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नवरात्र दो ऋतुओं का संधिकाल है। इन नौ दिनों का संयम व्यक्ति को संधिकाल की चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाता है। इस समय को आयुर्वेद में ‘यमराज का जबड़ा’ कहा गया है। इस समय विभिन्न प्रकार के रोगाणुओं और विकारों का तीव्रता से आक्रमण होता है। जो शरीर व आत्मा दोनों को प्रभावित करते हैं। इसीलिए इस दिनों शक्ति पूजा का विधान है ताकि मनुष्य सयंमित होकर शक्ति अर्जित करे और नौ दरवाजों वाले शरीर को शुद्ध व प्रतिरोधक बना सके।
आचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार सूर्य की परिक्रमा के दौरान एक वर्ष में चार संधियों में चार नवरात्र होते हैं। जिनमें मार्च (वसंत ऋतु) और सितम्बर (शरद ऋतु) के आसपास पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। वसंत के संधिकाल को वासंतिक या चैत्र नवरात्र तथा शरद के संधिकाल को शारदीय नवरात्र कहते हैं। इन संधि समयों में शरीर में बहुत सारे रासायिनिक परिवर्तन होते हैं। इसलिए रोगाणुओं व रोगों तथा विकारों की बढ़ने की प्रबल आशंका होती है। रोग शरीर को तथा विकार मन व आत्मा को प्रभावित करते हैं। शरीर व आत्मा यानी मनुष्य का संसार व धर्म दोनों प्रभावित होने की आशंका बलवती हो जाती है। शायद इसीलिए भारतीय मनीषा ने इस संधिकाल को धर्म से जोड़कर शक्ति आराधना का समय निर्धारित किया। अमावस्या की रात से लेकर अष्टमी तक या प्रतिपदा से लेकर नवमी के दोपहर तक नौ दिनों तक व्रत-नियम करने से इसे नवरात्र नाम दिया गया।
देवी भागवत में चार नवरात्रों का वर्णन है। चैत्र नवरात्र, अषाढ़ नवरात्र, अश्विन नवरात्र व माघ नवरात्र। इसमें चैत्र व अश्विन नवरात्र प्रगट नवरात्र कहलाते हैं तथा अषाढ़ व माघ नवरात्र गुप्त नवरात्र कहलाते हैं। प्रगट नवरात्र जनमानस में व्याप्त हैं और गुप्त नवरात्र सिर्फ शक्तिपीठों पर प्रचलित हैं। इसके अतिरिक्त पौष मास के शुक्ल पक्ष सप्तमी से पौष पूर्णिमा तक पश्चिमी भारत में एवं सिंध प्रांत में प्रचलित शाकम्भरी नवरात्र का आयोजन होता है। इसके अलावा ‘शाक्त प्रमोद’ के अनुसार नवरात्रों की संख्या 40 है। यह मत वर्ष के संपूर्ण दिनों को नौ-नौ खंडों में विभाजित कर सभी दिनों को जगदम्बा को समर्पित मानता है।

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