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इंगलैण्ड में आधुनिक युग के प्रथम महत्वपूर्ण दार्शनिक हैं फ्रांसिस बेकन। इनका कार्यकाल 1561 एडी से 1626 एडी तक था। इनके पिता सर निकोलस बेकन एलिजाबेथ प्रथम के लार्ड कीपर आफ द शील थे। इनकी माता लेडी एन ग्रीक और लैटिन साहित्य की विदुषी थीं। चाचा सर विलियम सेफिल प्रधानमंत्री थे। अर्ल आव एसेक्स इनके मित्र थे। संपन्न परिवार में पैदा होने पर भी फ्रांसिस बेकन को आर्थिक चिंता सताती रहती थी। इसका कारण यह था कि यह अपने पिता की छठीं संतान थे और पिता ने इनके लिए पर्याप्त संपत्ति नहीं छोड़ा था। बेकन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के स्नातक थे। शिक्षा के पश्चात इन्होंने अपना कर्ज उतारने के लिए वकालत शुरू की। ये अपनी विद्वता, योग्यता, संबंधियों तथा मित्रों की सहयोग से पार्लियामेंट के सदस्य और अनेक उच्च पदों को सुशोभित किया। ये धन लोलुप भी थे। रिश्वत में अभियोगी होने से कैद की सजा भी काटे। बाद में राजनीति से संन्यास लेकर प्रयोगों में रम गए। कालान्तर में न्यूमोनिया के रोग से ग्रसित होकर संसार से विदा हो गए।
फ्रांसिस बेकन इन्द्रियानुभववादी और प्रयोग विज्ञान प्रेमी दार्शनिक थे। ज्ञान का विकास और नूतन तर्क पद्धति इनकी प्रसिद्ध दार्शनिक पुस्तकें हैं। बेकन को इन्द्रियानुभव व विज्ञान प्रयोग की दुदुंभी बजाने वाला माना जाता है। तर्क की आगमन प्रणाली का शंखनाद इन्होंने ही किया। बेकन के अनुसार विज्ञान के युग में एरिस्टॉटल की तर्क पद्धति व्यर्थ और अनुपयुक्त है। बेकन के विचारों में आधुनिक युग की सभी विशेषताएं- धर्मप्रभुत्व के प्रति विद्रोह, दर्शन को धर्म की दासता से मुक्त करना, व्यक्तिवाद, विचार स्वातंत्र्य, भौतिक विज्ञान का प्रभुत्व, प्रयोगों का महत्व और आगमन प्रणाली प्रचुर मात्रा में विद्यमान है।
बेकन के अनुसार दर्शन व धर्म का क्षेत्र भिन्न- भिन्न है। दर्शन का आधार इन्द्रिय विज्ञान और आगमनात्मक तर्क तथा धर्म का आधार अतीन्द्रिय विज्ञान व श्रद्धा है। दर्शन का लक्ष्य है मानव समाज का कल्याण। इसका साधन है भौतिक विज्ञान के आविष्कारों द्वारा प्रकृति पर विजय। इसकी पद्धति है इन्द्रिय प्रत्यक्ष और आगमनात्मक तक तथा वैज्ञानिक प्रयोग। दर्शन व्यावहारिक है। दर्शन जीवन के लिए है और इससे जीवन में समग्र उन्नति व विकास होता है। दर्शन धर्म का वाहन बनकर नहीं रह सकता। दर्शन ज्ञान है और ज्ञान शक्ति है। इस शक्ति से प्रकृति पर विजय प्राप्त करके वैज्ञानिक आविष्कारों द्वारा जीवन को सुखी बनाया जा सकता है। प्रकृति परjavascript:void(0); विजय प्रकृति की आज्ञा से चलने पर नहीं होती। प्रकृति की प्रत्येक घटना में कोई न कोई नियम अंतर्निहित होता है। घटनाओं का इन्द्रियों एवं यंत्रादि की सहायता से पर्यवेक्षण करना और आगमन प्रणाली द्वारा मूल नियम को जानना और उसके आधार वैज्ञानिक आविष्कारों द्वारा मानव जीवन को सुखी बनाना दर्शन का कार्य है। यही सत्य की खोज है और यही उसका उपयोग। जो दर्शन इन्द्रियानुभव और आगमनात्मक तर्क पर प्रतिष्ठित नहीं है उसे दर्शन नहीं कहा जा सकता। बेकन ने अतीन्द्रिय पदार्थ को असत्य और काल्पनिक कहकर ठुकरा दिया और इन्द्रियानुभव में सत्य की प्रतिष्ठा स्वीकार की। उनके अनुसार जो इन्द्रियानुभूत नहीं है वह यथार्थ नहीं है। जो इन्द्रिय गोचर नहीं है वह सत्य नहीं है। जो प्रत्यक्ष नहीं है वह तत्व नहीं है। बेकन के पहले दर्शन धर्म का दास था लेकिन बेकन ने उसे भौतिक विज्ञान का दास बना दिया। बेकन के पहले दर्शन परमार्थ से बंधा था लेकिन बेकन ने परमार्थ को ठुकरा कर दर्शन को व्यवहार की श्रृंखला में जकड़ दिया। इनके अनुसार लोक कल्याण का अर्थ हुआ भौतिक जीवन की सुख सुविधा का संग्रह और साधन हुआ वैज्ञानिक आविष्कारों का विकास।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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