0

srदाम्पत्य भाव सप्तम भाव को कहते हैं। इससे जीवन साथी व रोजगार दोनों का विचार किया जाता है। बृहस्पति का दाम्पत्य भाव में होना शुभ फलदायक नहीं माना गया है। यदि इस भाव में बृहस्पति शत्रु राशिगत अर्थात वृष या तुला राशि में हो तो जातक या जातिका को विवाह में विलम्ब का सामना करना पड़ता है और विवाह के बाद भी अपेक्षित सुख की प्राप्ति नहीं होती है। यदि कुण्डली में गुरु ग्रह भाग्य भाव का स्वामी है और वह दाम्पत्य भाव अर्थात सप्तम भाव में है तो यह कुछ संदर्भों में सामान्य फलदायक होता है। सप्तम भाव में स्थित गुरु जातक को चरित्रवान बनाता है और जीवन साथी भी सुशील, धार्मिक और चरित्रवान होता है। यदि बृहस्पति बारहवें भाव या छठें भाव अथवा आठवें भाव का स्वामी हो और दाम्पत्य भाव में स्थित हो तो पूर्ण शुभ फलदायी नहीं रहता है। कारण यह है कि त्रिक भाव के स्वामी जिस भाव में जाते हैं उस भाव को कमजोर बनाते हैं। इसके परिणाम स्वरूप जातक को वैवाहिक सुख में कमी का सामना करना पड़ता है।

दाम्पत्य भाव पर बृहस्पति की दृष्टि का फल- सप्तम भाव पर यदि गुरु ग्रह की पंचम, सप्तम या नवम पूर्ण दृष्टि हो तो जातक सत्कर्म से आय प्राप्त करने वाला, ईमानदार और अच्छे मित्रों से युक्त होता है। इस दृष्टि के प्रभाव से जातक पूर्ण सदाचारी, नीतिज्ञ और धार्मिक प्रवृत्ति का होता है। धर्म-कर्म में उसकी रुचि होती है। यदि सप्तम भाव में बृहस्पति हो तो तृतीय भाव को नवम पूर्ण दृष्टि से देखता है तो इसके प्रभाव से जातक साहसी, सदाचारी और कर्मठ होता है। तीर्थ यात्रा भी होती है।

नक्षत्रीय फल- यदि गुरु कृतिका के तीन चरण, रोहिणी या मृगशिरा के प्रारंभ के दो चरण या चित्रा नक्षत्र के उत्तरार्द्ध के दो चरण, स्वाती या विशाखा नक्षत्र में स्थित हो तो शुभ फल प्राप्त होते हैं। जहां एक तरफ जातक को वैवाहिक सुख में कमी का अनुभव होता है वहीं दूसरी तरफ जातक सदाचारी व ईमानदार होता है। शिक्षण आदि क्षेत्रों में वह आजीविका प्राप्त करता है। यदि गुरु स्वाती नक्षत्र में स्थित हो तो जातक को दाम्पत्य जीवन में तनाव का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी तो विवाह-विच्छेद की स्थिति बन जाती है। यदि गुरु विशाखा नक्षत्र में स्थित होता है तो जातक धार्मिक प्रवृत्ति का होता है और उसक जीवन साथी सदाचारी और चरित्रवान होता है।

ग्रहों से युति का फल- यदि दाम्पत्य भाव अर्थात सप्तम भाव में गुरु की युति शुक्र से होती है तो जातक का जीवन साथी सुन्दर, सुशील व चरित्रवान होता है। यदि सप्तम भाव में गुरु और शनि की युति होती है तो जातक को वैवाहिक सुख में कमी का अनुभव होता है और जातक का विवाह विलम्ब से होता है। यदि सप्तम भाव में गुरु और राहु की युति (चाण्डाल योग) हो तो जातक को विवाह के बाद कष्टों का सामना करना पड़ता है, विवाह विच्छेद का सामना भी करना पड़ सकता है या दोनों को पृथक-पृथक रहने को मजबूर होना पड़ सकता है। यदि गुरु ग्रह केतु के साथ सप्तम भाव में होता है तो जातक को वैवाहिक संकटों का सामना करना पड़ता है। परन्तु सप्तम भाव में स्थित गुरु जातक को पूर्ण आर्थिक रूप से सशक्त बनाता है। ऐसा जातक क्रमश: अपने जीवन में उन्नति के शिखर की ओर आरूढ़ होता है क्योंकि गुरु की पंचम दृष्टि लाभ भाव पर होती है। 31वें वर्ष के पश्चात उसके जीवन में अच्छे आर्थिक योग बनते हैं।

आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

keyword: falit jyotish

Post a Comment

gajadhardwivedi@gmail.com

 
Top