3
पुराणों के अनुसार नर्मदा नदी के तट पर अपने आश्रम में रहने वाले महर्षि जमदग्नि की पत्नी के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में वैशाख कृष्ण तृतीया (अक्षय तृतीया) के दिन जन्म लिया था। रात्रि के प्रथम प्रहर में इनका जन्म हुआ, उस समय 6 ग्रह अपनी उच्च राशियों में थे तथा राहु मिथुन राशि में गोचर कर रहा था। इस वर्ष वैशाख शुक्ल तृतीया रात्रि के प्रथम प्रहर में 12 मई को होने से परशुराम जयंती इसी दिन मनाई जाएगी।

ज्योतिषाचार्य पं. शरदचंद्र मिश्र के अनुसार पहले इनका नाम राम था परन्तु बाद में शिव जी इनके तप से प्रसन्न होकर इनको परशु प्रदान किए, तब इनका नाम परशुराम हो गया। इन्होंने अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा भगवान शिव से प्राप्त की थी। अत्याचारी राजाओं को नष्ट करने के लिए और ऋषि-मुनियों और भगवान के भक्तों के कल्याण के लिए इनका अवतरण हुआ।

इस संबंध में पुराणों में दो कथाएं मिलती हैं। प्रथम कथा यह है कि महिष्मती देश का राजा सहस्रार्जुन बहुत अभिमानी था। एक बार अग्निदेव ने राजा से भोजन मांगा। राजा ने अग्निदेव से कहा कि सर्वत्र उसका राज्य है, वह जहां से चाहे भोजन प्राप्त कर सकते हैं। इस पर अग्निदेव वनों को निगलने लगे। एक वन में ऋषि आपव तपस्या कर रहे थे। अग्निदेव ने उनके आश्रम को भी अपनी चपेट में ले लिया। ऋषि आपव ने कु्रद्ध होकर सहस्रार्जुन को शाप दिया कि एक दिन महाविष्णु परशुराम के रूप में जन्म लेकर सहस्रार्जुन के साथ ही समस्त अत्याचारी राजाओं का नाश करेंगे।

दूसरी कथा के अनुसार क्षत्रिय राजाओं के अत्याचार से पृथ्वी इतनी त्रस्त हो गई कि गाय के रूप में भगवान विष्णु के पास गई और अत्याचारियों से मुक्ति दिलाने का आग्रह किया। पृथ्वी को विष्णु भगवान ने वचन दिया कि वह शीघ्र ही जनकल्याण और धर्म की रक्षा के लिए महर्षि जमदग्नि के पुत्र के रूप में अवतार लेंगे।
इन कथाओं के अनुसार महर्षि आपव के शाप और पृथ्वी के वचन को पूर्ण करने के लिए भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में अवतार लिया। पिता की पीड़ा से आहत होकर उन्होंने सहस्रार्जुन का वध किया। कालान्तर में क्षत्रियों के अत्याचार को नष्ट करने के लिए और लोकोपकार के लिए 21 बार अत्याचारियों को नष्ट किया। रामायण की कथा के अनुसार शिव धनुष तोड़ने के कारण कु्रद्ध हुए और लक्ष्मणजी से उनकी नोंक-झोंक हुई लेकिन श्रीराम के अवतार को जानकार नतमस्तक हुए। परशुराम ने पृथ्वी पर कई अश्वमेघ यज्ञ किया और राजाओं की भूमि को ब्राह्मणों को दान किया। परशुराम ने श्रीराम के मुंह में आदित्य, वसु, रूद्र सहित समुद्र, पर्वत इत्यादि का दर्शन किया और राम के टंकार से ब्रह्माण्ड को हिलते देखा। परशुराम ने देखा कि पृथ्वी पर राक्षसों का नाश करने के लिए और धर्म की रक्षा के लिए महाविष्णु का अवतार हो गया है। पुन: वह श्रीराम को प्रणाम कर महेन्द्र गिरि पर्वत पर चले गए और वहां पहुंचकर उन्हें आभास हुआ कि उनका ज्ञान विस्मृत हो गया है। तभी वहां देवगणों ने उन्हें वधुश्रा नदी में डुबकी लगाने को कहा। परशुराम ने वैसा कर खोई हुई स्मृति प्राप्त की। कहा जाता है कि अपना परशु समुद्र के अंदर फेंक दिया जिससे समुद्र के अंदर की भूमि बाहर आ गई और वह प्रदेश केरल के नाम से विख्यात हुआ। पुराणों के अनुसार उनकी देह का विनाश हुआ और वह कई कल्पपर्यन्त तक पृथ्वी पर विद्यमान हैं और आज भी महेन्द्र गिरि पर्वत पर तपस्यारत हैं। जन्म के समय इनकी जन्मपत्रिका में शंख, पर्वत, सुनफा, विरंचि, चक्रवर्ती सम्राट, अमलकीर्ति, बुधादित्य, राजाधिराज आदि सैकड़ों अच्छे योग थे। इन्हीं अच्छे योगों के प्रभाव से ये आजन्म ब्रह्मचारी रहे और शाश्वत चिरंजीवी हुए।

keyword: parashuram

नोट- इस वेबसाइट की अधिकांश फोटो गुगल सर्च से ली गई है, यदि किसी फोटो पर किसी को आपत्ति है तो सूचित करें, वह फोटो हटा दी जाएगीा

Post a Comment

  1. सराहनीय पोस्ट .आभार

    ReplyDelete
  2. I came on this site for the first time...it has really got some really good content related to different religions. Thanks for this.

    ReplyDelete

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top