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देवपूजन में षोडशोपचार आदि की पूजा विधि प्रयुक्त होती है। इनमें भी भाव संवेदनाएं उभारना ही प्रयोजन है। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान के लिए जल अर्पित किया जाता है। इसका अर्थ है कि सतप्रयोजन के लिए श्रम बिन्दु समर्पित किए जायं। पुरुषार्थ किया जाय और समय का दान किया जाय। चार चम्मच जल देवता को करने का एक उद्देश्य शरीर शुद्धि, मन शुद्धि, व्यवहार शुद्धि और अर्थ शुद्धि भी है। अक्षत, चावल, अन्न इसलिए अर्पित करते हैं कि हमारे कमाए अन्न कणों से, धन में से पुरुषार्थ प्रयोजन के लिए अंशदान नियमित रूप से होता रहे। पुष्प का स्वरूप है- कोमलता, सुरुचि, मृदुल, हास्य, वातावरण में उल्लास एवं तिल्ली, मधुमक्खी, भौरे आदि हर समीपवर्ती को अनुदान देना, पुष्प पहले छिदता है और संघबद्ध होकर माला बनता है। यही दिशा देवत्व को धारण करने वाले मनुष्य की भी होनी चाहिए। दीपक, पात्र, वर्तिका, तेल व ज्योति का समन्वय पूजा में देखने को मिलता है। दीपक किसी पात्र में जलता है, पात्र अर्थात पात्रता, प्रामाणिकता। तेल, घी, चिकनाई को स्नेह कहते हैं। दीपक में जिस प्रकार प्रत्यक्ष स्नेह भरा होता है, हमारे अंत:करण में उसी प्रकार दिव्य प्रेम भरा होना चाहिए। बत्ती को संस्कृत भाषा में वर्तिका कहते हैं जिसका अर्थ होता है- तत्परता। सन्मार्ग और निष्ठा की तत्परता की तुलना दीपक की वर्तिका से की जा सकती है। जब मानवी चेतना में सद्ज्ञान का, विवेक का प्रकाश दीप्तिमान रहेगा तो व्यक्ति स्वयं ही आलोकित रहेगा और अपने प्रभाव क्षेत्र को प्रकाश देगा। देवता के सम्मुख दीपक जलाकर इसी भाव निष्ठा को ज्वलंत बनाना भक्त जनों का उद्देश्य है। धूप अर्पण करना सुगन्धि का विस्तार है। यशस्वी, श्रद्धासिक्त, अ िभनंदनीय और अनुकरणीय जीवन प्रक्रिया की तुलना धूप द्वारा निकलने वाली सुगन्धि से की जा सकती है। चंदन अर्पण करने की विशेषता वातावरण में शांति, शीतलता उत्पन्न करना, समीप उगे हुए झाड़-झंखाड़ को अपने समान ही सुगन्धित बना लेना, डालियों पर लदे रहने वाले सांप-बिच्छुओं को भी शांति देना, उनके विष प्रभाव को न स्वीकार करना। चंदन का देवपूजा में उपयोग होने का तात्पर्य है कि समपर्णकर्ता देव उपासक इन दिव्य गुणों को अपने में धारण करने की आवश्यकता अनुभव करता है और उसके लिए प्रयत्नशील है। नैवेद्य में मीठा पदार्थ प्रयुक्त होता है। देवता को मिठास ही प्रिय है। मिठास का अर्थ है मधुरता। मधुर वचन, मधुर व्यवहार में घुली हुई मिठास से देवता प्रसन्न होते हैं। देवत्व की झांकी सौम्य, सरल, सज्जनोचित्त स्वभाव से की जा सकती है। नैवेद्य अर्पित कर यही संकेत अपने आप को दिए जाते हैं। पूंगीफल, श्रीफल, ऋतुफल आदि अर्पित करने का तात्पर्य है कि कर्मनिष्ठा में प्रगाढ़ तत्परता किन्तु फल का श्रेय देवता को अर्पित करना। वस्त्र अर्पण का तात्पर्य- लज्जा ढके रहना, निर्लज्ज न बने रहना, शालीनता को निष्ठा पूर्वक ओढ़े रहना। रोली अर्पण करना- चेहरे पर लालिमा बनाए रखना, आरोग्यता व साहस की ओर संकेत है। यज्ञोपवीत अर्पण- मानवीय गुणों के प्रति आस्था का प्रकटीकरण। सत्य, प्रेम, न्याय, संयम, अस्तेय, अपरिग्र्रह, शौच, स्वाध्याय एवं आस्तिकता ये नौ गुण मानवता को अलंकृत करते हैं। इन्हें विकसित करने का उत्तरदायित्व कंधे पर लादा जाता है। आस्तिकता, आध्यात्मिकता व धार्मिकता की तीन दिव्य भावनाएं यज्ञोपवीत की तीन ग्रंथियों के आधार पर व्यवहार में रखी जानी चाहिए। यज्ञोपवीत की बड़ी गांठ को ब्रह्मग्रंथि कहा जाता है। यह ब्रह्म चेतना हृदयंगम किए जाने की ओर संकेत करता है। देवता को यज्ञोपवीत अर्पित करके हम प्रकारान्तर से आत्म चेतना को प्रशिक्षित करते हैं।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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  1. badhiyan post gajadhar ji! hum aam taur par pooja ki samagriyan to yaad rakhte hain par unka mahatva bhool jaate hain. shukriya yaad dilane ke liye.

    -Abhijit (Reflections)

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