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जातक जिस मंत्र की साधना करना चाहता हो, उसका तथा साधना करने वाले के नाम का पहला अक्षर दोनों यदि एक ही कुल के हों तो वह मंत्र निश्चित फल देने वाला होता है। मंत्र और उसके उपासक की प्रकृति में समानता होने से सफलता की संभावनाएं अधिक होती हैं। यदि इन वर्णों में प्रकृति साम्यता न हो तो फिर प्रकृति मैत्री देखना चाहिए। इसे जानने के लिए कुलाकुल चक्र के अनुसार पृथ्वी आदि पांचों तत्वों में किन-किन तत्वों की किन-किन तत्वों के साथ मित्रता है, यह देख लेना चाहिए। साधक और साध्य मंत्र के अक्षरों में प्रतिकूलता वाले मंत्रों की साधना फलदायी नहीं होती। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पांच तत्वों में वर्णमाला के वर्णों को बांटकर कुलाकुल चक्र की रचना की गई है, जिसमें पृथ्वी एवं जल आदि तत्वों का आकाश तत्व के साथ मैत्री है, वायु तत्व का पृथ्वी तत्व शत्रु है तथा अग्नि तत्व का जल व पृथ्वी तत्व शत्रु हैं। जिस प्रकार एक औषधि के अनेक विकल्प होते हैं, उसी प्रकार एक ही साधना के लिए अनेक मंत्र हैं, इसलिए मंत्रों के चयन में कठिनाई नहीं होती। कुलाकुल चक्र के अतिरिक्त राशि चक्र, अवकहड़ा चक्र, नक्षत्र चक्र व अघट चक्र द्वारा भी अनुकूल मंत्र का निश्चय किया जा सकता है।

मंत्रोच्चारण: मंत्र का शुद्ध उच्चारण एवं उचित बलाघात मंत्र के प्रभाव को प्रभविष्णुता प्रदान करता है। आज तो ध्वनि विज्ञान के विषय में अनेकानेक क्रांतिकारी और आश्चर्यजनक शोध कार्य संपन्न हो चुके हैं। मंत्रोच्चारण के समय वाक्य दोष, यदि दोष, विराम दोष आदि का पूर्ण विचार आवश्यक है। इस प्रक्रिया में शब्द, ध्वनि व लय का विशेष महत्व है। महार्थमंजरी के अनुसार- ‘मननमयी निजविभवे त्राणमयी। कवलितविश्वविकल्पा अनुभूति: कापि मंत्रशब्दार्थ:।।’
मंत्रोपासना की प्रारंभिक बातें विनियोग, न्यास और संकल्प आदि हैं, जिन्हें किसी अधिकारी गुरु या आचार्य से पूछना उचित होगा। गोस्वामी तुलसीदास ने मंत्र के विषय में कहा है- ‘मंत्र परम लघु जासु बल, विविहरिहर सुर सर्ब। महामत्त गजराज कहुं, बस कर अंकुस खर्ब।।’ किन्तु मंत्र द्वारा सम्यक लाभ प्राप्ति हेतु उसमें श्रद्धा व विश्वास करना आवश्यक है। अनास्थापूर्ण किया गया कोई भी मंत्र सिद्धि अथवा फल की सीमा तक नहीं पहुंचता। मंत्र की अपरिमिति शक्ति के प्रति हृदय में अगाध आस्था होनी चाहिए। पिंगलामत के अनुसार- ‘मननं विश्व विज्ञानं त्राण संसारबन्धनात्। धृत: करोति संसिद्धिं मंत्र इत्युच्यते तत:।।’
इस आवश्यक वर्णन विस्तार के अनन्तर अब मंत्रों का उल्लेख प्रस्तुत है। पुराकाल से भारतीय जनजीवन वेद जननी गायत्री की अलौकिक शक्ति का श्रद्धालु रहा है। सभी वर्ग व वर्ण के मनुष्य इससे लाभान्वित होते हैं। सौभाग्य संप्राप्ति एवं मनोनुकूल वर हेतु गायत्री उपासना एक अमोघ उपाय है- ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
गौरी प्रतिष्ठा विधि और जपादि- कन्याओं को उत्तम वर शीघ्र प्राप्त हो इसके लिए सर्वाधिक प्रचलित और अनुभव सिद्ध प्रयोग अग्नि महापुराण के गौरी प्रतिष्ठा विधि नामक 17वें अध्याय का है। इस अध्याय में दी गई विधि के अनुसार जपादि करने से 72 दिन से लेकर 180 दिन के भीतर विवाह निश्चित हो जाता है। जप के लिए मंडप आदि की रचना करके देवी की स्थापना करें। पूर्वाेक्त मंत्रों व मूर्त्यदिकों का न्यास करके आत्मतत्व, विद्यातत्व व शिव तत्व की परमेश्वर में स्थापना करें। तदन्तर पराशक्ति का न्यास, होम और जप पूर्ववत करके क्रियाशक्ति स्वरूपिणी पिण्डी का सन्धान करें। इस विधि से पिण्डी की स्थापना करके उसके ऊपर देवी को स्थापित करें। ये देवी परम शक्तिस्वरूपा हैं। उनका अपने ही मंत्र से सृष्टि न्यास पूर्वक स्थापन करें। तदन्तर पीठ में क्रिया शक्ति का और देवी के विग्रह में ज्ञानशक्ति का न्यास करें। इसके बाद सर्वव्यापिनी शक्ति मां का आवाहन करके देवी की प्रतिमा में उनका नियोजन करें। फिर शिवा नाम वाली अम्बिका देवी का स्पर्श पूर्वक पूजन करें।
पूजा के मंत्र इस प्रकार के हैं-
ॐ आं आधारशक्तये नम: ॐ कूर्माय नम:।
ॐ स्कंदाय नम: ॐ ह्रीं नारायणाय नम:।।
ॐ ऐश्वर्याय नम:। ॐ अधरछननाय नम:।
ॐ पद्मासनाय नम:।
तदन्तर केसरों की पूजा करें। तत्पश्चात ॐ ह्रां कार्णिकायै नम:। ॐ क्षं पुष्कराक्षेभ्‍यो नम:।। इन मंत्रों द्वारा कर्णिका एवं कमलाक्षों का पूजन करें। इसके बाद ॐ ह्रां पुष्टयै नम:। ॐ ह्रीं ज्ञानायै नम:। ॐ ह्रां क्रियायै नम:। मंत्रों द्वारा पुष्टि, ज्ञान एवं क्रिया शक्ति का पूजन करें। ॐ नालाय नम:। ॐ रुं धर्माय नम:। ॐ रुं ज्ञानाय वै नम:। ॐ वैराग्याय नम:। ॐ वै अधर्माय नम:। ॐ रुं अज्ञानाय वै नम:। ॐ अवैराग्याय वै नम:। ॐ अनैश्वर्याय नम:। इन मंत्रों द्वारा नाल आदि की पूजा करें।
ॐ हूं वाचे नम:। ॐ ह्रां रागिण्यै नम:। ॐ हूं ज्वालिन्यै नम:। ॐ ह्रां शमायै नम:। ॐ हूं ज्येष्ठायै नम:। ॐ ह्रौं रीं क्रीं नवशक्त्यै नम:। ॐ गौ गौर्यासनाय नम:। इन मंत्रों द्वारा वाक्आदि शक्तियों की पूजा करें।
अब गौरी का मूल मंत्र बताया जाता है-
ॐ गौ गौर्यासनाय नम:। ॐ गौरीमूर्तये नम:।
ॐ ह्रीं स: महागौरि रूद्रदयिते स्वाहा गौर्ये नम:।
ॐ गां हृदयाय नम: ॐ गौ शिरसे स्वाहा।
ॐ गूं शिखायै वषट्। ॐ गैं कवचाय हुम्।
ॐ गौं नेत्रयाय वौषट्। ॐ ग: अस्त्राय फट्।। इन मंत्रों से शिखा आदि का न्यास करें।
ॐ गौं विज्ञान शक्तये नम:। ॐ गूं क्रियाशक्तये नम:। इन मंत्रों से विज्ञान और क्रियाशक्तियों की पूजा करें, पूर्वादि दिशाओं से इन्द्रादि देवताओं का पूजन करें। ॐ सुं सुभगायै नम:। इस मंत्र से सुभगा का और ॐ ललितायै नम:। इस मंत्र से ललिता का पूजन करें। ॐ ह्रीं कामिन्यै नम:, ॐ ह्रं काममालिन्यै नम:। इन मंत्रों से गौरी की प्रतिष्ठा, पूजा और जप करने से उपासक सब कुछ पा लेता है। इस प्रकार मां गौरी देवी की सविधि प्रतिष्ठा के पश्चात निम्नलिखित मंत्रों में से किसी का जप प्रतिदिन एकाग्रता, निष्ठा और विश्वासपूर्वक करें-
ॐ ह्रीं स: महागौरि रूद्रदयिते स्वाहा गौर्ये नम:, ॐ ह्रीं गौर्ये नम:।
अथवा
हे गौरि शङ्करार्धाङ्गि यथा त्वं शङ्करप्रिया।
तथा मां कुर कल्याणि कान्ताकान्तां सुदुर्लभाम्।।
इन मंत्रों का बताई गई विधि के अनुसार जप करने से शीघ्र ही उत्तम, अनुकूल व सच्चरित्र वर की प्राप्ति होती है। यह अनेक बार का परीक्षित प्रयोग है।
आकाश तत्व के मंत्र समस्त कन्या के लिए करणीय हैं। मंत्र जप से पूर्व मां गौरी की श्रद्धापूर्वक अर्चना करनी चाहिए।
ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके न मानयति कश्चन।
ससत्यकश्चक: सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्।।
पृथ्वी तत्व का प्रमुख यह मंत्र आकाश और जल तत्व प्रधान जातकों के लिए हितकर और वायु प्रधान जातकों के लिए वर्जित है। दुर्गासप्शती से संपुटित करके इस मंत्र का स्वयं पाठ करना चाहिए या किसी सुयोग्य पंडित से कराना चाहिए।
कात्यायनि महामये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि! पतिं मे कुरु ते नम:।

आचार्य पवन कुमार राम त्रिपाठी, प्रवक्ता श्रीकाशीविश्वेश्वर संस्कृत महाविद्यालय मुंबई




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