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इसाइयों के पवित्र ग्रंथ बाइबिल का पूर्वार्द्ध ईसा मसीह के बहुत समय पहले से प्रचलित धर्मग्रंथ है। क्योंकि इसाइयों का विश्वास है कि बाइबिल का पूर्वार्द्ध भी ईश्वर की प्रेरणा से लिखा गया है। उन्हें इस ग्रंथ की प्रामाणिकता के विषय में कभी संदेह नहीं हुआ। प्रारंभिक इसाइयों के विश्वास के दो आधार थे। पहला आधार लिखित यहूदी ग्रंथ था और दूसरा आधार ईसा के शिष्यों के साक्ष्य एवं शिक्षा। यह शिक्षा प्रारंभ में लिखित रूप में उपलब्ध नहीं थी क्योंकि ईसा ने अपने शिष्यों को अपनी शिक्षा लिपिबद्ध करने का नहीं बल्कि उसे प्रचारित करने का आदेश दिया था। ईसा की मौखिक शिक्षा किस तरह और कब लिपिबद्ध की गई, यह बहुत स्पष्ट नहीं है। प्रारंभ में कई लोगों ने ईसा की जीवनी प्रस्तुत करने का प्रयास किया किन्तु कलीसिया (चर्च) ने दूसरी शताब्दी ईसवी में ईसा के जीवन विषयक चार ग्रंथों (चार अध्यायों) को ही प्रामाणिक माना। इसका मूल स्रोत ईसा के शिष्यों की प्रारंभिक शिक्षा है और उस पर रचयिता की स्पष्ट छाप है। प्राचीन परंपरा के आधार पर इनके लेखक सेंट मैथ्यू, सेंट मार्क, सेंट ल्यूक व सेंट जॉन माने जाते हैं। सेंट मार्क की रचना के बारे में यह सर्वसम्मति से माना जाता है कि यह सबसे पहले सम्भवत: ईशा बाद सन 65 के आसपास लिपिबद्ध की गई। कुछ विद्वान सेंट मैथ्यू व सेंट ल्यूक के ग्रंथों का रचनाकाल सन 70 क पूर्व मानते हैं और कुछ विद्वान सन 80 के आसपास। बहुत संभव है कि सेंट जॉन की रचना सन 95 के आसपास लिपिबद्ध की गई हो। दूसरी शताब्दी के आरंभ की कई इसाई रचनाओं में सेंट पाल के पत्रों का उल्लेख है। इन पत्रों का रचनाकाल सर्वसम्मति से सन 51 ई. से सन 67 ई. के मध्य माना जाता है। दूसरी शताब्दी के इसाई साहित्य में प्रेरित चरित्र की प्रामाणिकता के उल्लेख मिलते हैं।

न्यू टेस्टामेंट की रचनाओं का परिचय- इसाई बाइबिल के उत्तरार्द्ध की मूल भाषा यूनानी है। इसके प्रथम चार ग्रंथ सुसमाचार अर्थात खुशखबरी या इंजील कहलाते हैं। ईसा ने अपना उपदेश अरमैक भाषा में दिया था। इंजील में मानव जाति के मुक्ति का शुभ संदेश मिलता है। चारो सुसमाचारों में ईसा की जीवनी तथा उनकी शिक्षा का वर्णन किया गया है। उनका मूल विषय भी एक ही है, वह यह है कि नाजरथ के ईसा यहूदी धर्मग्रंथ के मूल मसीह हैं।

इंजील के चारो ग्रंथों का परिचय-

(1) सेंट मैथ्यू के सुसमाचार को बाइबिल के उत्तरार्द्ध में प्रथम स्थान पर रखा गया है। यह प्रथम कलीसिया (चर्च) के विशेष रूप में मान्य रहा है। सेंट मैथ्यू प्रेरित (एपॉस्टल) थे। यह सुसमाचार (टेस्टामेंट) यहूदी पाठकों के लिए लिखा गया है और इसका उद्देश्य यह प्रमाणित करना है कि यहूदी धर्मग्रंथ में मसीह के लिए जो कहा गया है वह नाजरथ के ईसा में पूरा हो गया है। इसमें ईसा के जन्म व मिश्र में प्रवास का विवरण दिया गया है। इसके अतिरिक्त सेंट मैथ्यू ने ईसा की शिक्षा पर विशेष बल दिया है।

(2) द्वितीय ग्रंथ के सुसमाचार (गास्पेल) सबसे संक्षिप्त और सबसे प्राचीन है। सेंट मार्क यरूशलम के निवासी थे। यरूशलम का मसीही समुदाय उनके घर में एकत्र होता था। इन्हें शिक्षा सेंट पॉल से मिली थी क्योंकि सेंट पॉल इन्हें अपना पुत्र कहते हैं। सेंट मार्क के सुसमाचार का मुख्य उद्देश्य ईसा मसीह को ईश्वर के सर्वशक्तिमान पुत्र के रूप में प्रस्तुत करना है। यह ईसा की शिक्षा पर कम उनके चमत्कारों पर अधिक बल देता है।

(3) तृतीय ग्रंथ के लेखक सेंट ल्यूक गैर यहूदी थे। एक प्राचीन परंपरा के अनुसार ये अन्ताखिया के निवासी थे और इसाई बनने के बाद सेंट पॉल के द्वितीय व तृतीय प्रचार यात्राओं में उनके साथी थे। इन्होंने सेंट पॉल के साथ रोम की यात्रा भी की थी तथा उनके कारावास के समय उनके साथ थे। इनका उद्देश्य गैर यहूदियों के लिए ईसा के जीवन का विवरण प्रस्तुत करना है। इन्होंने इस बात पर ज्यादा जोर दिया कि ईसा समस्त मानव जाति की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने आए हैं। ये विशेष रूप से पापियों के प्रति ईसा की दयालुता तथा दीन-हीन लोगों के साथ उनकी सहानुभूति का चित्रण करते हैं।

(4) चतुर्थ सुसमाचार ग्रंथ सेंट जॉन का है। ये जेबेदी और सलोमी के पुत्र तथा संत याकूब के भाई थे। ये प्रेरित और ईसा के प्रिय शिष्य थे। यह संभवत: सन 69-70 में फिलिस्तीन छोड़कर एशिया माइनर के एफेसस नामक नगर में आए। इनका उद्देश्य यह था कि ईसा ईश्वर के पुत्र और त्रियेक ईश्वर के द्वितीय व्यक्ति हैं। इस सुसमाचार की यह विशेषता है कि इसमें वर्णित अधिकांश घटनाओं का स्थान यहूदिया और यरूशलम है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र
430 बी आजाद नगर, रूस्तहमपुर, गोरखपुर

keyword: bible, christian

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  1. Dear Dwivedi Ji, Wakai mein aap ke website par aana mere liye saubhagya ki baat hai...kaafi naveen jankari milti hai. Dhanywad!

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