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शंकराचार्य काशी में रहकर एक दिन ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने के लिए गंगा के तट पर जा रहे थे। रास्ते में एक स्त्री अपने पति का शव रखकर विलाप कर रही थी। शंकराचार्य ने उससे शव को मार्ग से हटाने के लिए कहा तो उस स्त्री ने कहा कि शव को क्यों नहीं कह देते कि वह हट जाए। शंकराचार्य ने कहा कि शव में हटने की शक्ति नहीं है। तब वह स्त्री यह कहकर अंतर्ध्यान हो गई कि आपके मतानुसार तो शक्ति निरपेक्ष ब्रह्म ही जगतकर्ता है तो यह शव शक्ति के बिना क्यों नहीं हटता? इससे शंकराचार्य को शक्ति का ज्ञान हुआ। तब उन्होंने श्री की उपासना प्रारंभ की और श्रीविद्या के प्रवर्तक के रूप में जाने जाने लगे।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र के अनुसार आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जब सनातन धर्म विनष्ट होने लगा तो भगवान भोलेनाथ ने सोचा कि भारतवर्ष में एक ऐसे संत की आवश्यकता है जो वैदिक धर्म को पुन: स्थापित कर सनातन धर्म की रक्षा करे, अपने अंशावतार के रूप में उन्होंने वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन ब्राह्मण दंपति के घर केरल राज्य के कलाटि ग्राम में जन्म लिया। इनके पिता का नाम शिवगुरु था। पिता ने इस पुत्र का नाम शंकर रखा। यही शंकर आगे चलकर आदि गुरु शंकराचार्य बने। एक वर्ष की उम्र में ही इनमें देवत्व का गुण आ गया। दो वर्ष की उम्र में माता से पुराणों का ज्ञान प्राप्त कर लिए। पांच वर्ष की उम्र में इन्होंने कनकधारा स्तोत्र की रचना कर गरीब ब्राह्मण की निर्धनता दूर की। बचपन में जब ये गुरुजी के आश्रम में थे तो बाढ़ के पानी को अपने कमंडल में समाहित कर लिया। सात वर्ष की उम्र में समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कर घर लौट आए। जब शंकराचार्य आठ वर्ष के थे तो माता से संन्यास की आज्ञा मांगे, मां ने मना कर दिया। फिर एक दिन माता के साथ स्नान करने के लिए नदी पर गए। नहाते समय मगरमच्छ ने शंकर को पकड़ लिया। मां रोने-चिल्लाने लगी। इस पर शंकर ने कहा कि यदि आप मुझे संन्यास की आज्ञा दें तो मगरमच्छ मुझे छोड़ देगा। घबराई मां ने तुरंत संन्यास की आज्ञा दे दी। तब इन्होंने आदि शेषावतार माने जाने वाले गोविन्द भगवत्पाद से दीक्षा ग्रहण की। संन्यास लेने से इनकी पूर्णायु आठ वर्ष से सोलह वर्ष हो गई। गुरु ने इन्हें राजयोग, हठयोग और ज्ञान योग की शिक्षा दी। कुछ ही समय पश्चात ये नर्मदा के किनारे से काशीपुरी चले आए। इनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें एक दिन गंगा के किनाने सामान्य ब्राह्मण के रूप में वेदव्यास जी से मिले। वेदव्यास ने शंकर से ब्रह्मसूत्र का अर्थ पूछा। दोनों ने आठ दिन तक शास्त्रार्थ किया। अंत में वेदव्यास ने अपना परिचय देकर इन्हें पूर्ण आशीर्वाद दिया और अद्वैतवाद का प्रचार करने का आदेश दिए और साथ इनकी उम्र 16 वर्ष से 32 वर्ष होने का आशीर्वाद भी दिए।
कहा जाता है कि उस समय विश्वविख्यात न्याय दर्शन के ज्ञानी मण्डन मिश्र से इनका शास्त्रार्थ हुआ था और इन्होंने उनको पराजित किया। कालान्तर में मण्डल मिश्र भी अद्वैत वेदान्त के पोषक बन गए। सनातन धर्म के प्रचार के लिए शंकराचार्य ने अनेक स्थानों का भ्रमण किया। इन्होंने काशी, कुरुक्षेत्र, बद्रिकाश्रम में अन्य मतों के प्रचारकों से एवं विद्वानों से शास्त्रार्थ किया। इनकी मुलाकात कुमारिल भट्ट से हुई और वे भी इनके मत को स्वीकर कर लिए। उस समय समस्त भारतवर्ष बौद्ध धर्म के प्रभाव में था। इनके प्रभाव से पुन: सनातन धर्म की ओर लोगों की रुचि होने लगी। इन्होंने अनेक मंदिर भी बनवाए। पूरे भारत की यात्रा करने के पश्चात देश के चारो दिशाओं में एक-एक पीठ स्थापित किए जो पूर्व में पुरीधाम में गोवर्धन मठ, पश्चिम में द्वारकाधाम में शारदा मठ, उत्तर के ज्योतिर्धाम में ज्योतिर्मठ व दक्षिण के रामेश्वरम धाम में श्रृंगेरी मठ के नाम से विख्यात है। इन्होंने दो सौ ग्रंथों की रचना की है जिसमें ब्रह्मसूत्र भाष्य, गीता भाष्य, विवेक चूड़ामणि, उपनिषद भाष्य, प्रबोध सुधाकर, उपदेश साहसी, अपरोक्षानुति, सौन्दर्य लहरी व प्रपंचसार तंत्रम आदि प्रमुख हैं।

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