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गृह निर्माण से पूर्व दिशा-विदिशाओं का ज्ञान एवं इसका शोधन करना अत्यंत आवश्यक है। दिशा विहीन निर्माण से मनुष्य जीवन भर भ्रमित होकर दु:ख, कष्टादि का भागी होता है। वास्तु शास्त्र में दिशा ज्ञान हेतु सिद्धान्त ज्योतिष के तहत दिक्साधन की प्रक्रिया पूर्वकाल में विभिन्न रूपों में व्यवहृत थी। प्रक्रियान्तर्गत द्वादशांगुल शंकु की छाया से, ध्रुवतारा अवलोकन से और दीपक के संयोग से पूर्वापरादि का साधन उपलब्ध था। किन्तु ये साधन प्र्रक्रियाएं कुछ जटिल व स्थूलप्राय हैं। यही कारण है कि आज चुम्बक यंत्र (कंपास) का प्रयोग किया जा रहा है।
दिशाओं के ज्ञान के बाद विदिशाओं अर्थात कोण का ज्ञान भी आवश्यक हो जाता है। क्योंकि दिशाओं के साथ ही विदिशाओं का भी प्रभाव गृह निर्माण पर अनवरत पड़ता रहता है। विदिशा क्षेत्र किसी भी दिशा के कोणीय भाग से 22.5 डिग्री से लेकर 45 डिग्री तक होता है। इस तरह चार दिशा एवं चार विदिशा का पारिमाणिक वृत्त 360 डिग्री में सन्नद्ध आठ दिशाओं का ज्ञान होता है। इन आठों दिशाओं में वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि निर्माण प्रक्रिया प्रारंभ की जाय तो यह निश्चित हे कि गृहकर्ता सुख-समृद्धि, शांति व उन्नति को प्राप्त करता हुआ चिरस्थायी निवास करता है।
दिशाओं में देवी-देवताओं और स्वामी ग्रहों के आधिपत्य से संबंधित बहुत चर्चाएं की गई हैं। दिशाओं के देव व स्वामी होने से पृथ्वी पर किसी भूखंड पर निर्माण कार्य प्रारंभ करते समय यह विचार अवश्य कर लेना होगा कि भूखंड के किस भाग में किस उद्देश्य से गृह निर्माण कराया जा रहा है। यदि उस दिशा के स्वामी या अधिकारी देवता के अनुकूल प्रयोजनार्थ निर्माण नहीं हुआ तो उस निर्माणकर्ता को उस दिशा से संबंधित देवता का कोपभाजन होना पड़ता है। इसलिए आठों दिशाओं व स्वामियों के अनुसार ही निर्माण कराना चाहिए।
पूर्व दिशा- सूर्योदय की दिशा ही पूर्व दिशा है। इसका स्वामी ग्रह सूर्य है। इस दिशा के अधिष्ठाता देव इन्द्र हैं। इस दिशा का एक नाम प्राची भी है। पूर्व दिशा से प्राणिमात्र का बहुत गहरा संबंध है। किन्तु सचेतन प्राणी मनुष्य का इस दिशा से कुछ अधिक ही लगाव है। व्यक्ति के शरीर में इस दिशा का स्थान मस्तिष्क के विकास से है। इस दिशा से पूर्ण तेजस्विता का प्रकाश नि:सृत हो रहा है। प्रात:कालीन सूर्य का प्रकाश संपूर्ण जगत को नवजीवन से आच्छादित कर रहा है। इस प्रकार आत्मिक साहस और शक्ति दिखलाने वाला प्रथम सोपान पूर्व दिशा ही है। जो हर एक को उदय मार्ग की सूचना दे रही है। इस दिशा में गृह निर्माणकर्ता को निर्माण करने अभ्‍युदय और संवर्धन की शक्ति अनवरत मिलती रहती है।
दक्षिण दिशा- दक्षिण दक्षता की दिशा है। इसका स्वामी ग्रह मंगल और अधिष्ठाता देव यम हैं। इस दिशा से मुख्यत: शत्रु निवारण, संरक्षण, शौर्य एवं उन्नति का विचार किया जाता है। इस दिशा के सुप्रभाव से संरक्षक प्रवृत्ति का उदय, उत्तम संतानोत्पत्ति की क्षमता तथा मार्यादित रहने की शिक्षा मिलती है। इस दिशा से प्राणी में जननशक्ति एवं संरक्षण शक्ति का समन्वय होता है। इसीलिए वैदिक साहित्य में इस दिशा का स्वामी पितर व कामदेव को भी कहा गया है। यही कारण है कि वास्तुशास्त्र में प्रमुख कर्ता हेतु शयनकक्ष दक्षिण दिशा में होना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। वास्तुशास्त्र के अनुरूप गृह निर्माण यदि दक्षिणवर्ती अशुभों से दूर रहकर किया जाए तो गृहस्वामी का व्यक्तित्व, कृतित्व एवं दाक्षिण्यजन्य व्यवहार सदा फलीभूत रहता है।
पश्चिम दिशा- पश्चिम शांति की दिशा है। इस दिशा का स्वामी ग्रह शनि और अधिष्ठाता देव वरुण हैं। इसका दूसरा नाम प्रतीची है। सूर्य दिन भर प्रवृत्तिजन्य कार्य करने के पश्चात पश्चिम दिशा का ही आश्रय ग्रहण करता है। इस प्रकार योग्य पुरुषार्थ करने के पश्चात थोड़ा विश्राम भी आवश्यक है। अतएव प्रत्येक मनुष्य को इस दिशाजन्य प्रवृत्ति के अनुरूप ही वास्तु निर्माण मंी निर्देशित कक्ष या स्थान की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। वास्तु के नियमानुसार मनुष्य को प्रवास की स्थिति में सिर पश्चिम करके सोना चाहिए।
उत्तर दिशा- यह उच्चता की दिशा है। इस दिशा का स्वामी ग्रह बुध और अधिष्ठाता देव कुबेर हैं। किन्तु ग्रंथान्तर में सोम (चंद्र) को भी देवता माना गया है। इस दिशा का एक नाम उदीची भी है। इस दिशा से सदा विजय की कामना पूर्ति होती है। मनुष्य को सदा उच्चतर विचार, आकांक्षा एवं सुवैज्ञानिक कार्य का संकल्प लेना चाहिए। यह संकल्प राष्ट्रीय भावना के परिप्रेक्ष्य में हो किंवा परिवार समाज को प्रेमरूप एकता सूत्र में बांधने का, ये सभी सफल होते हैं। ऐसी अद्भुत संकल्प शक्ति उत्तर दिशा की प्रभावजन्य शक्ति से ही संभव हो सकती है। अभ्‍युदय का मार्ग सुगम और सरल हो सकता है। स्वच्छता, सामर्थ्य एवं जय-विजय की प्रतीक यह दिशा देवताओं के वास करने की दिशा भी है, इसीलिए इसे सुमेरु कहा गया है। अतएव मनुष्य मात्र के लिए उत्तरमुखी भवन द्वार आदि का निर्माण कर निवास करने से सामरिक शक्ति, स्वच्छ विचार व व्यवहार का उदय और आत्म संतोषजन्य प्रभाव अनवरत मिलता रहता है। शयन के समय उत्तर दिशा में सिर करके नहीं सोना चाहिए। वैज्ञानिक मतानुसार उत्तरी धु्रव चुम्बकीय क्षेत्र का सबसे शक्तिशाली धु्रव है। उत्तरी धु्रव के तीव्र चुम्बकत्व के कारण मस्तिष्क की शक्ति (बौद्धिक शक्ति) क्षीण हो जाती है। इसलिए उत्तर की ओर सिर करके कदापि नहीं सोना चाहिए।
आग्नेय कोण- पूर्व-दक्षिण दिशाओं से उत्पन्न कोण आग्नेय कोण है। इस कोण के स्वामी ग्रह शुक्र व अधिष्ठाता देव अग्नि हैं। यह कोण अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। पूर्व दिशाजन्य तेज-प्रताप और दक्षिण दिशाजन्य वीर्य-पराक्रम के संयोग से यह कोण अद्भुत है। वास्तुशास्त्र में इस कोण को अत्यधिक पवित्र माना गया है। गृह निर्माण के समय पाकशाला (भोजन कक्ष) की व्यवस्था इसी कोण में सुनिश्चित की जाती है। भोजन सामग्री अग्नि में पककर देव प्रसाद हो जाती है और इसे ग्रहण करने से मनुष्य की समस्त व्यावहारिक क्रियाएं शुद्ध धातुरूप होने लगती हैं।
नैर्ऋत्य कोण- यह कोण दक्षिण-पश्चिम दिशा से उत्पन्न होता है। इस कोण के स्वामी ग्रह राहु और अधिष्ठाता देव पितर या नैरुति (दैत्य) हैं। यह कोण मनुष्य हेतु कुछ नि:तेजस्विता का कोण है। दक्षिण दिशा वीर्य-पराक्रम और पश्चिम दिशाजन्य शांति-विश्राम की अवस्था के संयोग से उद्भूत यह उदासीन कोण है। दिशा स्वामी ग्रह राहु भी छाया ग्रह है जो सामान्यत: प्रत्येक अवस्था में शुभत्व प्रदान करने में समर्थ नहीं होता है। इसलिए वास्तुशास्त्र के अनुसार नैर्ऋत्य कोण में किसी भी गृहकर्ता हेतु शयन कक्ष नहीं बनाने की बात कही गई है। अन्यथा शयन कक्ष बनाकर उसमें रहने वाला मनुष्य हमेशा विवाद, लड़ाई-झगड़े में फंसा रहने वाल, आलसी या क्रोधी होकर जीवन भर कष्ट भोगने हेतु बाध्य होता है। अतएव इस कोण की दिशा वाले कमरे को सदा भारी वजनी सामान अथवा बराबर प्रयोग में न आने वाले सामानों से भारा या दबा रखना शुभदायक होता है।
वायव्य कोण- पश्चिम-उत्तर दिशा से उद्भूत कोण वायव्य कोण है। इसके स्वामी ग्रह चंद्र और अधिष्ठाता देव वायु हैं। पश्चिम के शुद्ध जलवायु और उत्तर दिशाजन्य उच्चतम विचारों के संयोग से यह कोण उत्पन्न होता है। अतएव इस दिशा से वायु का संचरण निर्बाध गति से गृह के अंदर आता रहे, इसकी पूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। इस कोण से आने वाली हवा के मार्ग को अवरुद्ध नहीं करना चाहिए। अवरुद्ध होने से गृहस्वामी मतिभ्रम का शिकार एवं हीनभावना से ग्रस्त हो सकता है।
ईशानकोण- यह कोण उत्तर-पूर्व दिशा से उत्पन्न होता है। इस कोण के स्वामी ग्रह बृहस्पति और अधिष्ठाता देव ईश (रूद्र) या स्वंय बृहस्पति हैं। ईशान का तात्पर्य देवकोण से भी है। इस विदिशा से उच्चतर विचारों, सत् संकल्पों का उदय होना तथा पूर्व दिशा से प्रगति का मार्ग बतलाने जैसी संयोगात्मक संस्तुति का फल ही ईशान कोण है। किसी ने ईशान का देवता शिव (महादेव) को कहा है। यह भी सही है। क्योंकि शिव तो कल्याण का पर्यायवाची शब्द है। अर्थात यह विदिशा उच्चतर विचारों से ओतप्रोत करते हुए कल्याण व प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है। इस कोण में निर्माण कार्य करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक होगा कि यह कोण किसी प्रकार भारी वस्तुओं से ढंका नहीं होना चाहिए। यदि इस कोण के कमरे को अध्ययन कक्ष, पूजा स्थल के रूप में प्रयोग किया जाय तो अत्युत्तम होगा, अन्यथा खुला ही रखना चाहिए। ऐसा करने से गृह स्वामी नित्य अपने को तरोताजा एवं स्वयं में अभिनव तेज के प्रभाव को अनुभव करता हुआ अभ्‍युदय संकल्प का संयोजन करता रहता है।
आचार्य पवन कुमार राम त्रिपाठी, प्रवक्ताक श्रीकाशी विश्वे श्वमर संस्कृ्त महाविद्यालय मुंबई

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