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मां दुर्गा साधक की उपासना से प्रसन्न होकर बाधक बन रहे ग्रह दोषों को दूर कर देती हैं। उपासक (साधक) के जीवन में खुशहाली आती है। दुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री की आराधना से चंद्र दोष दूर होता है। इससे मतिभ्रम समाप्त होकर निर्णय शक्ति बढ़ जाती है। राजकृपा, संपत्ति, आभषूण इत्यादि की पूर्ण प्राप्ति होती है। साथ ही रक्त विकार, गर्भाशय, नेत्र, उदर विकार, कफ संबंधी रोग, सर्दी, मिरगी इत्यादि रोगों से मुक्ति मिल जाती है। दुर्गा के द्वितीय रूप ब्रह्मचारिणी की उपासना से बुध ग्रह का दोष दूर होता है इससे उपासक को श्रेष्ठ बुद्धि अर्थात विवेकशीलता की प्राप्ति होती है जिससे अध्ययन, व्यापार और प्रत्येक कर्म क्षेत्र में सफलता मिलती है। इसके साथ ही साधक को त्वचा, मस्तिष्क, आंतें, श्वास नली, वाणी, गला, नासिका रोग व नपुंसकता से मुक्ति मिलती है। मां भगवती के तृतीय रूप चंद्रघंटा की उपासना से बृहस्पति ग्रह के दोष दूर होते हैं इससे साधक को सर्वोन्नति, प्रज्ञा, धन, ज्ञान, शिक्षा इत्यादि की प्राप्ति होती है। साथ ही मधुमेह, रक्ताल्पता, टाइफाइड, किडनी, मोटापा, मांसपेशियों की समस्या और पीलिया इत्यादि रोगों से मुक्ति मिलती है। मां दुर्गा के चतुर्थ रूप कूष्माण्डा की उपासना से ग्रहों के राजा सूर्य का दोष दूर होता है। इससे उपासक को राज्य पक्ष से लाभ मिलता है तथा आरोग्यता, शक्ति, प्रतिष्ठा आदि की प्राप्ति होती है। इनकी आराधना से साधक को नेत्र, केश, सिर, मस्तिष्क, हृदय इत्यादि रोगों से मुक्ति मिलती है। स्कंद माता मां दुर्गा का पांचवां रूप है। इनकी उपासना से मंगल ग्रह के दोषों से मुक्ति मिलती है। उपासक को बल व पराक्रम की प्राप्ति होती है। साथ ही यौन शक्ति, रक्त, अस्थि, निर्बलता इत्यादि रोगों से मुक्ति मिलती है। दुर्घटना, कुष्ट रोग, शस्त्राघात, चोट आदि की आशंका भी समाप्त हो जाती है। मां दुर्गा के षष्ठम रूप मां कात्यायनी की उपासना से राहु ग्रह का दोष समाप्त होता है। साथ ही संक्रमण, मस्तिष्क, त्वचा संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है। असाध्य व आकस्मिक रोग होने की आशंका समाप्त होती है। मां दुर्गा के सातवें रूप माता कालरात्रि की आराधना से शनि ग्रह के दोष दूर होते हैं। कालरात्रि के स्थान पर मां काली की भी पूजा की जा सकती है। इससे मृत्यु तुल्य कष्टों, अवसादों से मुक्ति मिलती है। सभी क्षेत्रों में सफलता मिलती है तथा अवमानना का अंदेशा नहीं रहता है। इसके साथ ही हड्डियों के जोड़ों, पैर, वात, स्नायुतंत्र, सर्दी, श्वांस इत्यादि रोगों से मुक्ति मिलती है। निराशा, चिंता व भय से निजात मिलती है। मां दुर्गा के आठवें रूप माता महागौरी की उपासना से शुक्र ग्रह के दोष दूर होते हैं। इससे व्यापार, दाम्पत्य सुख, संपत्ति, धनकोष आदि में वृद्धि होती है। अभिनय, गायन, नृत्य इत्यादि में सफलता मिलती है। इसके साथ ही स्वादेन्द्रियां, मूत्र उत्सर्जन, प्रजनन तंत्र, काम, अन्त:स्रावी गंथियों इत्यादि से संबंधित रोगों से मुक्ति मिलती है। मां दुर्गा के नौंवें रूप सिद्धिदात्री की आराधना से केतु के दोषों से मुक्ति मिलती है। इससे उपासक को आकस्मिक उन्नति, शेयर से आय, मनमाफिक स्थानांतरण, कार्य क्षेत्र में सफलता इत्यादि शुभ फलों की प्राप्ति होती है। जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। साथ ही रक्त, चर्म, वात इत्यादि से संबंधित रोग दूर होते हैं।
ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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  1. .सार्थक जानकारी भरी पोस्ट आभार नवसंवत्सर की बहुत बहुत शुभकामनायें नरेन्द्र से नारीन्द्र तक .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MANजाने संविधान में कैसे है संपत्ति का अधिकार-1

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