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नूतन संवत्सर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है। 11 अप्रैल बृहस्पतिवार को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है। इस दिन मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रधान देवी-देवताओं, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, ऋषि, मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीटाणुओं, रोगों और उनके उपचारों आदि का पूजन किया जाता है। इससे सिद्ध होता है कि संवत्सर का प्रथम दिन महामान्य दिन है। संवत्सर उसे कहते हैं जिसमें मासादि भलीभांति निवास करते हैं। बारह महीनों का एक काल विशेष होता है। वेदों में भी कहा गया है- द्वादश मासा: संवत्सर:। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार संवत्सर के सौर, सावन, चांद्र, बार्हस्पत्य और नाक्षत्र, ये पांच भेद हैं। परन्तु धर्म, कर्म और लोक व्यवहार में चांद्र संवत्सर ही विख्यात है। चांद्र संवत्सर का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ब्रह्मा ने सृष्टि का आरंभ इसी दिन किया था। ब्रह्मपुराण में इस विषय में कहा गया है- ‘चैत्रे मासि जगद्ब्रह्म ससर्ज प्रथमेऽहनि।’ इसी दिन मत्स्यावतार का आविर्भाव तथा सत्ययुग का आरंभ हुआ था। इस महत्व को मानकर भारत के सार्वभौम सम्राट विक्रमादित्य ने भी अपने संवत्सर का आरंभ इसी दिन आज से लगभग दो हजार वर्ष पहले किया था। विश्व के यावन्मात्र संवत्सरों में शालिवाहन शक और विक्रम संवत्सर, दोनों सर्वोत्कृष्ट हैं। परन्तु शक संवत्सर का प्रयोग विशेषकर गणित में होता है और विक्रम संवत का इस देश में गणित, फलित, लोक व्यवहार और धर्मानुष्ठानों के समय ज्ञान आदि में अभीष्ट रूप से किया जाता है। प्रारंभ में प्रतिपदा लेने का प्रयोजन है कि ब्रह्मा ने जब सृष्टि का आरंभ किया तब उन्होंने इस तिथि को सर्वोत्तम तिथि (प्रवरा) सूचित किया था। वास्तव में यह प्रवरा है भी। इस तिथि में धार्मिक, सामाजिक, व्यावहारिक और राजनीतिक आदि अधिक महत्व के कार्य शुरू किए जाते हैं। इसमें संवत्सर का पूजन, नवरात्र घट स्थापन, ध्वजारोहण, तैलाभ्‍यंग स्नान, वर्षेशादि का फलपाठ, परिभद्र का पत्र प्राशन आदि कार्य किए जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन उदया तिथि में जो वार होता है वही उस वर्ष का राजा होता है। इस वर्ष 11 अप्रैल को बृहस्पतिवार है, इसलिए बृहस्पति ही नव संवत्सर के राजा होंगे।
इस दिन करें संवत्सर का पूजन: ब्रह्माण्ड पुराण में संवत्सर पूजन की विधि दी गई है। इस दिन प्रात:काल स्नान करने के पश्चात हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर ‘मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य स्वजन परिजन सहितस्य आयु-आरोग्य ऐश्वर्यादि सकल शुभ- अभिवृद्धि ब्रह्मादि संवत्सर देवानाम पूजनमहं करिष्ये’ मंत्र से संकल्प कर चौकी पर श्वेत वस्त्र बिछाएं और उस पर केसर या हल्दी से रंगे अक्षतों का अष्टदल कमल बनाकर ब्रह्मा की मूर्ति स्थापित कर ‘ॐ ब्रह्मणे नम:’ मंत्र से ब्रह्माजी का आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, नीराजन, नमस्कार, पुष्पांजलि और प्रार्थना आदि उपचारों से पूजन करें। पुन: संवत्सर सहित 136 देवताओं की पंचोपचार पूजा करें। ब्राह्मणों को भोजन-दान के पश्चात ही स्वयं भोजन करें। नवीन पंचांग से वर्ष के राजा, मंत्री, संवत्सर के विषय में श्रवण करें। घर को ध्वजा, पताका, तोरण और बंदनवारों से सजाएं। इस दिन 13 पंचांग दान का विधान भी है। इस दिन मिश्री, काली मिर्च सहित नीम के पत्तों का सेवन करना चाहिए। ये त्रिदोष व सर्वरोग निवारक है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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