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राहु व केतु के बीच जब सभी ग्रह आ जाते हैं तो कालसर्पयोग बनता है। राहु का स्थान वैदिक वांग्मय के आधार पर व चुम्बकीय आधार पर दक्षिण दिशा है। ठीक विपरीत उत्तर दिशा में केतु का स्थान है। राहु-केतु के मध्य लग्न और सप्तम भाव में मध्य अन्यान्य ग्रहों या इनके साथ भी अन्य ग्रह हों तो कालसर्पयोग होता है। जब भी लग्न में या सप्तम भाव में राहु या केतु या राहु से कालसर्पयोग बने व शेष ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि इनके मध्य आ जायं तो पूर्व प्रकाशित कालसर्प दोष होता है। जन्मांग में ग्रह स्थिति कुछ भी हो यदि सर्पयोनि हो तो निश्चय ही कालसर्पयोग बनता है। राहु-केतु के मध्य में शेष छह ग्रह हों एवं एक ग्रह बाहर हो और वह राहु के अंश से अधिक अंश में हो तो कालसर्पयोग भंग होता है। जब-जब राहु की दशा, अंतरदशा, प्रयन्तर दशा आती है। जब भी गोचरवश राहु अशुभ चलता हो। जब भी गोचर से कालसर्पयोग की सृष्टि हो, तो कालसर्प योग दंड देता है। प्रमुख रूप से द्वादश प्रकार के कालसर्प योग हैं। वासुकी, पद्म, कर्कोट, कुलिक, महापद्म, शंखनाद, तक्षक, अनन्त, शंखपाद, पातक, शेषनाग व विषाक्त।
कालसर्प दोष के परिणाम
वासुकी कालसर्प दोष: भाई-बहन व परिवार जनों को कष्ट उठाने पड़ते हैं। मित्रों से धोखा खाएगा। भाग्योदय में निरंतर उठा-पठक व व्यवधान उत्पन्न होंगे। नौकरी में बाधाएं, उन्नति में रुकावट, राजपक्ष से प्रतिकूलता, विदेश प्रवास में भारी कष्ट, कानूनी दस्तावेजों में भावुकतावस हस्ताक्षर कर पछताता है। नास्तिक भाव की प्रधानता रहती है। भाग्य स्थान में भाग्येश, राहु व बुध हों तो राजयोग बनता है। दसवें भाव में जब भी चार ग्रह की युति बनती हो तो जातक परस्त्री गमन करता है तथा बार-बार व्यापार व नौकरी से कष्ट उठाता है। जब आय भाव में कोई ग्रह नीच का हो तथा शत्रुग्रह से युक्त हो तो व्यक्ति के जीवन में बार-बार चोरी, डकैती आदि से धन के नुकसान होने की संभावना रहती है। 12वें भाव में राहु बैठा हो तथा सूर्य की युति हो तो बाल्यकाल में ही पिता की मृत्यु हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में सभी कालसर्पदोष से ग्रसित जातकों को तीर्थस्थान में कालसर्प की शांति, नागबलि तथा नारायणबलि कराने से लाभ होता है।
पद्म काल सर्प योग- पंचम स्थान से एकादश स्थान तक राहु -केतु के मध्य में सभी ग्रह होने पर पद्म काल सर्प योग होता है। जातक को गृहस्थ सुख में बाधाएं आयेंगी। जातक को संतान सुख का अभाव रहता है। वृद्घावस्था कष्टप्रद व्यतीत होती है। शत्रु कदम-कदम पर अहित करने का प्रयास करता है। जेल या कारागार भोगना पड़ता है। गुप्तांग सम्बन्धी रोग जातक को पीड़ा पहुंचाते हैं। रोग कठिन रहता है आय का यथेष्ट भाग दवाइयों में खर्च होता है। पत्नी चरित्रवान मिल जाय इसमें संशय है। सच्चे मित्रों का अभाव रहता है। सट्टे में, जुए में, अशुभ कार्यों में भारी हानि उठानी पड़ती है।
कर्कट काल सर्प योग: जब केतु द्वितीय, राहु अष्टम अथवा राहु द्वितीय और केतु अष्टम भाव में हो तो कर्कोट काल सर्प दोष होता है। जातक का अपने जीवन में भाग्योदय होता ही नहीं । नौकरी प्राय: नहीं मिलती। अगर मिलती भी है तो पदोन्नति नहीं होती। अथक प्रयास करने पर भी व्यापार चलता नहीं है। निरन्तर घाटा होता रहता है। चाहकर भी जातक को पैतृक सम्पत्ति मिलती नहीं है। लम्बी असाध्य बीमारी भोगनी पड़ सकती है। आपरेशन, चीर-फाड़ हो सकती है। सच्चे मित्रों का अभाव हरदम रहता है। ऐसे जातक को आकाल मृत्यु हो जाय इसमें संशय नहीं है।
कुलिक काल सर्प योग- केतु द्वितीय और राहु अष्टम भाव में हो तो कुलिक काल सर्प योग होता है। जातक की स्त्री कुरूप, निरमोही, अल्प वहमी होती है। संतान सुख की न्यूनता रहेगी। स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट, मूत्र रोग, गुर्दे में परेशानी। जातक अपने जीवन में अनेक स्त्रियों से संन्सर्ग कर अपमानित होता है। मित्र कदम-कदम पर धोखा देते हैं। पिता की मृत्यु अल्प आयु में हो जाती है।
महापद्म काल सर्प योग- जब राहु षष्टम भाव में व केतु द्वादश भाव में हो तो महापद्म काल सर्प योग होता है। जातक प्रेम प्रकरण में सर्वथा असफल रहता है। पत्नी का विरह योग सहन करना पड़ता है। जातक आयु पर्यन्त रोग, शोक, कष्ट और शत्रु से घिरा रहता है। आय में न्यूनता, धर्म क्षति एवं खर्च की बहुलता रहती है।
शंखनाद काल सर्प योग- जब राहु नवम् भाव में और केतु तृतीय भाव में हो तो शंखनाद काल सर्प योग होता है। जातक को राज्य पक्ष से प्रतिकूलता, मानहानि होती है। गृहस्थ सुख में बाधा एवं भोग से अतृप्त रहता है।
तक्षक काल सर्प योग- जब राहु सप्तम में, केतु लग्न में हो तब तक्षक काल सर्प योग होता है। जातक को संतान का सर्वथा अभाव रहता है। स्त्री परिगामी हो जाती है। जीवन में कई बार जेल की यात्रा करनी पड़ती है।
अनन्त काल सर्प योग- जब लग्न में राहु एवं सप्तम भाव में केतु हो, अनन्त काल सर्प योग होता है। जातक को जीवन में मानसिक शान्ति नहीं मिलती है। जातक नीच भाव का और कपटी होता है। जातक का गृहस्थ जीवन शून्यवत रहता है।
शंखपाद काल सर्प योग- जब राहु सुखस्थ व केतु कर्म भाव में हो तो शंखपाद काल सर्प योग होता है। जातक का धन्य- धान्य, समृद्घि तथा चल-अचल सम्पत्ति बिक ही जाती है। भाई- बहन, माता- पिता से परेशानी होती है। शिक्षा प्राप्ति में जीरो होता है।
पातक काल सर्प योग- जब राहु दशम और केतु चतुर्थ भाव में हो तो पातक काल सर्प योग होता है। जातक व्यापार में बार - बार हानि उठाता है। संतान होकर भी मर जाती है। माता- पिता से शत्रुता होती है।
शेषनाग काल सर्प योग- जब राहु बारहवें एवम केतु षष्ट भाव में हो तो शेषनाग काल सर्प योग होता है। जातक गुप्त शत्रुओं से हमेशा पीड़ित रहेगा। शरीर सुख नहीं रहेगा, स्वास्थ्य उतरता ही रहेगा। कोर्ट- कचहरी में जातक की हार होती है।
विषाक्त काल सर्प योग- जब राहु एकादश भाव में व केतु पंचम भाव में हो, शेष ग्रह इनके मध्य हों तो विषाक्त काल सर्प योग होता है। जातक अपनी आजीविका के लिए घर- परिवार से दूर रहता है। भाइयों से भरपूर विवाद, कोर्ट- कचहरी का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से बड़े भाई से। नेत्र रोग, हृदय रोग आदि से पीड़ित रहता है।
ज्योतिषाचार्य शत्रुंजय शुक्ल, कुशीनगर

keyword: kalsarp yog, jyotish

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