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नवरात्र के नौ दिन हिंदू घरों में शैलपुत्री और ब्रह्मचारिणी से लेकर कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि तक आदिशक्ति के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। आमतौर पर हम यही जानते हैं कि नवरात्र में इन्हीं देवियों की उपासना होती है लेकिन इस दौरान देवी के इन नौ रूपों के अलावा देवी अन्नपूर्णा की पूजा भी की जाती है। नवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से पहले देवी अन्नपूर्णा की पूजा करने का विधान है।
चैत्र नवरात्र की नवमी शुक्रवार को है और हर हिंदू घर में, जहां कलश स्थापना होती है, पूरे विधि-विधान के साथ नवमी पूजा की जाती है। इस दिन मां सिद्धिदात्रि की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि यह देवी समस्त सिद्धियों की दाता हैं। लेकिन नवमी के दिन इनकी पूजा से पहले देवी अन्नपूर्णा को पूजा जाता है। नवमी के सूर्योदय से पहले कड़ाही पूजा की जाती है, जिसमें दाल की पूड़ी, सादी पूड़ी, सब्जी और लप्सी (आंटे का हलवा) बनाया जाता है और फिर उसे हवन-पूजन के बाद प्रसाद के रूप में खाया जाता है। पं. शरद चन्द्र मिश्र कहते हैं कि नवमी के सूर्योदय से पहले की जाने वाली कड़ाही पूजा दरअसल अन्नपूर्णा देवी की पूजा है। इसमें रात्रि के पिछले भाग अर्थात नवमी के प्रारंभ होने पर मीठा अन्न बनाकर देवी को समर्पित किया जाता है। कड़ाही पूजा को सूर्योदय के पहले करने का कारण बताते हुए पं. शरद कहते हैं कि ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि सभी मुहूर्त में ब्रह्ममुहूर्त श्रेष्ठ मुहूर्त होता है। पूजा के लिए यह सर्वोत्तम काल माना जाता है। कड़ाही पूजन में इतने पकवान बनाने के बाद इसे हवन के बाद खाने का वैज्ञानिक कारण भी हैं। पं. मिश्र ने बताया कि तेल, घी में पकी हुई चीजों में कीटाणुओं का प्रवेश नहीं होता है। इस तरह से पका हुआ भोजन देर तक शुद्ध रहता है। इसलिए इसे पूजन के बाद देर से खाते हैं।
नवरात्र के नौ दिनों में सप्तमी, अष्टमी और नवमी की विशेष मान्यता है। पं. शरद चन्द्र मिश्र कहते हैं कि इन तीनों तिथियों का योग महत्वपूर्ण है। जो लोग नौ दिन तक उपवास नहीं रखते हैं इन तीन दिनों का व्रत अवश्य करना चाहिए। ये नवरात्र की त्रिरात्रि तिथियां कहलाती हैं। इसमें कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्रि देवी की पूजा की जाती है। उन्होंने बताया कि इन तीनों तिथियों का सम्बंध महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवी से भी है। कालरात्रि स्वरूप देवी का संहारक स्वरूप हैं। पराम्बा महादेवी सृष्टि का सृजन-पोषण और संहार करती हैं। ऐसी मान्यता है कि महाअष्टमी के दिन भवानी की उत्पत्ति हुई है, इसलिए यह अत्यंत मान्य तिथि के रूप में जानी जाती है। वहीं संपूर्ण सिद्धियों को प्रदान करने वाली सिद्धिदात्री देवी हैं। इसलिए महानवमी के दिन पूजा करने के पश्चात हवन के द्वारा देवी के संपूर्ण स्वरूपों को तृप्त किया जाता है।

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