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नवार्ण मंत्र- ‘ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ की शक्ति अपार है। इसमें मां जगदम्बा की शक्ति समाई हुई है। इसका अनुष्ठान करने वाले साधक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह सरल है और शीघ्र सिद्ध होता है। इस मंत्र में ‘ऐं’ मां सरस्वती का, ‘ह्रीं’ मां लक्ष्मी या भुवनेश्वरी का तथा ‘क्लीं’ मां काली का प्रतीक है। इन बीज मंत्रों में इन देवियों की शक्तियां समाई हैं। नवार्ण मंत्र की साधना धन-धान्य, सुख-समृद्धि आदि सहित सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है। अनुष्ठान यदि बिना विशेष कामना के भी किया जाय तो मां दुर्गा साधक को सभी सुख स्वत: प्रदान कर देती हैं। यदि इसकी मौन एवं दीर्घकालिक साधना की जाय तो वाक्सिद्धि प्राप्त होती है।
नवार्ण मंत्र का अनुष्ठान चार लाख मंत्र जप, उसका दशांश अर्थात चालीस हजार खीर, अन्न और घृत की आहुति देते हुए हवन, हवन के दशांश अर्थात चार हजार बार तर्पण, तर्पण का दशांश अर्थात चार सौ बार मार्जन और मार्जन का दशांश चालीस ब्राह्मणों को भोजन करवाने पर संपन्न होता है। एक बार अनुष्ठान से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। इसके बाद उसका विभिन्न प्रकार से प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए नवरात्र का समय श्रेष्ठ होता है। नवरात्र के प्रथम आठ दिनों में नौ पंडित 56 माला जप करके इस अनुष्ठान को संपन्न कर सकते हैं। नौवें दिन हवन, तर्पण आदि कार्य करने चाहिए। उक्त मंत्र में जप के साथ प्रतिदिन दुर्गासप्तशती के एकाधिक पाठ भी करना श्रेष्ठ है। इस अनुष्ठान में अन्य सामान्य मण्डल मनाए जाते हैं लेकिन मां दुर्गा के लिए सर्वतोभद्र मण्डल की रचना विशेष रूप से की जाती है। इसमें पूर्वादि क्रम से जया, विजया, अजिता, अपराजिता, नित्या, विलासिनी, द्रोग्ध्री, अघोरा और मंगला की भी पूजा की जानी चाहिए। तत्पश्चात नवार्ण यंत्र की स्थापना इस नवपीठ शक्तिमंडल के मध्य में करनी चाहिए। यंत्र स्वर्ण, रजत या ताम्रपत्र पर बना हो तो अधिक अच्छा है। यंत्र का स्वरूप इस प्रकार का हो कि मध्य में एक त्रिकोण, त्रिकोण के बाहर एक षट्कोण, षट्कोण के बाहर अष्टदल, अष्टदल के बाहर चतुर्विंशति दल और चतुर्विंशति दल के बाहर चतु:षष्ठि दल बनाना चाहिए। इसके चारो तरफ चतुर्दारात्मक भूपुर होता है। इस यंत्र को घृत, दुग्ध और शुद्ध जल से स्नान कराकर कोरे वस्त्र से साफ किया जाता है। इसकी स्थापना से पूर्व ‘ऊं ह्रीं वज्रनखदंष्ट्राय महासिंहाय फट्’ का उच्चारण करते हुए पुष्प का आसन प्रदान करना चाहिए। फिर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए। पूजन क्रम में समस्त दलों की पूजा करनी चाहिए। इस यंत्र में सिंह एवं चौसठ योगिनियों सहित मां की समस्त शक्तियां विराजित होती हैं। यह यंत्र साक्षात दुर्गा स्वरूप है। इसके अतिरिक्त गणपति, गौरी, षोडशमातृका, पंच लोकपाल आदि का मंडल निर्माण एवं पूजा अर्चना भी इसमें होता है। यह मां दुर्गा का अनुष्ठान है इसलिए इसमें एक कन्या का भी पूजन करना चाहिए। मंत्र जप से पूर्व एवं नवपीठ शक्ति के पूजन से पूर्व विनियोग, ऋष्यादि न्यास, मातृका न्यास, सारस्वत न्यास, मातृगण न्यास इत्यादि एकादश प्रकार के न्यास भी करने चाहिए। इसके बाद महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का ध्यान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार नवार्ण मंत्र को नाभिपर्यन्त जल में खड़े होकर एक हजार बार जप करने से कवित्व शक्ति प्राप्त होती है। दस हजार बार जप करने से बंधन से मुक्ति, विल्व वृक्ष के समीप जपने से और उड़द, घी, कमल पुष्प, खीर, विल्व पत्र, गुड़ के हवन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इसी तरह नवार्ण मंत्र का संपुट लगाते हुए दुर्गा सप्तशती का नित्य एक पाठ करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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  1. आपकी इस प्रविष्टि क़ी चर्चा सोमवार [15.4.2013]के चर्चामंच1215 पर लिंक क़ी गई है,
    अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए पधारे आपका स्वागत है | सूचनार्थ..

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