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प्रतिदिन लगभग 24 घंटे पर लग्न परिवर्तन हो जाता है। कुल 12 राशियां होती हैं, इसी प्रकार 24 घंटे में 12 लग्नों का भोग काल होता है। जो जिस लग्न में पैदा होता है उसी के अनुसार उसका गुण व स्वभाव बनता है। क्योंकि प्रत्येक लग्न के स्वामी पृथक होते हैं और उनकी आकाशीय स्थिति भिन्नी भिन्नं होती है।
मेष लग्न- मेष लग्न का स्वामी मंगल है। जातक का मध्यम कद, मुख का वर्ण लाल या गेंहुआ होगा। रक्तवर्ण नेत्रों वाला, चंचल व उग्र स्वभाव, अत्यंत साहसी, सतर्क व महत्वाकांक्षी होगा। जातक उद्यमी, तीव्र बुद्धि, स्वतंत्र विचारों वाला, अस्थिर किन्तु तेज स्मरण शक्ति वाला होगा। अत्यधिक साहसी, स्पष्टवादी एवं भ्रमणप्रिय होगा। प्राय: अपने परिश्रम के बल पर आय और धन के साधन जुटाएगा। सगे-संबंधियों की ओर से सहायता व सुख कम होगा। यह राशि चर और अग्नि तत्व प्रधान होने के कारण मेष लग्न का जातक परिवर्तनशील प्रकृत, शीघ्र क्रोधित होने वाला तथा शीघ्र ही मान जाने वाला होगा। व्यवसाय में अनेक कठिनाइयों के बावजूद उन्नति के लिए प्रयास करता रहता है। जायदाद व व्यवसाय में कई प्रकार की उलझनें आती हैं और इन्हीं कार्यों द्वारा उसे लाभ भी प्राप्त होता है। पित्त, कफ, सिर दर्द, रक्त विकार, नेत्र विकार और त्वचा आदि रोगों का भय रहता है। सामान्यत: मूंगा मेष लग्न वालों के लिए शुभ होता है लेकिन सुयोग्य ज्योतिषी से परामर्श के बाद ही धारण करना चाहिए। इस लग्न वालों के लिए 16, 22, 28, 32 व 36वां वर्ष भाग्योदय कारक होता है।
वृष लग्न- वृष लग्न का स्वामी शुक्र है। यदि शुक्र शुभ हो तो जातक सुन्दर, सुगठित शरीर व मध्यम कद वाला होगा। गोल, बड़ी, चमकदार आंखें, सुन्दर वर्ण और आकर्षक व्यक्तित्व वाला होगा। जातक परिश्रमी, हंसमुख एवं सौम्य प्रकृति वाला, धीर, शांत एवं दृढ़ स्वभाव का होगा। उदार हृदय, प्रसन्नचित्त और प्रभावशाली होगा। स्वावलम्बी, उच्चाभिलाषी तथा भौतिक सुखों के लिए कठोर परिश्रम से भी पीछे नहीं हटेगा। मधुरभाषी, सौन्दर्यप्रेमी, संगीत, कला, साहित्यादि कार्यों में रुचि होगी। घर, दफ्तर आदि में सजावट रखेगा और ऐश्वर्य के साधनों में निरंतर वृद्धि करने का प्रयास करता रहेगा। जातक प्राय: अपनी इच्छानुसार ही कार्य करने वाला, ऐश्वर्ययुक्त जीवनयापन का इच्छुक, विपरीति लिंग वालों के साथ मैत्री का आकांक्षी, व्यवहार कुशल तथा कठिन परिस्थितियों में भी अपना कार्य निकालने में कुशल होगा। जातक प्राय: चंद्र व बुध की स्थिति शुभ होने पर कामर्स, गणित, बैंकिंग, अभिनय, वस्त्र उद्योग, क्रय-विक्रय आदि में सफलता प्राप्त कर लेता है। शुभ नग हीरा है। भाग्योदय कारक वर्ष 28, 36, 42 एवं 48वां वर्ष होगा।
मिथुन लग्न- मिथुन लग्न का स्वामी बुध है। मिथुन लग्न वाला जातक गौरवर्ण, चंचल आंखों वाला, सामान्य एवं ऊंचे कद वाला होगा। जातक अस्थिर किन्तु मौलिक विचारों से युक्त, तीव्र बुद्धि, परिवर्तनशील प्रकृति, मित्रों को हर प्रकार से सहायक तथा नीति के अनुसार आचरण करने वाला, तर्क-वितर्क करने में कुशल, दूर-दूर के स्थानों की यात्राएं करने का सौभाग्यक प्राप्त करेगा। जातक में बुद्धि तत्व एवं भाव तत्व दोनों प्रबल होने के कारण पठन-पाठन, कानूनी कार्य, व्यापार व लेखन संबंधी कार्यों को बड़ी गंभीरता से करेगा। मजबूत हृदय वाला परन्तु नरम स्वभाव होने के कारण कमजोर समझा जाता है। द्विस्वभाव होने से एक ही समय पर एक से अधिक कार्य शुरू करने की प्रवृत्ति रहेगी। अपने कार्य क्षेत्र (व्यवसाय) में प्राय: परिवर्तन करता रहता है। नए-नए मित्र बनाने में कुशल तथा बातचीत की कला में निपुण होगा। क्रय-विक्रय, लेखन, लेखाकार, बैंक, वकालत, अध्यापन, इंजीनियरिंग, कल-पुर्जों के व्यवसाय में सफलता प्राप्त करता है। शुभ नग पन्ना है। स्त्री जातक के लिए पुखराज भी अच्छा रहता है। 22, 32, 36 व 42वें वर्ष भाग्योदयकारक होंगे।
कर्क लग्न- कर्क लग्न का स्वामी चंद्रमा है। जल तत्व प्रधान एवं चर लग्न होने से जातक सुन्दर एवं आकर्षक मुखाकृति, गोल चेहरा और प्राय: मध्यम कद का होगा। यदि चंद्र एवं भौम शुभ हों तो जातक बुद्धिमान, संवेदनशील, भावुक हृदय, न्यायप्रिय व दयालु स्वभाव वाला होगा। सामान्यत: परिवर्तनशील, चंचल, जलीय वस्तुओं का प्रिय, उच्च कल्पनाशील, समयानुकूल कार्य करने वाला व मिलनसार प्रकृति का होगा। यदि चंद्रमा अशुभ हो तो चिड़चिड़ा स्वभाव, वातावरण से शीघ्र प्रभावित होने वाला होगा। प्राकृतिक सौन्दर्य, कला, संगीत व साहित्य में रुचि रखने वाला तथा सौन्दर्य प्रेमी व सौन्दर्यानुभूति का विशेष धनी होता है। ऐसा जातक परिस्थिति अनुसार ढल जाने वाला, प्यार संबंधी मामलों में सच्चा व ईमानदार होता है। ऐसा जातक दिल से जिस कार्य को करना चाहे, कर ही लेता है। कल्पना शक्ति प्रबल होती है। अन्यों के भावों को शीघ्र समझ लेने की विशेष क्षमता होती है। कर्क राशि वालों को मकर, वृश्चिक, मीन राशि वालों के साथ मित्रता शुभ रहती है। शुभ नग मोती तथा सफेद पुखराज है। 24, 25, 28, 32, 36 व 40वां वर्ष भाग्योदयकारक है।
सिंह लग्न- सिंह लग्न का स्वामी सूर्य है। इस लग्न में जन्म लेने वाले जातक सुन्दर, पुष्ट शरीर वाले, चौड़ा मस्तक, सुगठित, आकर्षक व प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले होते हैं। जातक बुद्धिमान, उद्यमी, कर्मठ, निडर, स्वतंत्र विचारों वाला, पराक्रमी, व्यवहार कुशल, नीति के अनुसार आचरण करने वाला, उच्चाकांक्षी, खान-पान का शौकीन, देश-विदेश में भ्रमण करने वाला, शीघ्र कु्रद्ध हो जाने की प्रकृति होने पर भी अपनी बुद्धि चातुर्य से स्थिति को संभाल लेने वाला होगा। छोटी-छोटी एवं मामूली बातों को उपेक्षा की दृष्टि से देखने वाला होगा तथा बड़े-बड़े कामों को भी अपने उद्यम द्वारा पूरा करने में तत्पर हो जाता है। भाई-बंधु होने पर भी उनका सुख कम मिलता है। उच्चाभिलाषी होने के कारण प्रत्येक कार्य व्यवसाय को बड़े पैमाने एवं उच्च स्तर पर करना पसंद करेगा। उच्चस्तरीय, वैभवशाली एवं रईसी जीवन यापन करने की प्रबल इच्छा रखते हैं जिसके कारण अपनी सीमा से बढ़कर भी खर्च कर डालते हैं। इस लग्न वालों का आकर्षक रूप एवं अच्छा स्वभाव रहता है। शुभ नग माणिक्य है। सिंह लग्न वालों को सूर्य उपासना करनी चाहिए। 16, 22, 24, 26, 28 व 32वां वर्ष भाग्योदयकारक है।
कन्या लग्न- कन्या लग्न वाले जातक का मध्यम कद, कोमल शरीर, सुन्दर एवं आकर्षक आंखें, लम्बी नाक, वाणी तेज व बारीक होती है। जातक प्रियभाषी, हर कार्य में सहायक, लज्जाशील प्रकृति, नर्म स्वभाव और नीति के अनुसार कार्य करने वाला होता है। कल्पनाशील, सूक्ष्मदर्शी और संवेदनशील होता है। शांतचित्त और एकांतप्रिय प्रवृत्ति होगी परन्तु कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं को ढालने की सामर्थ्य रहती है। एक ही समय में अनेक यात्राएं और विषयों में पारंगत होने की चेष्टा करता है। संगीत, कला व साहित्य की ओर विशेष दिलचस्पी रखते हैं। द्विस्वभाव व परिवर्तनशील प्रकृति होने के कारण एक विषय पर चिरकाल तक स्थिर नहीं हो पाते। बुध, शुक्र का शुभ योग होने पर लेखा गणित, संगीत, कला, अध्यापन, लेखन, क्रय-विक्रय आदि की ओर विशेष झुकाव रखते हैं और सफलता भी प्राप्त करते हैं। धन की अपेक्षा मौलिक तथा बौद्धिक कार्यों में विशेष रुचि रखते हैं। बुद्धिमान, तीव्र स्मरण शक्ति एवं अध्ययनशील प्रकृति होती है। 25, 32, 35, 36, 42वां वर्ष भाग्योदयकारक है।
तुला लग्न- तुला लग्न का स्वामी शुक्र है। इस लग्न में उत्पन्न जातक श्वेत और सुन्दर वर्ण, मध्यम एवं लम्बा कद, सौम्य एवं हँसमुख प्रकृति का होता है। जातक न्यायप्रिय, हँसमुख, व्यवहारशील एवं नीति के अनुसार कार्य करने में कुशल होता है। ईमानदार, मिलनसार, नए-नए मित्र बनाने में कुशल होता है। सौन्दर्यानुभूति विशेष होती है। संगीत, कला, नाट्य की ओर विशेष झुकाव रहता है। रहन-सहन का ढंग रईसी और प्रभावपूर्ण रहता है। जातक पर संगीत का प्रभाव जल्दी पड़ता है। चंद्र एवं शुक्र यदि शुभ हों तो मानसिक व कल्पना शक्ति प्रबल होती है परन्तु मन की केन्द्रीय शक्ति बहुत देर तक नहीं रहती है। जब तक किसी कार्य में लगे रहते हैं तब तक दिलोजान और मजबूत दिल से कार्य करते हैं परन्तु अपने विचार और योजना में परिवर्तन करने में भी शीघ्र तैयार हो जाते हैं। जातक को देश-विदेश भ्रमण का अवसर मिलता है। बुद्धिमान, तर्कशील, सावधान एवं सतर्क रहने वाले, मध्यस्थता एवं न्याय करने में कुशल, विपरीत लिंग के प्रति विशेष झुकाव रहता है। हीरा व श्वेत मोती शुभ नग है। 25, 27, 32, 35 व 47वां वर्ष भाग्योदयकारक है।
वृश्चिक लग्न- वृश्चिक लग्न वालों का स्वामी मंगल है। इस लग्न में उत्पन्न जातक सुन्दर मुख वाले, परिश्रमी, अपनी सामर्थ्य पर भरोसा रखने वाले व धार्मिक प्रवृत्ति वाले होते हैं। मंगल शुभ हो तो उत्साही, उदार, परिश्रमी, साहसी, ईमानदार, स्पष्टवादी, परोपकारी, व्यवहारकुशल, कर्तव्यनिष्ठ, दृढ़ संकल्प शक्ति वाले होते हैं। भाई-बहन व संबंधियों की सहायता कम मिलती है। निजी पुरुषार्थ द्वारा ही निर्वाह योग्य आय के साधन जुटा पाते हैं। तनिक विरुद्ध बात हो जाने पर शीघ्र उत्तेजित हो जाते हैं परन्तु सच्चाई और सुपात्रता की दृष्टि से सुयोग्य जनों की सहायता करने में अपने स्वार्थ की बलि देने में भी पीछे नहीं हटते हैं। जातक जिस कार्य को करने का निश्चय कर लेता है उसका दृढ़तापूर्वक पालन करने का प्रयास करता है। केमिस्ट, इंजीनियर, वकील, पुलिस, सेना, अध्यापन, ज्योतिष अनुसंधानकर्ता के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करते हैं। शुभ नग मूंगा है। शुभ रंग लाल, संतरी, पीला, हल्का गुलाबी है। 24, 28, 32, 36 और 44वां वर्ष भाग्योदयकारक है।
धनु लग्न- धनु लग्न का स्वामी गुरु है। इस लग्न में उत्पन्न जातक का मस्तक ऊंचा, कान बड़े होते हैं। लग्न भाव में क्रूर ग्रह होने की स्थिति में सिर मध्य अल्प बाल और गंजा हो सकते हैं। गुरु व बुध की स्थिति शुभ हो तो सौम्य, शांत, सरल स्वभाव, धार्मिक प्रवृत्ति, उदार हृदय, परोपकारी, संवेदनशील, करुणा, दया आदि भावों से युक्त होंगे। दूसरों के मनोभावों को जान लेने की विशेष क्षमता होती है। इस लग्न में उत्पन्न व्यक्तियों में बौद्धिक एवं मानसिक प्रबलता के साथ-साथ अश्व जैसी तीव्रता, उत्साह व उत्तेजना से कार्य करने की क्षमता होती है। द्विस्वभाव राशि होने से शीघ्र कोई निर्णय नहीं ले पाते। इनको क्रोध नहीं आता है परन्तु जब आता है तो देर तक क्रोधित रहते हैं। अग्नि तत्व प्रधान होने से कठिन से कठिन समस्याओं को भी अपने साहस व परिश्रम से सुलझा लेते हैं। निजी पुरुषार्थ द्वारा जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति प्राप्त करते हैं। धन, भूमि, संपदा व सवारी आदि सुखों को प्राप्त करते हैं। मंगल व गुरु शुभ हो तो उच्च व्यावसायिक विद्या के योग मिलते हैं। शिक्षक, धर्मप्रचारक राजनीतिक, वैद्य, चिकित्सक, वकील, पुस्तक व्यवसाय आदि के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करते हैं। शुभ नग पुखराज है। 23, 27, 32 व 36वां वर्ष भाग्योदयकारक है।
मगर लग्न- मकर लग्न का स्वामी शनि है। इस लग्न में जन्म लेने वाले जातक का कद मध्यम, नयन नक्श तीखे, सुन्दर मुखाकृति, काले घने बाल व पतली कमर होगी। जातक गंभीर, भावुक हृदय वाला, संवेदनशील, उच्चाभिलाषी, सेवाधर्मी, मननशील व धार्मिक प्रवृत्ति वाले होते हैं। बुध व शुक्र शुभ होने पर व्यवहारकुशल, गहन विचार व सूक्ष्म विश्लेषण के पश्चात ही निर्णय लेते हैं। क्षमाशील प्राय: कम होते हैं तथा बदले व शत्रुता की भावना को भुला पाना कठिन होता है। चर लग्न होने से जातक की मानसिक व आत्मिक शक्ति प्रबल होती है। गुरु व शनि शुभ हों तो जातक नम्र स्वभाव, विनयशील, व्यवहारकुशल, नीति परायण, तर्कशील, भली-बुरी बात की पहचान करने में कुशल, विश्वसनीय, मित्रता स्थापित करने में अत्यंत सावधान तथा ईमानदार होते हैं। तर्क-वितर्क करने में कुशल तथा अपने विरुद्ध बात को भुला पाना कठिन होता है। खांसी तथा वायु रोग से पीड़ित हो सकते हैं। शुभ नग नीलम है। 22, 24, 28, 32, 44वां वर्ष भाग्योदयकारक है।
कुंभ लग्न- कुंभ लग्न का स्वामी भी शनि है। शनि यदि शुभ अवस्था हो तो जातक मध्यम अथवा ऊंचे कद वाला, सुन्दर व प्रभावशील व्यक्तित्व वाला होता है। बुद्धिमान, साधन संपन्न, तीव्र स्मरण शक्ति एवं गंभीर प्रकृति वाला होता है। दूसरे के प्रति दयाभाव रखने वाला, परोपकारी, मित्रों एवं सगे संबंधियों के लिए हर प्रकार से सहायक होता है। व्यवहारकुशल, मिलनसार, स्पष्टवादी एवं नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने में कुशल होता है। जातक स्वाभिमानी, स्वतंत्रताप्रिय व नए-नए मित्र बनाने में रुचि रखता है। उद्योगी, उद्यमी, परिश्रमी, प्रकृति एवं प्रबंधात्मक योग्यता विशेष होती है। देश-विदेश में जाने के सुअवसर भी मिलते हैं। महत्वाकांक्षी होते हुए भी क्रियात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। अनेक विघ्न-बाधा व कठिनाइयों के होने पर भी जीवन में उच्च स्थिति, धन-संपदा आदि प्राप्त करने में सफल होते हैं। कुंभ लग्न में यदि गुरु मित्र क्षेत्री या शुभ अवस्था में हो तो जातक उच्चाधिकारी, क्रय-विक्रय में कुशल, प्रोफेसर, जज, वकील अथवा धनी व्यापारी होता है। प्रारंभिक जीवन में आर्थिक क्षेत्र में विशेष संघर्ष का सामना करना पड़ता है। शुभ नग नीलम परन्तु स्त्री जातकों के लिए पुखराज शुभ है। 22, 24, 28 व 36वां वर्ष भाग्योदयकारक है।
मीन लग्न- मीन लग्न का स्वामी गुरु है। इस लग्न में उत्पन्न जातक गंभीर एवं सौम्य प्रकृति, परोपकारी, कार्य करने में तत्पर, ईमानदार, सत्यप्रिय, धार्मिक, दर्शन, साहित्य एवं गूढ़ विद्याओं में रुचि रखने वाले होते हैं। उच्चाभिलाषी व स्वाभिमानी प्रकृति, मान-मर्यादा व प्रतिष्ठा का विशेष ध्यान रखने वाले होते हैं। सेवा भाव करने वाले, तीव्र बुद्धि वाले, परिश्रमी, उद्यमी, दूरदर्शी, व्यवहारकुशल व नीति के अनुसार आचरण करने वाले होते हैं। विश्वसनीय ईमानदार और हर प्रकार के मित्रों एवं संगे संबंधियों के लिए सहायक होते हैं। परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेने की अपूर्व क्षमता होती है। देवतुल्य प्रकृति होती है। ये न तो दूसरे पर अन्याय करेंगे और न ही किसी भांति के अन्याय को सहन करेंगे। कलाकार, चलचित्र व्यवसाय, खाद्य वस्तुओं के व्यापार या सेवावृत्ति से संबंध रखने वाले, समाज सुधारक व अध्ययन संबंधी कार्यों में सफल होते हैं। शुभ नग पुखराज है। शुभ वैवाहिक जीवन के लिए पन्ना शुभ है। 24, 28, 33, 38 व 45वां वर्ष भाग्योदयकारक है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर गोरखपुर।


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  1. Gajadhar ... thank u for the info share !! I have offlate started following zodiac and horoscope !

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  2. your prediction quiet matches with my personality....

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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