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आचार्यपाद श्रीवल्लभ के पूर्वज दक्षिण भारत के कॉकरवाड़ ग्राम के मूल निवासी थे। तैलंग भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण परिवार सात पीढ़ियों से सोमयज्ञ करता आ रहा था, क्योंकि विश्वास था कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उनके पूर्वज को वरदान दिया गया था कि सौ यज्ञ पूर्ण होने पर भगवतरूप एक महापुरुष का अवतार होगा। इसी तैलंग ब्राह्मण वंश में लक्ष्मण भट्ट के समय में सौ यज्ञ पूर्ण हुआ और वे एक लाख ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए काशी प्रस्थान किए। मार्ग में ही चम्पारण (वर्तमान रायपुर-छत्तिसगढ़) में उनकी पत्नी श्रीइलम्मा के गर्भ से एक विलक्षण बालक का जन्म हुआ। यह बात वैशाख कृष्ण एकादशी सन 1479 की है। बहुत से विद्वान उन्हें अग्निदेव का अवतार मानते हैं। यह बालक काशी में ही रहकर माधवेन्द्रपुरी नामक विद्वान से वेद की शिक्षा प्राप्त किया। साथ ही आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, माधवाचार्य, निम्बार्काचार्य इत्यादि के दर्शन शास्त्र के साथ बौद्ध दर्शन और जैन दर्शन का भी अध्ययन किया। कुछ समय पश्चात वह वृंदावन चले गए और वहां से तीर्थाटन के लिए निकल गए। उस समय दक्षिण में विजय नगर के तत्कालीन राजा कृष्णदेव राय की सभा में समस्त विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें वैष्णवाचार्य की उपाधि से विभूषित किया। स्वर्ण के सिंहासन पर बैठाकर इनका पूजन किया और बहुत सुवर्ण मुद्रिका भेंट में दी। उसमें से थोड़ा रखकर शेष इन्होंने विद्वान ब्राह्मणों में वितरित कर दिया। वल्लभाचार्य विजयनगर से उज्जैन गए और वहां कुछ समय एक पीपल के वृक्ष के नीचे रहे। मथुरा के घाट और गंगा के किनारे कुछ स्थानों पर रहे, यह सभी स्थान वल्लभाचार्य के बैठने के रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं। वे वृंदावन व गोवर्धन पर्वत के आसपास रहकर कृष्ण की साधना किए। इनकी प्रेममयी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने इनको कई बार दर्शन दिया तथा अपने स्वरूप का वात्सल्य भाव से प्रचार करने का संदेश दिया।
इनके जीवन में अनेक ऐसी घटनाएं हुर्ईं जिसे देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गए। एक बार एक भक्त शालिग्राम शिला और भगवान विष्णु की प्रतिमा दोनों का पूजन कर रहा था। उसके मन में भेद बुद्धि थी। वह शिला को उत्तम और मूर्ति को सामान्य समझ रहा था। आचार्य वल्लभ ने उससे कहा कि यह भेदभाव उचित नहीं है। इस पर वह भक्त क्रुद्ध हो गया। वह रात को प्रतिमा की छाती पर शालिग्राम शिला रख दिया। प्रात:काल उसने देखा कि शिला के कई टुकड़े हो गए हैं। वह आचार्य के पास गया और क्षमा मांगी। आचार्य ने कहा कि उसे भगवान के चरणामृत से जोड़ दो। ज्योंही उसने टूटी शिलाओं को पंचामृत में डाला वह शालिग्राम शिला पूर्ण हो गई।
कहा जाता है कि एक बार श्रीकृष्ण चंद्र उनके पुत्र के रूप में जन्म ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त किए, तब उन्होंने विवाह किया और भगवान उनके पुत्र के रूप में आए। इन्होंने भारत वर्ष में चौरासी स्थानों पर प्रवचन दिया है। ये सभी स्थान चौरासी बैठक के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्होंने ब्रह्मसूत्र नाम से टीका, तत्वार्थ दीप निबंध, सर्व निर्णय प्रकरण, श्रीमद्भागवत पुराण पर सुवोधिनी नाम की टीका सहित अनेक ग्रंथों की रचना की। जब ये 52 वर्ष के थे तब काशी में निवास कर रहे थे। एक दिन हनुमान घाट पर स्नान करने गए। जब ये खड़े होकर स्नान कर रहे थे, उसी समय वहां एक उज्ज्वल दीप शिखा उठी और सैकड़ों लोगों ने देखा कि आचार्य सदेह ऊपर उठने लगे और देखते ही देखते आकाश में लीन हो गए। काशी स्थित हनुमान घाट पर आज भी इनका मंदिर है।
आचार्य शरदचंद्र मिश्र, 430 बी आजाद नगर, रूस्तमपुर, गोरखपुर

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  1. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति! मेरी बधाई स्वीकारें।
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