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राहु काल में न करें शुभ कार्यों का आरंभ
आजकल सभ लोग खासकर दक्षिण व मध्य भारत के लोग राहु काल को बहुत महत्व देने लगे हैं। राहुकाल में विवाह व समस्त वैवाहिक कार्यक्रम, धार्मिक कार्य, गृहारंभ इत्यादि कृत्य वर्जित माने गए हैं। यह केवल कार्यों के प्रांरभ के लिए ही देखा जाता है। जो कार्य पहले से ही प्रारंभ हो गए उन्हें जारी रखा जा सकता है। राहु काल में प्रारंभ किए गए कार्यों में अनिष्ट की संभावना रहती है। इस काल में किसी निश्चित उद्देश्य के लिए घर से निकलना अशुभ माना जाता है। यदि राहु काल में किसी निश्चित उद्देश्य के लिए घर से निकलना अति आवश्यक हो तो राहु की स्तुति या राहु मंत्र का जप कर निकलना चाहिए। इसका विशेष प्रचलन दक्षिण भारत में है। यह वहां ‘राहुकालम्’ के नाम से जाना जाता है। आजकल यह उत्तर भारत में भी प्रचलित होने लगा है और अब इसे मुहूर्त के अंग के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। राहु को अशुभ नैसर्गिक ग्रह माना गया है, गोचर में राहु के प्रभाव में जो समय होता है, उस समय राहु से संबंधित कार्य किए जायं तो उसका सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है। राहु की महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यन्तर दशा में नकारात्मक प्रभाव को दूर करने के लिए स्तोत्र पाठ और राहु शांति यज्ञ किए जा सकते हैं। राहुकाल में किए गए पूजा-प्रार्थना का अपूर्ण फल प्राप्त होता है। यदि राहुकाल में व्यापार आरंभ किया जाय तो प्राय: यह देखा जाता है कि घाटे में आकर व्यापार बंद कर दिया जाता है। इस काल में खरीदा गया वाहन, मकान, जेवरात आदि कोई भी वस्तु शुभ फलकारी नहीं होती है।
कैसे करें राहुकाल की गणना: राहुकाल गणना के लिए दिनमान को आठ बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। यदि सूर्योदय को प्रात: 6 बजे मान लिया जाय तो सूर्यास्त भी सायं 6 बजे ही होगा। ऐसी स्थिति में दिन का मान 12 घंटे होगा। इसे आठ भागों में बांटने से एक भाग (खंड) डेढ़ घंटे का होगा। प्रथम खंड में राहुकाल नहीं होता है। सोमवार का द्वितीय खंड राहुकाल होता है। शनिवार को तृतीय खंड, शुक्रवार को चतुर्थ खंड, बुधवार को पंचम खंड, गुरुवार को छठां खंड, मंगलवार को सप्तम खंड और रविवार को आठवां खंड राहुकाल होता है। सूर्योदय व सूर्यास्त बदलने से राहुकाल का मान डेढ़ घंटे से कुछ कम या कुछ ज्यादा हो सकता है। राहुकाल केवल दिन में ही माना जाता है। कुछ आधुनिक विद्वान रात्रिकाल के लिए भी इसकी गणना करने लगे हैं, परन्तु वह सर्वमान्य नहीं है। इन विद्वानों के अनुसार रात्रि में भी वही खंड होता है जो दिन में होता है। यदि मंगलवार को अपराह्न 3 बजे से सायं 4.30 बजे तक राहुकाल है तो वही समय रात्रि में भी माना जाय। कुछ विद्वानों का कथन है कि राहुकाल की गणना में अर्धविम्ब या सूर्योदय व सूर्यास्त का समय होना चाहिए न कि विम्ब स्पर्श का। कुछ दिनों में राहुकाल का ज्यादा प्रभाव होता है जैसे शनिवार का दिन। शनिवार के दिन इसका समय दिन में 9 बजे से लेकर 10.30 बजे तक रहता है। यही समय है जब आम आदमी अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर जाकर कार्य प्रारंभ करता है। मंगलवार, शुक्रवार व रविवार को भी राहुकाल विशेष प्रभावी माना जाता है। राहुकाल, चौघड़िया, होरा, गुलिक काल और मान्दी काल से भिन्न है। मंगलवार को शुभ चौघड़िया के समय में राहुकाल होता है और वृहस्पतिवार को अमृत चौघड़िया काल में राहुकाल होता है। अत: चौघड़िया का उपयोग करने वाले लोगों के लिए जो काल श्रेष्ठ माना जाता है वही राहुकाल की दृष्टि में वर्जित है। होरा भी राहुकाल से भिन्न है। होरा में ग्रहों की होरा होती है लेकिन राहु-केतु की कोई होरा नहीं होती।
वार के अनुसार राहुकाल का समय
वार राहुकाल का आरंभ राहुकाल का अंत
रविवार सायं 4.30 बजे सायं 6 बजे
सोमवार प्रात: 7.30 बजे पूर्वाह्न 9 बजे
मंगलवार अपराह्न 3 बजे सायं 4.30 बजे
बुधवार मध्याह्न 12 बजे अपराह्न 1.30 बजे
गुरुवार अपराह्न 1.30 बजे अपराह्न 3 बजे
शुक्रवार पूर्वाह्न 10.30 बजे मध्याह्न 12 बजे
शनिवार पूर्वाह्न 9 बजे पूर्वाह्न 10.30 बजे
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी, आजादनगर, रूस्तयमपुर, गोरखपुर

keyword: rahukal

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  1. Bahut hi acchhi jankari hai...kripya ardha vimb aur vimb sparsha jaise shabdon ki jankari bhi dijiye dwivedi ji...!!

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gajadhardwivedi@gmail.com

 
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