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नवरात्र 11 अप्रैल से, महाष्टमी व्रत 18 अप्रैल को
रामनवमी 19 अप्रैल को, इसी दिन होगा हवन
अशुद्धि में भी की जा सकती है देवी पूजाचैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लेकर नवमी तक जो देवी का प्रसिद्ध पर्व काल है उसे वासंतिक नवरात्र कहते हैं। 11 अप्रैल को सूर्योदय 5.45 बजे है और प्रतिपदा तिथि का मान 23 दंड 12 पला अर्थात दिन में 3.03 बजे तक है। नवरात्र प्रारंभ होने का यह सर्वोत्तम दिन है। इस वर्ष नवरात्र नौ दिनों का है। इसकी पूर्णाहुति 19 अप्रैल को होगी। नवरात्र पूजा परम सिद्धिदायिनी है। इसमें नौ दिनों के व्रत का विधान है।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार नवरात्र व्रत करने वालों को एक समय भोजन करना चाहिए। नौ दिन जो उपवास न कर सकें उन्हें सप्तमी, अष्टमी व नवमी के दिन उपवास करना चाहिए। इन तीन तिथियों में उपवास का फल नौ दिनों के उपवास के बराबर होता है। व्रत के दौरान एक समय भोजन करके या रात्रि में भोजन करके अथवा बिन मांगे जो मिल जाए उसे ग्रहण कर साधना करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार असमर्थ व्यक्ति गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य इत्यादि से पंचोपचार पूजा करें, यदि यह भी संभव न हो तो केवल पुष्प व जल से ही पूजा करें। पुष्प व जल के अभाव में भी केवल भक्ति भाव से भी पूजा करें तो देवी उनपर प्रसन्न होती हैं और उनके सभी मनोरथों को सिद्ध करती हैं। व्रती को चाहिए कि इन दिनों में भूमि शयन, मिताहार, ब्रह्मचर्य का पालन, क्षमा, दया, उदारता व उत्साहादि की वृद्धि और क्रोध, लोभ, मोह आदि का त्याग करें।
देवी के उद्देश्य से अशौच (अशुद्धि) में भी पूजन कर्म और दान किया जा सकता है। इसमें कोई दोष नहीं है। ‘विश्वरूपा निबंध’ में कहा गया है- ‘सूतके पूजनं प्रोक्तं दान चैव विशेषत:। देवीमुद्दिश्य तत्र दोषो न विद्यते।।’ ऐसी स्थिति में पूजन स्वयं न करके ब्राह्मण द्वारा समस्त पूजन कराए जाते हैं। पूजा करने वाले ब्राह्मण को भोजन अशुद्धि खत्म होने के बाद कराना चाहिए।
कलश स्थापन: प्रथम दिन देवी पूजन के उद्देश्य से कलश स्थापित करना चाहिए। विष्णु धर्मोत्तर में इस विषय में कहा गया है- ‘भाष्करोदयमारभ्‍य यावन्तु दस नाडिका:। प्रात:काल इति प्रोक्त: स्थापनारोपणदिषु।।’ देवी का आवाहन, प्रवेशन, नित्यार्चन और विसर्जन, ये सब प्रात:काल में शुभ होते हैं। इसलिए इस उचित समय का उपयोग करें। इसके लिए द्विस्वभाव लग्न और अभिजित मुहूर्त अत्यंत उत्तम माना जाता है। मीन व मिथुन द्विस्वभाव लग्न है। मीन लग्न प्रात: 5.45 बजे से प्रात: 5.32 बजे तक तथा मिथुन लग्न पूर्वाह्न 9.25 बजे से पूर्वाह्न 11.39 बजे तक है। अभिजित मुहूर्त दिन में 11.35 बजे से 12.25 बजे तक है।
महाष्टमी व महानवमी विचार: 18 अप्रैल को सूर्योदय 5.40 बजे है और अष्टमी तिथि का मान 53 दंड 44 पला अर्थात रात्रि 3.10 बजे तक है। इसलिए महाष्टमी व्रत 18 अप्रैल को ही रहा जाएगा। यह दिन महानिशा पूजा तथा भवानी की उत्पत्ति के दिन के रूप में जाना जाता है। 19 अप्रैल को सूर्योदय 5.39 बजे और नवमी तिथि का मान 56 दंड 48 पला अर्थात रात्रिशेष 4.22 बजे तक है। हवन की दृष्टि से यह दिन उत्तम रहेगा। इसी दिन रामनवमी भी है। भगवान राम का जन्म इसी दिन हुआ था।
कैसे करें पूजा: पूजा स्थल की साफ- सफाई कर नया या साफ-सुथरा वस्त्र धारण कर कलश स्थापित करने के बाद पूजा शुरू करें। सामने देवी की प्रतिमा कलश पर या आसन पर स्थापित करें। गणपति पूजन, गौरी पूजन, कलश पूजन, मातृका पूजन, नवग्रह पूजन कर देवी की समस्त उपचारों से सविधि पूजन करें। इसमें देवी भागवत, कालिका पुराण, मारकण्डेय पुराण, नवार्ण मंत्र के पुनश्चरण और दुर्गापाठ के साथ ही श्रीमद्भागवत, अध्यात्म रामायण, बाल्मीकि रामायण, तुलसीकृत रामायण आदि का पाठ व जप किया जा सकता है। क्योंकि यह नवरात्र देवी नवरात्र व राम नवरात्र दोनों ही नामों से प्रसिद्ध है। पूर्व मुख या उत्तर मुख होकर देवी की सोने, चांदी या मिट्टी अथवा चित्रमयी मूर्ति का आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, नीराजन, पुष्पांजलि, नमस्कार और प्रार्थना इत्यादि उपचारों से पूजन करें। इसमें कन्या पूजन व वटुक पूजन का विशेष महत्व है।
पूजन सामग्री: रोली, मौली, केशर, सुपाड़ी, चावल, जौ, सुगन्धित पुष्प, इलायची, लौंग, पान, सिन्दूर, श्रृंगार सामग्री, दूध, दही, शहद, गंगाजल, शक्कर, शुद्ध घी, जल, वस्त्र, आभूषण, बेल पत्र, यज्ञोपवीत, सर्वौषधि, अखंड दीपक, पंचपल्लव, सप्तमृत्तिका, कलश, दूर्वा, चंदन, इत्र, चौकी व उसपर बिछाने का लाल वस्त्र, दुर्गा जी की प्रतिमा या फोटो, सिंहासन, फल, धूप, नैवेद्य, शुद्ध मिट्टी, थाली, कटोरी, नारियल, दीपक, ताम्रकलश, रूई, कर्पूर, माचिस व दक्षिणा।

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