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10 मार्च दिन रविवार को महाशिवरात्रि है। हृषिकेश पंचांग के अनुसार सूर्योदय 6 बजकर 8 मिनट पर और चतुर्दशी तिथि का मान 49 दंड 28 पला अर्थात रात्रि 1 बजकर 55 मिनट तक है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि कहते हैं। इस व्रत के लिए अर्धरात्रि में चतुर्दशी तिथि का होना आवश्यक है। यह व्रत रविवार, मंगलवार व शिवयोग होने पर अत्यंत प्रशस्त माना जाता है। रविवार को शिवरात्रि होने से यह परम पुण्यदायी है। संपूर्ण चतुर्दश (चौदह) ज्योतिर्लिंगों पर पूजन का यह प्रशस्त दिवस है। जो व्यक्ति शिवरात्रि को निर्जला व्रत रहकर रात्रि जागरण कर रात्रि के चारो प्रहर में चार बार पूजा करता है, उसे शिव सायुज्य की प्राप्ति होती है। शिव महात्म्य में लिखा है कि शिवरात्रि व्रत से बढ़कर शिवजी का कोई और व्रत नहीं है। शिवरात्रि को सदैव भक्तिपूर्वक जो शिवजी की पूजा करता है वह अक्षय एवं शिवजी का गण होकर शिवलोक में निवास करता है- ‘परात्परतरं नास्ति शिवरात्रि व्रतात्परं। ये नचियन्ति भक्येशं रूद्रं त्रिभुवनेश्वरम्।। जन्तुर्जन्म सहस्त्रेषु भ्रमन्ते नात्र संशय:। शिवरात्रौ महादेवं नित्यं भक्त्या प्रपूजयेत्।। मम् भक्तस्तु यो देवि शिवरात्रि मुपोषित:। गणत्वमक्षयं दिव्यं लभते शिवशासनात्।।’
व्रत विधि- प्रात:काल नित्यकर्म स्नानादि से निवृत्त होकर शिवजी की प्रसन्नता के लिए इस व्रत का मानसिक संकल्प करें। पूरे दिन यदि निर्जला व्रत कर सकें तो सर्वोत्तम अन्यथा दुग्धाहार एवं फलाहार किया जा सकता है। किसी शिव मंदिर या अपने घर में नर्मदेश्वर की मूर्ति अथवा पार्थिव शिवलिंग का निर्माण कर समस्त पूजन सामग्री एकत्र कर आसन पर विराजमान हो पुन: संकल्प करें- ‘अहं मम् इह जन्मनि जन्मान्ते वा अर्जित सकल पापक्षयार्थ आयु आरोग्य ऐश्वर्य पुत्र पौत्रादि सकल कामना सिद्धि पूर्वक अन्ते शिव सायुज्य प्राप्तये शिवरात्रि व्रत सांगता सिद्धयर्थ साम्ब सदा शिव पूजनम् करिष्ये।’ ऐसा संकल्प कर शिव मूर्ति की षोडशोपचार पूजा करें। शिवजी के प्रिय पुष्पों में आक, कनेर, विल्वपत्र और मौलसिरी मुख्य हैं। धतूरा, कटेली, केवड़ा आदि के पुष्प भी शिवजी को बहुत प्रिय हैं। शिव पूजन में विल्वपत्र सबसे मुख्य है। पके हुए आम्रफल शिवजी को अर्पण करने का महान फल है। दिन में शिव पूजा करें और रात्रि में जागरण पूर्वक पूजा करें। पूजा विधान एक ही है। रात्रिकालीन पूजा में रात्रि के चारो प्रहर में चार बार पूजा करनी चाहिए और प्रहर भेद से संकल्प में पहली पूजा में प्रथम यामे, द्वितीय प्रहर में द्वितीय यामे, तृतीय प्रहर में तृतीय यामे और चतुर्थ प्रहर में चतुर्थ यामे पूजन करिष्ये, ऐसा कहना चाहिए। इस व्रत में अथवा रात्रि में रूद्री पाठ, शिव पुराण, शिव महिम्नस्तोत्र अथवा शिव संबंधी अन्य धार्मिक कथा का सुनना-सुनाना परम पुण्य फलदायी है। यदि रूद्राभिषेक करा लें तो अत्युत्तम है। दूसरे दिन प्रात: शिव पूजा के अनंतर जौ, तिल तथा खीर की 108 आहुति महामृत्युंजय मंत्र से दें और ब्राह्मणों को अमृत समान खीर आदि भोजन कराएं व दक्षिणा दें तथा स्वयं भोजन करें।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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