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विश्व के सभी विद्वान वैदिक वाङ्मय की प्राचीनता, श्रेष्ठता तथा वैज्ञानिकता पर आम सहमति रखते हैं। तत्वदर्शी ऋषियों ने प्राचीन काल से ही संपूर्ण मानवता को अपने चिंतन अन्वेषण के द्वारा कला, साहित्य, गणित, विज्ञान, समाज शास्त्र, राजनीति तथा अध्यात्मशास्त्र का दर्शन कराया है। आधुनिक विश्व में ज्ञान-विज्ञान की जितनी प्रगति हुई है, उसका मूल स्रोत हमारे वेदों में सूत्र रूप में देखा जा सकता है। वेद का शाब्दिक अर्थ है-ज्ञान और जिन-जिन कारणों से हम ज्ञानार्जन करते हैं, वे भी ज्ञान की भूमिका में सहायक होने के कारण महत्वपूर्ण हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में ज्योतिष विज्ञान को वेद पुरुष का नेत्र कहा जाता है, जिसका तात्पर्य ही यही है कि ज्योतिष के ज्ञान के बिना हम वेदार्थ का यथार्थ ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते।

वर्तमान काल में ज्योतिष शास्त्र का महत्व और उपयोगिता बहुत बढ़ गई है। जीवन के हर क्षेत्र में हमें उचित समाधान और विकल्प का निर्णय करने में ज्योतिष का ज्ञान सहायक और उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यद्यपि वेदों का मूल उद्देश्य तत्वज्ञान, ब्रह्म विद्या अथवा आत्म साक्षात्कार का अनुभव कराना है, तथापि अवांतर लक्ष्य यह भी है कि लोग वैदिक कर्म, यज्ञ, सदाचार आदि के द्वारा समाज में सुखी, स्वस्थ और संपन्न रह सकें। अस्तु ज्योतिष शास्त्र का संबंध व्यक्ति, समाज, धर्म तथा अध्यात्म से भी उतना ही घनिष्ठ है, जितना अन्य व्यावहारिक शास्त्रों का ज्ञान।


वैदिक युग में प्राय: ज्योतिष के ज्ञान का उपयोग यज्ञ कर्म के निमित्त शुभ मुहुर्त का ज्ञान हासिल करने के लिए होता था। कालांतर में यह विजय, व्यापार तथा यात्रा आदि के लिए शुभ समय के ज्ञान का पता लगाने के निमित्त प्रयुक्त होता रहा। रामायण और महाभारत काल आने तक ज्योतिष का उपयोग वैयक्तिक स्तर पर होने लगा और जन-जन के जीवन, मृत्यु आदि सभी पहलुओं पर समर्थ लोग इस शास्त्र से लाभान्वित होने लगे थे। अतएव ज्योतिष विज्ञान की अनेक विधाओं की खोज हुई, जिनमें, जातक, होरा, संहिता, शकुन, मुहूर्त तथा वास्तु आदि का विकास हुआ।

सभी धर्म, संस्कृति तथा अध्यात्म का मूल वेद ही हैं। वैदिक सभी दर्शन या शास्त्रों में जिज्ञासु के कल्याण के लिए अलग-अलग साधन भले ही बताया गया है, किंतु सभी का लक्ष्य एक ही है; व्यक्ति का कल्याण। जिसे आध्यात्मिक शब्दों में नि:श्रेयस कहते हैं। आध्यात्म शब्द का अर्थ शरीर, बुद्धि तथा आत्मा के विषय का ज्ञान रखना है। अस्तु ज्योतिष शास्त्र भी कर्म सिद्धांत को पुष्ट कर मनुष्यों को आदर्श नागरिक बनाकर स्वस्थ, समाज या राष्ट के निर्माण की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति निहित स्वार्थ से ऊपर उठकर सार्वजनिक हित का भाव रखता है और तदनुरूप चेष्टा करता है, उस समय वह एक ‘आध्यात्मिक’ व्यक्ति की पदवी धारण करता है। धर्म तथा अध्यात्म में यही भेद है, धर्म व्यक्तिगत आस्था, मान्यता तथा तदनुरूप सामाजिक व्यवहार की शिक्षा देता है तो अध्यात्म में सभी का समन्वय हो जाता है, उसमें व्यस्टि और समष्टि का भेद नहीं रहता। यही विशेषता ज्योतिष को अध्यात्मशास्त्र के समकक्ष स्थापित कर देती है।

अध्यात्म और ज्योतिष का संबंध पुरातन और उसके उद्गम से ही है। ग्रह, नक्षत्र, तारों की गति के माध्यम से जो शुभाशुभ समय का ज्ञान हमें प्राप्त होता है। यह भी अध्यात्म है। ग्रहों के अधिपति सूर्य, हमारे शास्त्र का आधार धर्म-अध्यात्म ही सिद्ध हो जाता है। प्राय: ग्रहमंडल में समस्त वैदिक एवं पौराणिक काल के देवताओं को स्वीकार किया गया है। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह प्रतीत होता है कि संपूर्ण ग्रहमंडल विश्वात्मा का विराट स्वरूप (भौतिक आकार) है, इसीलिए पुराण काल में ईश्वर को जगन्नाथ या विश्वनाथ के नाम से संबोधित किया गया है। इस समय जब ज्योतिष विद्या का विश्वव्यापी प्रचार हो चुका है, अस्तु सभी धर्म, संस्कृति, देश, जाति, पंथ के मतानुयायी इसका अनुमोदन और उपयोग करते हैं, जिससे कि यह शास्त्र भी किसी एक धर्म या संस्कृति की मर्यादा से बंधा नहीं। अत: अलग-अलग मतानुसार लोगों को ज्योतिषीय समाधान प्राप्त हो रहा है। यह यथार्थ तत्य है कि ज्योतिष को धर्म से अलग नहीं कर सकते। भले ही कोई व्यक्ति, वर्ग, समुदाय या देश धर्म निरपेक्षता का दंभ करें, किंतु वे सभी किसी न किसी रूप से ज्योतिष अथवा उसके अंग वास्तु, फेंगशुई आदि की उपयोगिता को अस्वीकार नहीं कर सकते। मानवधर्म के समान यह दैवत शास्त्र भी सभी देश धर्म के मनुष्यों को एक सूत्र में बांधकर सहिष्णुता का संदेश देता है। सतिमूले तद्विपाकोजात्यायुर्भोगा: योग सूत्र के इस महावाक्य का उद्घोष है कि कर्म का सिद्धांत अटल है, अपने शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप लोगों को सुख -दुख का अनुभव होता है। यह वैदिक विज्ञान का डिंडिमघोष है, जिसे आज के सभी ज्ञानी, नीतिशास्त्री तथा समाजसुधारक स्वीकार करते हैं। इस तथ्य को ज्योतिष विज्ञान के द्वारा अत्यधिक सुस्पष्ट तथा व्यावहारिक रूप से निर्दिष्ट किया जा सकता है। जब कर्मानुसार व्यक्ति सुखी-दुखी होता है, तब अपने वर्तमान तथा क्रियामाण कर्म को सुधार कर सत्य, अहिंसा तथा सदाचार के मार्ग का अनुसरण कर सर्वहारा समाज को सुखी तथा सौभाग्यशाली जीवन यापन का रहस्य समझ सकता है।

इस प्रकार एक स्वस्थ, प्रसन्न, समृद्घ समाज की आधारशिला स्थापित की जा सकती है। यह नैतिक शिक्षा भी अवांतर रूप से ज्योतिष के अध्यात्म में निहित है। व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत तथा जन्म के पूर्व एवं मरण के पश्चात अर्थात भूत वर्तमान एवं भविष्य तीनों कालों का ज्ञान इस विज्ञान के द्वारा प्राप्त होता है। इस कारण ज्योतिष विद्या भौतिक विज्ञान की कक्षा से परे अध्यात्म की कक्षा के समीप पहुंच जाती है। जो अदृष्ट को भी दृष्ट अर्थात साक्षात्कार करे, उसे लौकिक शास्त्र की श्रेणी में कैसे रख सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र को समय का शास्त्र की श्रेणी में कैसे रख सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र समय का शास्त्र है, समय अथवा काल ईश्वर का ही रूप है, जो नित्य तथा सनातन है। अत: इसे अध्यात्मशास्त्र का सहोदर कहना उचित होगा।

आचार्य उमाकान्त द्विवेदी
(माधवाचार्य)
एस्टोलॉजी टुडे से साभार

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  1. Is achhi jankari ke liye bahut bahut dhanywad Dwivedi Ji... :)

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