कर आधी प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
पूजन में निषिद्ध पुष्प- कदम्ब, शिरीष, तिन्तिणी, वकुल, कैथ, गाजर, बहेड़ा, कपास, गंभारी, सेमल, अनार, जूही, मदन्ती, सर्ज और दोपहरिया के पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।
शुभ मुहूर्त में करें रूद्राभिषेक: फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी दिन रविवार (10 मार्च) को धनिष्ठा नक्षत्र में सिद्धि योग में महाशिवरात्रि व्रत पड़ रहा है। सूर्योदय से लेकर 2.36 बजे तक भद्रा मृत्यु लोक का शुभ नहीं है। अभिषेक के लिए सर्वोत्तम समय दिन में 2 .36 बजे से सायं 6. 15 बजे तक तथा रात्रि 12 से 3 बजे तक है।
यह बातें ज्योतिषाचार्य पं. कृष्ण मुरारी पाठक ने कही। उन्होंने कहा कि शत्रु विनाश व ग्रह शांति के लिए दिन में 2.36 से सायं 4 बजे तक, धन लाभ व रोग नाश हेतु 3.36 से 6.15 बजे तक, व्यापार में धन लाभ के लिए रात्रि 12 बजे से 2.59 बजे तक उत्तम समय है। मेष राशि वाले शहद से अभिषेक करें तो मनोकामना सिद्ध होगी। वृष राशि वाले चीनी व शहद से करें तो धन प्राप्ति होगी। मिथुन राशि वाले घी व गुण से करें तो धन प्राप्त होगा। कर्क राशि वाले दूध से करें तो सर्वकार्य सिद्ध होगा। सिंह राशि वाले दूर्वा, शम्मीयल व मदार पीस कर अभिषेक करें तो रोग-दु:ख का नाश होगा। कन्या राशि वाले गुड़ या गन्ने के रस से व तुला राशि वाले दूध व गन्ने के रस से करें तो सर्व कार्य सिद्ध होगा। वृश्चिक राशि वाले मदार की जड़, शम्मीयल व दूर्वा पीसकर करें तो ग्रह शांति होगी। धनु राशि वाले पंचामृत से करें तो मनोकामना पूर्ति होगी। मकर राशि वाले जल में इत्र मिलाकर करें तो रोग नाश होगा। कुंभ राशि वाले घी, शहद व चीनी मिलाकर करें तो धन प्राप्ति तथा मीन राशि वाले गन्ने के रस से करें तो धन प्राप्ति के योग हैं।

आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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