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हिन्दू धर्म में अनेक देवी-देवताओं की मान्यता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीन प्रधान देवता हैं। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती देवियां एवं इन्द्र, गणेश, वरुण, मरुत, अर्यमा, सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, अग्नि, प्रजापति इत्यादि देवताओं का स्थान है। गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नदियां, गोवर्धन, चित्रकूट, विंध्याचल आदि पर्वत, तुलसी, पीपल आदि वृक्ष, गौ, बैल आदि पशु, गरुण, नीलकण्ठ आदि पक्षी, सर्प आदि कीड़े भी देवता कोटि में गिने जाते हैं। भूत-प्रेतों में कुछ ऊंची श्रेणी के देवता भैरव, क्षेत्रपाल, ब्रह्मराक्षस, बैताल, कूष्माण्ड, पीर, वली, औलिया आदि हैं। पुन: ग्राम देवता और भूत, प्रेत, मसान, चुड़ैल आदि। राम, कृष्ण, नृसिंह, वराह, वामन आदि अवतारों को भी देवताओं की कोटि में गिना जाता है। इन देवताओं की संख्या तैंतीस कोटि बताई जाती है।
कोटि शब्द के दो अर्थ हैं- श्रेणी व करोड़। श्रेणी या कोटि शब्द बहुवचन का द्योतक है। वेदों में भी तीस से ऊपर देवताओं का वर्णन मिलता है। एक ही ईश्वर की अनेक शक्तियों के अलग-अलग नाम हैं। जैसे सूर्य की किरणों में सात रंग हैं और सहस्रों किरणें हैं, उसी प्रकार एक ही ईश्वर की अनेक शक्तियां अपने गुण-कर्म के आधार पर विविध देव नामों से पुकारी जाती हैं। मूलत: ईश्वर तो एक ही है। जैसे एक ही मनुष्य के विविध अंगों को हाथ, पैर, नाक, आंख इत्यादि कहते हैं, मनुष्य के शरीर में करोड़ों कोशिकाएं हैं और कई लाख केश व रोएं हैं, उसी प्रकार ईश्वरीय सूक्ष्म शक्तियों के उनके गुणों के आधार पर विविध नाम हैं। ये विविध गुण ही देवता हैं। कैवल्य उपनिषद के ऋषि का कथन है- ‘स: ब्रह्मा स: विष्णु: स: रूद्रस्य शिवस्सोऽक्षरस्स परम: स्वराट। स: इन्द्रस्य कलाग्निस्स चन्द्रमा:।’ अर्थात वह परमात्मा ही ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, शिव, अक्षर, स्वराट, इन्द्र, काल, अग्नि और चंद्रमा है। इसी प्रकार ऋग्वेद में कहा गया है- ‘इन्द्र मित्रं वरुणमान्निमाहुरथो दिव्यस्य सुपर्णो गरूत्मान्। एवं सद्विप्रा यहुधावदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वान माहु।’ अर्थात विद्वान लोग ईश्वर को इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, गरूत्मान, दिव्य, सुपर्ण, यम, मातरिश्वा नाम से जानते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दू धर्म के देवताओं का पृथक-पृथक अस्तित्व नहीं है।
ईश्वर का उनके गुणों के आधार पर देववाची नामकरण किया गया है जैसे अग्नि- तेजस्वी। प्रजापति- प्रजा का पालन करने वाला। इन्द्र- ऐश्वर्यवान। ब्रह्मा- बनाने वाला। विष्णु- व्यापक। रूद्र- भयंकर। शिव- कल्याण चाहने वाला। मातरिश्वा- अत्यंत बलवान। वायु- वेगवान। आदित्य- अविनाशी। मित्र- मित्रता रखने वाला। वरुण- ग्रहण करने योग्य। अर्यमा- न्यायवान। सविता- उत्पादक। कुबेर- व्यापक। वसु- सबमें बसने वाला। चंद्र- आनंद देने वाला। मंगल- कल्याणकारी। बुध- ज्ञानस्वरूप। बृहस्पति- समस्त ब्रह्माण्डों का स्वामी। शुक्र- पवित्र। शनिश्चर- सहज में प्राप्त होने वाला। राहु- निर्लिप्त। केतु- निर्दोष। निरंजन- कामना रहित। गणेश- प्रजा का स्वामी। धर्मराज- धर्म का स्वामी। यम- फलदाता। काल- समय रूप। शेष- उत्पत्ति और प्रलय से बचा हुआ। शंकर- कल्याण करने वाला। इसी प्रकार अन्य देवों के नाम का अर्थ ढूढा जाय तो वह परमात्मा का ही बोध कराता है। किसी बात का विचार या ध्यान करने के लिए मस्तिष्क में एक आकृति अवश्य बनानी पड़ती है। यदि कोई मानसिक रोग से ग्रसित हो तो वह न तो मन में आकृतियों की कल्पना कर सकता है और न ही विचार कर सकता है। ईश्वर और उसकी शक्तियों के संबंध में विचार करने के लिए मन: लोक में स्वत: किसी न किसी प्रकार की आकृति उत्पन्न होती है। अदृश्य कारणों से उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म आकृतियों को दिव्य दृष्टि से अवलोकित करने वाले योगी जनों ने उन ईश्वरीय शक्तियों की, देवी-देवताओं की आकृतियां निर्मित की हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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  1. nice explanation about the number of gods....sometime it is very confusing that how many gods are there...specially for the hindus...but you had explaned the concept very well...

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