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मध्य युग और आधुनिक युग के संधिकाल का इतिहास धार्मिक परंपरा और प्रभुत्व के क्रमिक ह्रास का तथा व्यक्ति और समाज की स्वतंत्रता एवं भौतिक विज्ञान के क्रमिक अभ्‍युदय का इतिहास है। सांस्कृतिक पुनर्जन्म और धर्म सुधार का इतिहास है। मध्य युग में यूरोप में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तीनों पर पोप का सार्वभौम प्रभाव था। रूढ़िवाद और निरंकुश धर्म शासन का आधिपत्य था। व्यक्ति की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के विरोध में चर्च द्वारा कठोर नियम बनाए गए थे। फलस्वरूप व्यक्ति, समाज व राष्ट तीनों ने ही अपने आप को इस कुचक्र से मुक्ति की ठान ली। इसाई धर्म के अंधविश्वास के प्रति विद्रोह होने लगा। विचारों की दासता असह्य होने लगी। सांस्कृतिक पुनर्जन्म व जन जागरण का प्रथम कारण यही था।


मध्य युग में धर्मगुरुओं ने अपने आदेश का सिक्का जमाने के लिए उसे तर्क द्वारा प्रमाणित करने की चेष्टा की। जनता के मुंह तर्क का खून लग गया और विचारकों के स्वतंत्र विचारों का अभ्‍युदय हुआ और तर्क एवं स्वतंत्र चिंतन के आगे धार्मिक आदेश नहीं टिक पाए। मध्य युग में रहस्यवादी साधना का उदय हुआ। कुछ रहस्यवादी संतों ने यह बताना शुरू किया कि ईश्वरीय प्रेम और ज्ञान की साधना द्वारा मनुष्य ईश्वरीय आनंद की अनुभूति और प्रभु का साक्षात्कार कर सकता है। इसके लिए धर्मध्वज पोप से प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है। इसका परिणाम यह हुआ कि चर्च की ठेकेदारी और पोप की दलाली का अंत हो गया। मध्य युग के अंत में भौतिक विज्ञान का प्रबल विकास प्रारंभ हुआ और कई महत्वपूर्ण अन्वेषण हुए। रोजर बेकन (1214-1294) और लियानार्दो द विन्सी (1452-1519) ने इसाई धर्म की जड़ें हिला दीं। किन्तु मध्ययुगीन अंधविश्वासों को उखाड़ फेकने का श्रेय कॉपरनिकस को है। इसाई धर्म की मान्यता के अनुसार सृष्टि का केन्द्र पृथ्वी है और सृष्टि में मानव व पृथ्वी सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। परन्तु कॉपरनिकस ने सिद्ध किया कि पृथ्वी न सृष्टि का केन्द्र है और न सूर्य पृथ्वी की ओर घूमता है। अपितु सृष्टि का केन्द्र सूर्य है और यह पृथ्वी चपटी नहीं गोल है जो सूर्य के चारो ओर घूमती है। गैलीलियो (1564-1642) और केपलर (1571-1630) के गणित और ज्योतिष के अनुसंधानों से कॉपरनिकस के मत की पुष्टि हुई। पृथ्वी इस विशाल सृष्टि का एक लघु खण्ड मात्र है और मानव एक साधारण प्राणी है। ईश्वर और उसके स्वर्ग की कल्पना धार्मिक कल्पना मात्र है। पारलौकिक सुख की कल्पना के कारण इहलौकिक सुख को दु:ख और पापमय समझकर छोड़ देना युक्तिसंगत नहीं है। मानव जीवन जीने के लिए है मरने के लिए नहीं। इस जीवन को सुखमय बनाने के साधनों की खोज करना भौतिक विज्ञान का लक्ष्य है। मानव जीवन को समझना ही सत्य के स्वरूप को समझना है और इसका एक मात्र साधन इन्द्रियानुभूति है न कि कोरी धार्मिक बौद्धिक कल्पनाएं। इन सैद्धान्तिक अनुसंधानों के साथ-साथ विज्ञान ने जिन वस्तुओं का अन्वेषण किया उनके उपयोग ने भी मानव बुद्धि के क्षेत्र को व्यापक बनाया, व्यक्तिवाद की पुष्टि की। स्वतंत्रता की पुष्टि की अवधारणा ने धार्मिक अंधविश्वासों को उखाड़ फेका। छापे की मशीन के आविष्कार ने ज्ञान के प्रकाश को चर्च की चारदीवारी से निकालकर चारो ओर फैलाया और पुन: प्राचीन ग्रीक मत का पुनरुत्थान हुआ।

आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

keyword: western philosophi

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  1. A very informative article Gajadharji:)

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  2. bhot badiya lga ..sahi bi likha h ...well done sir

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  3. hmmm .....nice thought...sahi main agar ek admi apni indrio ko apne bass me kar le to ose jada acha aur kuch nahi hoga..

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