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जन्म कुण्डली में बारहों भावों के विशेष फल तथा सप्तम स्थान से विवाह तथा उत्तम पत्नी योग एवं पत्नी के सप्तम भाव से पति का शुभ योग देखा जाता है। जन्म कुण्डली निर्माण की दशा में आगे बढ़ने से पहले हमें तीन चीजों का सही ज्ञान आवश्यक है। इनके बिना अथवा इसकी सही जानकारी न होने पर जन्म कुण्डली बनाना असम्भव तो होगा ही साथ ही उससे प्राप्त परिणाम भी विश्वासनीयता खो जाती है।

जन्मतिथि किसे कहते हैं?
भारतीय पद्घति के अनुसार जिस तिथि में सूर्य उदय होता है वही तिथि अगले सूर्योदय तक मानी जायेगी-
आशय यह है कि प्राचीन पद्घति में तिथि के विस्तार व वर्तमान का आधार सूर्योदय है। सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक गणित कार्य के सन्दर्भ मंा एक ही तिथि रहेगी। इसके विपरीत आधुनिक पद्घति में तिथि की व्यायपता या विस्तार रात्रि के 12 बजे से अगले रात्रि 12 बजे (मध्य रात्रि) तक मानी जाती है। तिथि परिवर्तन का आधार मध्य रात्रि है। इसी के आधार पर वारों का निर्णय किया जाता है। सूर्योदय के समय का वार ही जन्म वार माना जायेगा। चाहे हम किसी भी पद्धति से जन्मतिथि स्वीकार कर रहे हों, यदि किसी का जन्म 4 अप्रैल 1984 बुधवार की रात्रि 2:15 बजे (आधी रात के बाद) हुआ है तो जन्म का वार बुधवार ही माना जायेगा तथा जन्म तिथि चैत्र शुक्ल तृतीया ही रहेगी, किंतु अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार जन्म तिथि 5 अप्रैल ही मानी जायेगी क्योंकि जन्म मध्य रात्रि के बाद हुआ हैा इस भेद से छुटकारा पाने के लिए हम भारतीय पद्धति से ही जन्मपत्र लिखते हैं तथा वहां पर वार एवं तिथि तदनुसार लिखकर यह उल्लेख करना आवश्यक समझते हैं कि बालक का जन्म 4-5 अप्रैल की मध्य रात्रि में हुआ था। ऐसा न करने पर यदि हम लिखेंगे कि 5 अप्रैल को रात्रि 2:15 बजे पर जन्म हुआ था, तो परिस्थितिवश 5-6 अप्रैल के 2:15 बजे जन्म समझने का भ्रम हो सकता है। इसलिए कुण्डली निर्माण के लिए सबसे पहले जन्म तिथि तथा जन्म समय एवं जन्म स्थान का निश्चय कर लेना चाहिए।

जन्म कुण्डली में बारहों भावों का विचार-
हम जन्म कुण्डली विचार की खास बातों पर प्रकाश डालते हुए बारहों भावों के बारे में बता रहे हैं। यद्यपि कुण्डली विचार करना अध्ययन व अभ्‍यास पर निर्भर करता है लेकिन प्रारम्भिक जिज्ञासु भी कुछ विशेष बातों का जिन्हें आमतौर पर लोग जानना चाहते हैं सोच विचार कर सकते हैं। धीरे-धीरे अध्ययन व अभ्‍यास की मात्रा बढ़ते-बढ़ते भविष्य की घटनाओं का स्वरूप और प्रकृति का निर्धारण करने का क्षमता भी बढ़ेगी। उस स्थिति में विशिष्ट ग्रन्थों का अध्ययन काफी लाभदायक होगा।
जैसे-सर्वार्थ चिन्तामणि, जातक देश, मार्ग, फलित मार्तण्ड तथा पराशरीय, होराशास्त्र आदि ग्रंथ ज्योतिष की फलित के विशिष्ट प्रकाश स्तम्भ हैं।

कौन से भाव से क्या विचार करना चाहिए-
प्रथम भाव- शरीर रूप, बल, स्वभाव, सुख, दु:ख, मस्तिष्क आदि का विचार किया जाता है।
दूसरा भाव - धन, आंख, परिवार, वाणी, सुंदरता, प्रेम, मृत्यु, इकट्ठा किया गया धन तथा क्रय- विक्रय का विचार करना चाहिए।
तीसरा भाव -छोटे भाई-बहन, नौकर, पराक्रम, हिम्मत, आयु, फेफड़ों, के रोग तथा संगीत आदि का विचार होता है।
चौथा भाव -माता, सम्पत्ति, घर, वाहन, सुख, लोकप्रियता, पेट के रोग, मित्र तथा कपट आदि का विचार करना चाहिए।
पांचवा भाव -विद्या, बुद्घि, प्रबन्ध शक्ति, नौकरी छूटना, सन्तान, गर्भपात, अचानक मिलने वाली सम्पत्ति, गुर्दे, मूत्राशय आदि रोगों का विचार करना चाहिए।
छठां भाव -मामा, रोग, शत्रु, गुदा, घाव, जमींदारी, चिन्ता तथा ऋण आदि का विचार करना चाहिए।
सातवां भाव -स्त्री, कामसुख, दैनिक रोजगार, मृत्यु, मुतेन्द्रीय, गुप्त रोग, विवाह आदि का विचार करना चाहिए।
आठवां भाव - आयु, जीवन, वैराग्य, मृत्यु का कारण, समुद्र यात्रा, चिन्ता, अण्डकोष क्षेत्र, कर्ज का उतरना, संकट आदि का विचार करना चाहिए।
नौवां भाव - भाग्योदय, विद्या, त्याग, सुख, तीर्थ यात्रा, साला-साली, गुरु आदि का विचार करना चाहिए।
दसवां भाव - नौकरी (सरकारी), पद प्रतिष्ठा, आकाश विचरण, व्यापार, पिता, वैभव, कीर्ति व नेतृत्व आदि का विचार करना चाहिए।
ग्यारहवां भाव- आमदनी, ऐश्वर्य, बड़े भाई-बहन, पुत्र-वधू का विचार करना चाहिए।
बारहवां भाव - व्यय, आंख, हानि, दु:ख, गरीबी, पाप-अपराध, पुलिस केस, सजा, बुरी आदतों आदि का विचार करना चाहिए।
इस तरह प्रत्येक भाव के विचारणीय विषय को अपने मस्तिष्क में बिठा लेना चाहिए। यदि भाव बलवान हो तो उस भाव से सम्बन्धित बातों की बढ़ोत्तरी होगी अन्यथा हानि समझना चाहिए।
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शादी का विशेष समय-
जब भी जन्म कुण्डली के सप्तम भाव की दशा चल रही हो और पंचम भाव की अन्तर्दशा हो तो शादी के समय उत्तम फलों की प्राप्ति होती है। प्रथम में पुत्र, द्वितीय में सुख समृद्घि, तृतीय में पति-पत्नी में लोकप्रियता, चतुर्थ में परिवार से सम्मान प्राप्त होता है। तृतीय भाव की दशा में शादी करने पर पराक्रम और धन की बढ़ोत्तरी होती है। इसी प्रकार से यदि लग्नेश की दशा के समय शादी होती है तो पत्नी को सरकारी नौकरी की प्राप्ति होती है। षष्ठमेष की दशा में शादी होने पर ससुराल पक्ष का विनाश होता है। अष्टमेष की दशा चलने पर पति की मृत्यु होती है। नवमेश की दशा चलने पर परिवार में कलह तथा विद्रोह की स्थिति बनी रहती हैं। दशमेश की दशा में पति की लगी लगायी सरकारी नौकरी पर आरोप लग जाता है। एकादश की दशा में इकठ्ठा किया हुआ धन तथा हाथी, घोड़ा, भूमि, भवन का विनाश हो जाता है। द्वादश की दशा में शादी होने पर सास, ससुर तथा ससुराल पक्ष के लोगों को असाध्य रोग हो जाता है। इन सभी विषयों पर विचार करके विवाह करना शोभनीय होगा।

शत्रुंजय शुक्ल
पटवारी टोला, तुर्कमानपुर, गोरखपुर

keyword: jyotish

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